एक कप समझदारी
सुबह के आठ बजे थे। नाश्ते की टेबल पर सब बैठे थे।
नेहा रसोई से गरमा-गरम पराठे लेकर आ रही थी। चेहरे पर हल्की थकान थी, आँखों के नीचे काले घेरे साफ दिख रहे थे।
अंकित ने देखा और बोला —
“नेहा, तुम नाश्ता कर लो, फिर ज़रा आराम कर लेना। रितिका अब दादी के साथ खेल लेगी।”
माँ (सुधा जी) बोलीं —
“क्यों भई, अब बहू आराम करेगी? क्या रात को नौकरी पर थी? घर की औरत अगर सुबह-सुबह सो जाए तो घर कैसा लगेगा?”
अंकित ने मुस्कराते हुए कहा —
“माँ, आपको भी पता है रितिका रात को दो-दो बजे तक जागती रहती है। नेहा भी उसी के साथ जागती है। मैं तो सुबह ऑफिस चला जाता हूँ, लेकिन नेहा को तो पूरी रात उठना पड़ता है। इसलिए कह रहा हूँ कि थोड़ी देर सो ले तो ठीक रहेगा।”
माँ ने तुनक कर कहा —
“बेटा, यह तो हर माँ की कहानी होती है। बच्चे के लिए नींद, आराम सब कुर्बान करना पड़ता है। जब मैं तेरे साथ जागती थी तब किसी ने नहीं कहा कि ‘सुधा, तुम आराम कर लो’। तब तो सब कहते थे कि औरत का धर्म है सब सहना।”
अंकित ने धीरे से कहा —
“माँ, वक्त बदल गया है। अब अगर कोई थक जाए तो उसे थोड़ा आराम मिलना ही चाहिए। आखिर इंसान ही तो है।”
यह कहकर वह ऑफिस चला गया।
नेहा ने रितिका को दादी के पास छोड़ा और अपने कमरे में चली गई।
थोड़ी ही देर में सुधा जी बड़बड़ाने लगीं —
“आजकल की लड़कियाँ तो बस बहू बनते ही रानी बन जाती हैं। ये काम नहीं करेंगी, वो नहीं करेंगी। सारा घर इनके पीछे भागे।”
पिता जी (शंकर जी) अख़बार पढ़ते हुए बोले —
“अरे सुधा, इतना गुस्सा क्यों? बहू भी तो हमारी बेटी जैसी है। अगर वह थोड़ा सो जाएगी तो क्या बिगड़ जाएगा? जब तू बीमार पड़ी थी, तब वही दिन-रात तेरी सेवा कर रही थी।”
सुधा जी चिढ़कर बोलीं —
“आप तो बस अपनी बहू के वकील बन गए हैं। पता नहीं किस जन्म का बदला ले रहे हैं मुझसे!”
शंकर जी ने मुस्कराते हुए कहा —
“नहीं सुधा, बस अब उम्र ने बहुत कुछ सिखा दिया है। जब मैं अपनी माँ की हर बात मानता था, तब तुम भी तो यही कहती थीं कि पति को पत्नी की भी सुननी चाहिए। अब वही बात तुम्हारे बेटे ने कर दी तो तुम्हें बुरा लग रहा है।”
सुधा जी चुप हो गईं।
कुछ देर बाद रितिका खेलते-खेलते दादाजी के पास चली गई। शंकर जी ने उसे गोद में लेकर खिलाना शुरू किया।
“आओ मेरी गुड़िया, चलो कहानी सुनाते हैं।”
धीरे-धीरे रितिका हँसने लगी और फिर उनकी गोद में ही सो गई।
सुधा जी ने देखा और ताना मारते हुए बोलीं —
“अब तो सबको बस बहू की नींद की चिंता है। ठीक है, सो लेने दो उसे।”
थोड़ी देर बाद नेहा उठी, देखा सब सो चुके हैं। वह चुपचाप रसोई में गई, दोपहर का खाना बनाया, और फिर घर का सारा काम निपटाने लगी।
शाम को जब अंकित लौटा, तो माँ अकेली चाय पी रही थीं।
“माँ, बाकी सब कहाँ हैं?”
“कहाँ होंगे! बहू तो अब रानी बन गई है, पूरे दिन सोई रही। मैंने ही चाय बना ली।”
अंकित ने कमरे में जाकर देखा — नेहा और रितिका दोनों जाग चुकी थीं और बिस्तर समेट रही थीं।
अंकित ने धीरे से कहा —
“नेहा, माँ नाराज़ हैं। तुमने आज बहुत देर तक आराम कर लिया क्या?”
नेहा बोली —
“नहीं, बस दोपहर को थोड़ी देर आँख लग गई थी। सुबह का सारा काम करने के बाद रितिका को सुलाया, और कब नींद आ गई पता नहीं चला। माँ को गुस्सा आ गया होगा।”
उसी वक्त सुधा जी कमरे में आईं —
“हाँ, गुस्सा तो आएगा ही। पहले तो सास बहू को सिखाती थी, अब बहू सास को सिखाएगी कि कब सोना है, कब काम करना है!”
शंकर जी ने यह सुना और बोले —
“सुधा, बस करो अब। क्यों बार-बार वही पुरानी बातें दोहरा रही हो? तुम भूल गईं क्या, जब तुम्हारी सास तुम्हें रोज़ डांटती थीं, तब तुम रोती थीं? कहती थीं कि ‘काश मेरी सास थोड़ी समझदार होती।’ अब तुम्हारे पास वो मौका है जो तुम्हारी सास के पास नहीं था — अपनी बहू को वो प्यार देने का, जिसकी तुमने खुद तमन्ना की थी।”
सुधा जी कुछ नहीं बोलीं, बस शांति से बैठ गईं।
शंकर जी ने आगे कहा —
“देखो, वक्त बदलता है, लेकिन रिश्तों की नींव वही रहती है — समझदारी। अगर आज तुमने उसकी तकलीफ़ समझ ली, तो कल वो तुम्हारा सहारा बनेगी। वरना वही दिन आएगा जब तुम किसी के बुलावे का इंतज़ार करती रहोगी। प्यार दो, प्यार पाओ।”
नेहा की आँखों में आँसू थे।
“पापा जी, मैं तो बस घर को संभालना चाहती हूँ। अगर कभी मुझसे गलती हो जाए तो डाँट दीजिए, पर गलत समझिए मत।”
सुधा जी ने आगे बढ़कर नेहा का हाथ पकड़ लिया।
“नहीं बेटा, गलती मेरी थी। मैं यह भूल गई थी कि समय बदल गया है। बहू भी इंसान है, मशीन नहीं। तू मेरे बेटे की ज़िंदगी सँवार रही है, और मैं तुझसे शिकायत कर रही थी।”
नेहा ने झुककर उनके पैर छुए।
सुधा जी ने उसे गले से लगाया —
“चल, अब एक कप चाय बना। पर इस बार दोनों मिलकर बनाएँगे।”
नेहा मुस्कराई —
“ज़रूर मम्मी जी।”
और उस दिन के बाद से रसोई में सिर्फ चाय की खुशबू नहीं, रिश्तों की मिठास भी घुलने लगी।
संदेश:
“समझदारी वही है जो रिश्ते जोड़े, तोड़े नहीं।
सास अगर माँ बन जाए और बहू बेटी,
तो घर मंदिर बन जाता है।”
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