एक बहन जिसने साबित किया, फर्ज़ की कीमत नहीं होती

 

मोहनलाल अपनी बहन कविता को भावुक होकर गले लगा रहे हैं, repaired दुकान की पृष्ठभूमि में दोनों की आंखों में आंसू और चेहरे पर सुकून है — यह दृश्य भाई-बहन के सच्चे प्यार और फर्ज़ की गहराई दिखाता है।


रात के लगभग साढ़े दस बज रहे थे। मोहनलाल जी अपनी दुकान से लौटकर खाना खा ही रहे थे कि तभी दरवाज़े पर किसी ने ज़ोर से दस्तक दी।

“कौन है इस वक़्त?” उन्होंने आवाज़ दी।


“भैया! जल्दी चलिए, सामने वाले रास्ते में ट्रक ने आपकी दुकान में टक्कर मार दी है!” पड़ोसी रमाकांत भागते हुए बोले।


प्लेट में रखा निवाला अधूरा ही रह गया। मोहनलाल जी ने जूते पहने और बिना कुछ सोचे सड़क की तरफ़ दौड़ पड़े।


जब तक वो वहाँ पहुँचे, आधी दुकान तो ध्वस्त हो चुकी थी। अंदर रखे राशन के बोरे और डिब्बे सड़क पर बिखरे थे। एक तरफ़ पुलिस और दूसरी तरफ़ भीड़ लगी थी।

उनका दिल बैठ गया—वो दुकान ही उनके घर की एकमात्र रोज़ी-रोटी थी।


घर लौटे तो पत्नी सुनीता आँखों में आँसू लिए बैठी थी। “अब क्या होगा जी? राहुल की फीस अगले हफ़्ते भरनी है… और सीमा की शादी की बात भी चल रही है।”


मोहनलाल जी ने थके स्वर में कहा,

“पता नहीं, ऊपरवाला ही कुछ करेगा।”


रात भर वो सो नहीं पाए। अगले दिन बीमा वालों और पुलिस के चक्कर लगाते रहे, पर किसी ने साफ़ कहा—“ट्रक ड्राइवर भाग गया, आपको कुछ नहीं मिलेगा।”


अब स्थिति बहुत खराब हो गई। घर का राशन तक कम पड़ने लगा। तभी एक दिन दरवाज़े पर किसी ने दस्तक दी।


दरवाज़ा खोला तो सामने उनकी छोटी बहन कविता खड़ी थी, हाथ में एक बड़ा बैग लिए।

“भैया! सब सुन लिया मैंने, अब आप चिंता मत कीजिए। जब तक दुकान फिर से नहीं बनती, मैं यहीं रहकर मदद करूंगी।”


मोहनलाल जी बोले,

“कविता, तू अपने घर की फिक्र कर, तेरे भी तो दो बच्चे हैं, खर्चा बढ़ जाएगा।”


कविता मुस्कुराई —

“भैया, जब मेरे माँ-बाप नहीं थे, तो आपने ही तो मेरी शादी करवाई थी, पढ़ाई का खर्च उठाया था। अब वक्त मेरा है कुछ लौटाने का।”


अगले दिन से कविता ने जैसे घर की ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली।

वो सुबह से घर संभालती, फिर बाज़ार जाकर लोगों से बात कर दुकान की मरम्मत के लिए मिस्त्री बुलाती।

उसने अपने गहने गिरवी रख दिए ताकि दुकान की मरम्मत हो सके।


धीरे-धीरे काम शुरू हुआ। तीन हफ़्ते बाद दुकान फिर से तैयार हो गई।

कविता ने कहा,

“भैया, अब इसमें नया माल भरिए, मैंने थोड़ी और रकम का इंतज़ाम कर लिया है।”


मोहनलाल जी की आँखें भर आईं।

“कविता, तूने जो किया, उसका कर्ज़ मैं कभी नहीं चुका पाऊँगा।”


कविता बोली,

“भैया, कर्ज़ तो तब होता है जब कोई गैर मदद करे।

आप मेरे अपने हैं, और अपने फर्ज़ चुकाते नहीं— निभाते हैं।”


धीरे-धीरे कारोबार फिर से चल निकला। दुकान में पहले जैसी रौनक लौट आई।

एक दिन मोहनलाल जी ने कुछ पैसे लेकर कविता के घर जाकर कहा —

“ये रकम तू रख ले, तेरे गहने छुड़ा दे, वरना मुझे चैन नहीं मिलेगा।”


कविता ने पैसे वापस करते हुए कहा,

“भैया, गहने तो फिर बन जाएंगे, पर जो रिश्ता आपने बनाया था, वो अनमोल है।

आपने मुझे बेटी की तरह पाला था, आज वही बेटी अपने पिता के घर की जिम्मेदारी निभा रही थी, बस इतना ही समझिए।”


मोहनलाल जी की आँखें भर आईं। बोले,

“सच कहती है तू, बहन वो नहीं जो सिर्फ़ राखी पर धागा बांधे,

बल्कि वो है जो मुसीबत में भाई की ढाल बन जाए।”


कविता मुस्कुराई और बोली,

“भैया, रिश्ते सिर्फ़ खून के नहीं होते, ज़िम्मेदारी और प्यार से भी निभाए जाते हैं।”


फिर दोनों की आँखें नम थीं, पर दिल सुकून से भरा हुआ था।

क्योंकि उस दिन एक भाई को अपनी बहन में भगवान का रूप दिखा था —

और एक बहन ने साबित कर दिया था कि फर्ज़ की कोई कीमत नहीं होती, वो बस निभाया जाता है।

 शीर्षक: “फर्ज़ की कीमत नहीं होती”


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