अपनी पहचान
“क्या हुआ पायल? आज फिर इतनी देर से ऑफिस से आई हो?”
सासूमाँ उर्मिला देवी ने दरवाज़े पर खड़ी पायल को देखते हुए ताने से कहा।
“माँजी, आज मीटिंग थी, इसलिए थोड़ा लेट हो गया,” पायल ने थके हुए स्वर में कहा।
“मीटिंग! मीटिंग! दिन भर बस यही बहाना रहता है। बहू होकर नौकरी करती है, घर के काम का क्या?”
उर्मिला देवी का स्वर तेज़ हो गया।
पायल चुप रही। वह जानती थी कि जितना समझाएगी, उतना ही उलझेगी।
पायल की शादी को दो साल हुए थे। उसका पति अमित एक प्राइवेट कंपनी में काम करता था। सास-ससुर और देवर के साथ एक छोटे से शहर में उनका संयुक्त परिवार था। शादी के बाद से ही पायल ने कोशिश की थी कि सबको खुश रखे — सुबह जल्दी उठना, घर के काम संभालना, फिर ऑफिस जाना, और शाम को लौटकर फिर से रसोई में लग जाना।
लेकिन उसके हर काम में कोई न कोई कमी निकाल दी जाती।
“आज दाल में नमक ज़्यादा है।”
“कपड़े ठीक से नहीं सुखाए।”
“ऑफिस का बहाना बनाकर मायके फोन करती होगी।”
हर दिन कुछ न कुछ सुनना उसकी आदत बन गई थी।
अमित से उसने कई बार बात करने की कोशिश की,
लेकिन वह हर बार यही कहकर टाल देता,
“माँ बूढ़ी हैं, बस ज़ुबान तेज़ है। तुम ध्यान मत दिया करो।”
धीरे-धीरे पायल की मुस्कुराहट गायब होने लगी।
एक दिन पायल के ऑफिस में उसकी मेहनत देखकर बॉस ने कहा —
“पायल, तुम्हारा प्रमोशन तय हो गया है, अब तुम दिल्ली हेड ऑफिस जॉइन करोगी।”
खुशी और डर दोनों उसके मन में थे।
खुशी — क्योंकि उसकी मेहनत रंग लाई थी।
डर — क्योंकि सासूमाँ कैसे रिएक्ट करेंगी।
शाम को उसने हिम्मत जुटाई और सबको बताया।
“माँजी, मुझे प्रमोशन मिला है। अब मेरी पोस्टिंग दिल्ली में हुई है। ये मेरे लिए बहुत बड़ा मौका है, और मैं इसे खोना नहीं चाहती।”
“क्या कहा?” उर्मिला देवी लगभग चिल्लाईं,
“अरे अब बहुएं ही बताएँगी कि कहाँ रहना है, क्या करना है? औरत का काम है घर संभालना, बाहर भागना नहीं!”
अमित कुछ पल तक चुप रहा, फिर बोला —
“माँ, पायल बहुत मेहनत करती है। उसका प्रमोशन मिलना गर्व की बात है।”
“गर्व? बेटा, घर की इज्जत काम से नहीं, रीति-रिवाजों से बनी रहती है!”
पायल के गाल पर आँसू बह निकले। वह बोली,
“माँजी, मैं आपकी इज्जत करती हूँ, पर अब खुद की पहचान भी चाहती हूँ। मैंने इस घर को कभी बोझ नहीं समझा, पर अब अपनी मेहनत की कीमत भी पाना चाहती हूँ। अगर मैं काम करूँ तो गलत, और अगर कुछ बनना चाहूँ तो भी गलत — क्यों माँजी?
आपने अपने बेटे को सिखाया कि वह परिवार का सहारा बने,
लेकिन बहू को क्यों नहीं सिखाया कि वह अपनी पहचान बनाए?
मैं सिर्फ बहू नहीं, एक इंसान भी हूँ —
जिसके अपने सपने, अपनी मेहनत और अपनी जगह है।”
पूरा घर कुछ देर के लिए खामोश हो गया।
उर्मिला देवी के चेहरे पर कई भाव आए — गुस्सा, शर्म, और शायद थोड़ा सा गर्व भी।
उन्होंने धीरे से कहा,
“अगर तुझे जाना है, तो जा पायल।
पर ये मत भूलना — तू जहाँ भी जाएगी, हमारा नाम रोशन करेगी।”
पायल ने माँजी के पैर छुए और कहा,
“बस यही तो चाहती हूँ माँजी — कि आप मुझे रोकें नहीं, बल्कि मेरे साथ खड़ी रहें।”
अमित ने मुस्कुराते हुए उसका हाथ थाम लिया।
“चलो, अब हमारे दोनों के सपने पूरे होंगे।”
कुछ महीने बाद, पायल दिल्ली में थी —
आत्मविश्वास से भरी, मुस्कुराती हुई,
और रोज़ अपनी पहचान को थोड़ा और मजबूत बनाती हुई।
कभी-कभी शाम को उर्मिला देवी वीडियो कॉल पर उससे बात करतीं और गर्व से कहतीं,
“हमारी बहू तो अब ऑफिस की बड़ी अफ़सर बन गई है!”
सीख:
“संस्कार सिर्फ बहू के नहीं, बेटे के भी
होने चाहिए।
और बहू अगर अपनी पहचान बनाना चाहती है, तो उसे रोकना नहीं — सराहना चाहिए।”
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