अब मैं खुद अपने साथ हूँ
मैं 68 साल का हूँ।
दिल्ली में रेल मंत्रालय में पूरा जीवन नौकरी करते-करते बीत गया।
अब पेंशन आती है, बैंक में ठीक-ठाक पैसे हैं, और द्वारका सेक्टर–7 में मेरा छोटा-सा अपना फ्लैट है।
लोग कहते हैं—
“शर्मा जी, आपकी तो जिंदगी सेट है—पैसा, घर, शांति… अब बस आराम करो।”
लेकिन ये लोग मेरे अंदर की दुनिया नहीं जानते।
मेरी एक बेटी है—रीमा।
और एक बेटा—सुमित।
दोनों अपनी-अपनी जिंदगी में इतने बिज़ी हो गए कि जैसे मैं उनके लिए एक पुराना फर्नीचर बन गया हूँ—जिसे घर में रखा तो है, लेकिन कोई देखता नहीं।
सालों हो गए…
किसी ने पूछा तक नहीं—
“पापा, खाना खाया?”
किसी ने कहा तक नहीं—
“दो दिन के लिए हमारे पास आ जाइए…”
किसी ने अचानक मिलने की कोशिश नहीं की।
बड़े घर में मैं अकेला खाना बनाता था।
कभी-कभी इतनी चुप्पी होती थी कि दीवारों की आवाज़ भी सुनाई देने लगती थी।
एक दिन तेज़ बुखार था, मैं बिस्तर से उठ नहीं पा रहा था।
रीमा को फोन किया—पर उसने नहीं उठाया।
सुमित ने कॉल देखकर बस मेसेज भेजा—
“मीटिंग में हूँ, बाद में बात करता हूँ।”
बाद में?
कब? किस दिन? किस साल?
उस दिन पहली बार मैं खुद को अपने ही घर में अजनबी लगा।
एक नया चेहरा मेरी जिंदगी में आया...
मेरे फ्लोर पर नया पड़ोसी आया—राजेश गुप्ता।
मेरे उम्र का ही था, बस मुझसे थोड़ा छोटा—62 का।
वो रोज़ मुस्कुराकर नमस्ते करता।
कभी सब्जियाँ ले आते, कभी खाली वक्त में मेरे साथ ताश खेल लेते।
धीमा-सा, नरम-सा, और बहुत ही देखभाल करने वाला।
जिस सन्नाटे में मैं जी रहा था, उसमें उनकी बातें किसी गर्म रौशनी जैसी लगती थीं।
एक दिन जब मैं खांस रहा था, तो उन्होंने बिना कुछ कहे घर में खिचड़ी बनाकर दे दी।
मैं पिघल गया।
वो मेरे कमरे की खिड़कियाँ खोल देते।
मेरी दवाई टाइम पर देते।
मेरे साथ बैठकर चाय पीते।
धीरे-धीरे भरोसा बढ़ा…
फिर एहसास भी।
मैंने सोचा—
“शायद भगवान ने अकेलेपन में इन्हीं को भेजा है।”
और इसी भरोसे में मैंने एक बड़ा फैसला कर लिया।
गलत भरोसा...
मैंने अपने पुराने कागज़ चेक करवाने के बहाने राजेश को अपनी फाइलें दिखाईं।
उन्होंने कहा—
“शर्मा जी, वसीयत अपडेट कर लीजिए… ताकि बच्चे बाद में परेशान न हों।”
उनकी बात में मिठास थी, और मैं अकेला था…
मैंने सारा फैसला उन्हीं को सौंप दिया।
कुछ दिनों बाद वसीयत बनाई गई।
पढ़ने की हालत में नहीं था, बस साइन कर दिया।
और धीरे-धीरे बात पूरे मोहल्ले में फैल गई।
एक दोपहर दरवाज़ा खुला—
रीमा, सुमित और उनकी पत्नियाँ अचानक घर में थे।
रीमा ने गुस्से में कहा—
“पापा, सुना है आपने सारी संपत्ति बाहर वालों के नाम कर दी?”
सुमित चिल्लाया—
“हम जिंदा हैं या नहीं? आपको हो क्या गया है?”
