चार दीवारों के बाहर की हवा
सुबह के छह बजे थे। अलार्म बजने से पहले ही कविता की आँख खुल चुकी थी। रसोई में जाकर उसने चूल्हा जलाया, दूध चढ़ाया, और मन ही मन दिन भर के काम...Read More
सुबह के छह बजे थे। अलार्म बजने से पहले ही कविता की आँख खुल चुकी थी। रसोई में जाकर उसने चूल्हा जलाया, दूध चढ़ाया, और मन ही मन दिन भर के काम...