❝ मेरी बच्ची ने आवाज़ क्यों नहीं दी? ❞
शाम के छह बजे थे।
रसोई में खाना चढ़ा था कि अचानक नीमा का फोन जोर से बजा।
स्क्रीन पर लिखा था— “पायल के ससुराल”।
नीमा का दिल धक से रह गया।
“अरे देव! जल्दी आओ… पायल के घर से फोन है!”
देव दौड़े चले आए।
“हेलो? क्या हुआ पायल को?”
उधर से किसी की भारी, टूटी आवाज़ सुनाई दी—
“देवजी… जल्दी आइए… पायल… वो…”
आवाज़ रोने में बदल गई, जैसे शब्द दम तोड़ रहे हों।
और फिर फोन कट गया।
देव के पैरों से जमीन खिसक गई।
नीमा घबरा गई— “देव! बोलो तो! क्या हुआ पायल को?”
देव बस एक ही शब्द कह पाए—
“पायल…”
वो दोनों बिना एक पल गंवाए घर से निकल पड़े। रास्ते में नीमा बार-बार रोकर पूछ रही थी—
“कहीं कुछ बड़ा तो नहीं हो गया? वो तो कल ही हँस-हँसकर बात कर रही थी…!”
देव की आँखें भर आईं—
“क्या पता वह कितना कुछ छिपा रही थी…”
ससुराल का माहौल अजीब था...
जब दोनों पायल के घर पहुँचे, दरवाजा आधा खुला था।
घंटी बजाई— कोई जवाब नहीं।
अंदर गए तो पूरा घर खामोश पड़ा था।
पायल की सास धीरे से बाहर आईं।
चेहरे पर थकान… आँखें नम थीं।
“आओ बहनजी… अंदर बैठो…”
नीमा ने बेचैनी से पूछा—
“पायल कहाँ है? कैसी है वो?”
सास ने धीमी आवाज़ में कहा—
“अभी अस्पताल में है… सुबह से तबियत बहुत खराब थी…”
देव चौंक गए—
“लेकिन हुआ क्या?”
तभी पायल का पति आया।
चेहरा उतरा हुआ, आँखें नम।
“पापा… मामीजी… पायल कई दिनों से ठीक नहीं थी। खुद में गुम रहती थी। बोलती बहुत कम थी… हमें लगा शायद वह किसी बात को लेकर परेशान है…”
नीमा का दिल जोर से धड़का—
“सीधे बताओ! मेरी बच्ची ठीक है ना?!”
पति ने सिर झुका लिया—
“अस्पताल चलिए… डॉक्टर ही सही बता पाएगा…”
अस्पताल पहुँचते ही एक अजीब सी ठंडक महसूस हुई।
नर्स ने उन्हें डॉक्टर के केबिन में ले जाकर बैठाया।
डॉक्टर ने गंभीर चेहरे से कहा—
“बैठिए… हमें बात करनी है।”
नीमा काँप गई—
“डॉक्टर… मेरी पायल कैसी है? क्या हुआ उसे?”
डॉक्टर ने फाइल खोली—
“उन्हें शारीरिक रूप से कुछ बड़ी समस्या नहीं है, लेकिन…”
देव की आवाज़ टूट गई—
“लेकिन क्या?”
डॉक्टर ने धीरे से कहा—
“आपकी बेटी… चार महीने की प्रेग्नेंट हैं।”
कमरा जैसे घूम गया।
नीमा कुर्सी पकड़कर बैठ गई।
“पायल… माँ बनने वाली है…?
लेकिन उसने तो कभी कहा नहीं…”
डॉक्टर ने गहरी सांस ली—
“समस्या प्रेग्नेंसी नहीं है।
समस्या है उसका तनाव।
वह पिछले कुछ हफ्तों से मानसिक रूप से बहुत अकेली महसूस कर रही थी।”
देव ने घबराकर पूछा—
“क्यों? किस बात की चिंता?”