मैं रो पड़ा।
“जब मुझे तेज़ बुखार था, कौन आया था?
जब मैं दो रात बिना खाना खाए लेटा था, कौन आया था?
तुम लोग सिर्फ त्योहारों की फोटो डालने में बिज़ी थे…
और मेरा हाल पूछने में फेल।”
तीनों के चेहरे झुक गए।
रीमा ने धीमी आवाज़ में कहा—
“हमें लगा… आप अकेले भी मैनेज कर लेते हैं…”
मैं हंस पड़ा—
एक टूटी हुई हंसी।
“अकेलापन मैनेज नहीं होता, सहा जाता है।”
सच सामने आया...
एक हफ्ते बाद हड़बड़ाहट में दरवाज़ा खटखटाया गया।
नीचे पुलिस थी।
राजेश गुप्ता को गिरफ्तार कर लिया गया था।
आरोप था—
तीन बुज़ुर्गों से गलत तरीके से दस्तावेज़ साइन करवाना।
अकेले रहने वालों को झूठा सहारा दिखाकर जमीन हड़पना।
मेरे पैरों के नीचे की ज़मीन निकल गई।
मैंने पुलिस वाले से पूछा—
“लेकिन… वो तो मेरे लिए खिचड़ी—”
पुलिसवाला बोला—
“यही तरीका था उनका, शर्मा जी। बहुत मीठा बोलकर भरोसा जीतना।”
मेरी आंखों में धुंध छा गई।
कागज़ वापस आ गए, लेकिन भरोसा टूट गया...
कुछ दिनों बाद पुलिस मेरे सारे कागज़ वापस दे गई।
रीमा और सुमित अब रोज़ आने लगे।
लेकिन मैं जानता था—
उनकी चिंता
मेरे स्वास्थ्य से ज्यादा
मेरी संपत्ति से जुड़ी थी।
मोहल्ले वाले कहते—
“अच्छा है, बच्चे सुधर गए!”
मैं कुछ नहीं कहता था।
क्योंकि मुझे पता था—
ये सुधार नहीं, डर था।
नया फैसला...
एक शाम मैंने बच्चों को बुलाया।
टेबल पर एक नई फाइल रखी।
रीमा घबराकर बोली—
“पापा… ये क्या है?”
मैंने कहा—
“नई वसीयत।”
सुमित की सांस अटक गई—
“अब किसे दे दी आपने?”
मैंने मुस्कुराया।
“किसी इंसान को नहीं।”
तीनों हैरान।
मैंने कहा—
“मैंने अपनी सारी संपत्ति एक बुज़ुर्ग सहायता ट्रस्ट के नाम कर दी है।”
“वहाँ वो लोग मदद पाएंगे
जिनकी तरह मैं अकेला था…
लेकिन कम से कम वहाँ कोई राजेश गुप्ता नहीं होगा।”
उनके चेहरे उतर गए।
रीमा बोली—
“हमारा कुछ नहीं, पापा?”
मैंने प्यार से कहा—
“तुम मेरे बच्चे हो—
मेरा दिल हो,
लेकिन दिल और संपत्ति एक जैसे नहीं होते।
संपत्ति ज़िम्मेदारी मांगती है…
और तुमने कभी वो निभाई ही नहीं।”
वे चुप रहे।
उनकी चुप्पी मेरे अंदर तक उतर गई।
उस रात मैं अपने कमरे में बैठा था।
पहली बार अकेलापन बोझ नहीं लग रहा था।
मैंने खुद के लिए चाय बनाई।
कप हाथ में लिया, और खिड़की से बाहर देखते हुए खुद से कहा—
“मैं बूढ़ा हूँ…
लेकिन बेवकूफ नहीं।”
हवा हल्की थी, लेकिन दिल मजबूत।
मैंने धीरे से मुस्कुराकर कहा—
“अब न झूठे सहारे की ज़रूरत…
न बच्चों की मजबूरी वाली मेहरबानी…
अब मैं खुद अपने साथ हूँ।”
बहुत समय बाद मेरी आँखों से आँसू निकले—
पर इस बार वो दर्द के नहीं थे।
ये आँसू आज़ादी के थे।
#ParentsDeserveLove #LonelinessOfOldAge

Post a Comment