तीज आने में अभी दस दिन बाकी थे, लेकिन गाँव की हवा में हरियाली और उत्साह पहले ही घुलने लगा था। आँगनों में झूले टंगे थे, चूल्हों पर खीर की खुश...Read More
सुबह का समय था। आँगन में तुलसी के चौरे पर धूप उतर चुकी थी। घर के भीतर रसोई से बर्तनों की खनकती आवाज़ें आ रही थीं। “अरे बहु, ज़रा देख लेना… द...Read More
रात के ग्यारह बज रहे थे। घर में सब सो चुके थे। बच्चों के कमरे से धीमी-सी साँसों की आवाज़ आ रही थी। नीलम दरवाज़े के पास खड़ी, अपने दोनों बेटो...Read More