डॉक्टर ने स्पष्ट कहा—
“उसे डर था कि आप लोग नाराज़ होंगे।
उसके मन में था कि आपने उससे कहा था—
‘शादी के बाद थोड़ा समय खुद पर देना, नौकरी संभालना।’
और वह इस बात को लेकर बहुत तनाव में थी।”
नीमा की आँखों से आँसू बह निकले—
“हे भगवान… वो इतना कुछ मन में दबाए बैठी रही…”
पायल का दर्द—जो किसी ने नहीं देखा...
नर्स उन्हें कमरे में ले गई।
पायल बिस्तर पर लेटी थी—
चेहरा फीका, आँखें सूजी हुईं, बाल बिखरे।
जैसे कई रातों से ठीक से सोई ही न हो।
नीमा उसके पास जाकर बैठी—
“पायल… मेरी बच्ची…”
पायल आँसू रोक भी न सकी।
माँ को देखते ही फूट-फूटकर रो पड़ी।
“माँ… मैं बहुत डर गई थी…
मुझे लगा आप नाराज़ होंगी… कहेंगी कि मैंने जल्दीबाज़ी कर दी…”
नीमा ने उसे बाहों में भर लिया—
“पगली… मैं तेरी खुशियों से नाराज़ होऊँगी?
तूने क्यों सोचा हम तेरा साथ छोड़ देंगे?”
पायल कांपती आवाज़ में बोली—
“माँ… यहां सब अपने-अपने काम में व्यस्त थे…
मैं पूरे दिन अकेली रहती थी…
उल्टियाँ, कमजोरी…
और ऊपर से डर कि आप क्या सोचेंगी…”
देव ने उसकी हथेली थाम ली—
“बेटा, हम हमेशा तेरे साथ हैं।
तूने हमें इतना पराया क्यों समझ लिया?”
पायल रोते हुए बोली—
“मैं बस… अकेली पड़ गई थी…”
पति की ग्लानि...
पायल का पति भी वहीं खड़ा था, सिर झुकाए।
“पापा… मामीजी… मेरी गलती ज़्यादा है।
मैं काम में इतना उलझ गया कि उसे समझ नहीं पाया।
कई बार वह बोलना चाहती थी…
पर मैं सुन ही नहीं पाया…”
देव ने शांत स्वर में कहा—
“गलती किसी एक की नहीं।
पायल का दर्द हम सबने नहीं देखा।”
नीमा ने धीरे कहा—
“अब हम उसे अकेला नहीं छोड़ेंगे।
वह हमारी बच्ची है… उसकी देखभाल हम सब मिलकर करेंगे।”
शाम तक पायल की हालत स्थिर हो गई।
डॉक्टर ने छुट्टी की अनुमति दे दी।
पायल के पति ने कहा—
“ममीजी, मैं भी साथ चलूँगा।”
नीमा मुस्कुराईं—
“बिलकुल… पर कुछ दिन पायल मेरे साथ रहेगी।
उसे अभी माँ की छाँव चाहिए।”
देव ने पायल को सहारा देकर उठाया—
“चल बेटा… घर चलें।
जहाँ तू बिना डरे सांस ले सके…
जहाँ तुझे कोई अकेला न छोड़े।”
पायल ने अपना सिर पिता के कंधे पर रख दिया।
आँसू अभी भी बह रहे थे…
लेकिन उनमें राहत थी, अपनापन था।
उस पल देव और नीमा दोनों ने महसूस किया—
बेटी ही नहीं… उसकी खोई हँसी भी घर लौट रही है।
कहानी की सीख:
कभी-कभी बच्चे ग़लत नहीं होते…
बस डर के कारण चुप हो जाते हैं।
रिश्तों में तकरार नहीं, भरोसा जरूरी है।
दिल की बातें छिपाने से दर्द बढ़ता है—
लेकिन एक बार परिवार साथ खड़ा हो जाए,
तो सबसे बड़ी मुश्किल भी आसान हो जाती है।

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