माँ की दहलीज़ पर लौटते कदम
घर में शाम की ठंडी हवा बह रही थी। बरामदे में रखी तुलसी के पास लगी घंटी भी हल्की हवा में झनझना उठी, पर मोहनलाल जी के मन की शांति अब भी वैसी ही जमी हुई थी—भारी… चुप… बेचैन।
कमरे में रोशनी तो मौजूद थी, पर दिल को चुभती हुई एक अजीब-सी खामोशी चारों ओर लिपटी हुई थी।
दो लोग थे घर में—मोहनलाल और उनकी पत्नी सुजाता,
पर दोनों अपने-अपने कमरों में जैसे अकेले जी रहे थे।
तभी ऊपर से एक जोरों की आवाज़ आई — जैसे कोई डिब्बा गिरा हो। सुजाता चौंककर रसोई में पहुँची तो देखा—मोहनलाल जी दवाई का डिब्बा उठाकर ठीक कर रहे थे।
“अरे छोड़िए, मैं कर देती हूँ,” सुजाता ने धीमी आवाज़ में कहा।
“हाथ से फिसल गया… पता नहीं कब से इतना ध्यान भटकने लगा है,” मोहनलाल जी धीमी, दबे हुए स्वर में बोले।
“हां, हो जाता है…”
कहते-कहते सुजाता खुद डिब्बा उठाने लगी।
उनकी इस शांत, दर्द से भरी चुप्पी को मोहनलाल अब और नहीं झेल पाए। उन्होंने बात बदलने के लिए कहा—
“सुजाता, चलो ना मंदिर तक टहल आते हैं… मन हल्का होगा।”
“मन नहीं है,” सुजाता ने बस इतना कहा।
मोहनलाल कुछ कह पाते, उससे पहले ही सुजाता की आवाज़ कांप उठी—
“कब तक आर्यन का इंतजार करती रहूँ? कहकर तो आया था कि “माँ, इस बार पक्का अगले हफ्ते आऊँगा।”
तीन हफ्ते निकल गए…”
“अरे आएगा… काम में अटक गया होगा,” मोहनलाल ने समझाना चाहा।
“काम… या बहू अवनि को यहाँ आने में परेशानी है?” सुजाता के स्वर में कराह थी।
मोहनलाल चुप रहे। सुजाता बस बैठ गई और रो पड़ी।
वो माँ थी… दर्द छिपा कहाँ पाती।
आर्यन भी उनका इकलौता बेटा था।
मुश्किल से मिले इस बच्चे के लिए उन्होंने जीवनभर बचत की, उसे पढ़ाया, ऊँचा बनाया।
अब वही बेटा कहीं दूर पुणे में अपनी पत्नी के साथ रहता था।
शादी के बाद से दो साल में बस चार बार आए थे…
और हर बार इतने कम समय के लिए कि सुजाता घड़ी देखकर गिनती करती रह जाती।
अगली सुबह…
मोहनलाल जी ने अचानक तय किया—अब बहुत हुआ।
वो सुजाता को बताए बिना तैयार होकर घर से निकल पड़े।
सीधे पहुँच गए—अवनि के मायके।
दरवाजा खोलते ही अवनि की माँ चौंक गईं—
“अरे समधी जी? इतनी सुबह? सब ठीक तो है!”
“हाँ-हाँ, सब अच्छा है,”
मोहनलाल ने हाथ जोड़कर कहा,
“बस… आपसे एक इजाजत लेने आया हूँ।”
“इजाजत? कैसी इजाजत?” अवनि के पिता भी आ गए।
मोहनलाल मुस्कुराए—एक ऐसी मुस्कान जिसमें दर्द ज़्यादा था—
“देखिए समधी जी, पहले मायके वाले बेटी को छुट्टियों में लेने ससुराल आते थे।
अब जमाना बदल गया है।
तो हमने सोचा—क्यों ना हम बेटे को लेने मायके आ जाएँ?”
दोनों समधी-सम्मधन एकदम सकपका गए।
अवनि के पिता ने पूछा—
“क्या मतलब? आर्यन तो यहीं है। उसे तो आने में क्या…?”
आर्यन और अवनि पिछले दो दिनों से अवनि के मायके में ही ठहरे हुए थे, इसलिए जब मोहनलाल जी अचानक वहाँ पहुँचे, तो दोनों उसी घर में मौजूद मिले।
मोहनलाल जी की आँखें थोड़ी नम हुईं—
“हाँ, है तो यहीं…
पर वो भी तो आपकी बेटी के मायके का मेहमान ही बन गया।
हमारे घर में तो बस त्योहारों जैसे आता है।”
अवनि अंदर बैठी सब सुन रही थी।
उसका चेहरा उतर चुका था।
मोहनलाल आगे बोले—
“सुजाता… मेरी पत्नी…
वो सालभर कुछ नहीं कहती।
बस अपने बेटे का इंतज़ार करती रहती है।
उसकी सूनी चौखट हर बार और सूनी होती जा रही है।
आर्यन कुछ कहता नहीं… क्योंकि बहुओं की नाराज़गी से बेटों की आवाज़ दब जाती है।”
अवनि के पिता ने एक लंबी साँस ली।
फिर अपनी बेटी से कहा—
“अवनि, बेटी… हमसे गलती हुई।
हमने कभी ध्यान ही नहीं दिया कि तुम वहाँ जाकर कैसा व्यवहार करती हो।
तुम्हारे सास-ससुर भी तुम्हारे ही बड़े हैं, उनका मान रखना भी उतना ही ज़रूरी है।
अगर अपने मायके वालों से मिलने का फर्ज़ निभाती हो, तो ससुराल वालों से मिलने और उनका आदर करने की जिम्मेदारी भी तुम्हारी ही है।”
फिर उन्होंने ठोस आवाज़ में कहा—
“जाओ, अपना सामान पैक करो।
आज तुम अपने ससुराल जाओगी — बेटी बनकर, न कि मेहमान बनकर।”
अवनि की माँ भी बोलीं—
“ससुराल और मायके दोनों बराबर होते हैं, दोनों का मान रखना पड़ता है।”
अवनि कुछ नहीं बोली।
सिर्फ सिर झुकाकर अंदर गई और सामान पैक करने लगी।
जब घर का दरवाज़ा खुला…
घर की डोरबेल बजी।
सुजाता ने दरवाजा खोला।
सामने—आर्यन और अवनि… दोनों खड़े थे।
सुजाता पल भर को निशब्द रह गई।
फिर आवाज़ काँप गई—
“अरे… तुम दोनों? आज ही जाने वाले थे ना?”
आर्यन अपराधी-सा मुस्कुराया—
“नहीं माँ… इस बार हम यहीं रुकेंगे।
“माँ, बहुत दिनों से आपकी कमी महसूस हो रही थी…”
सुजाता का चेहरा खिल गया।
वो भीतर जाकर थाली लाई, दोनों की आरती उतारी और घर में अंदर आने दिया।
कुछ देर बाद मोहनलाल भी घर पहुँचे।
सुजाता खुशी से बोली—
“देखिए, बच्चे रुकने वाले हैं! कई दिनों बाद घर में रौनक होगी।”
मोहनलाल मुस्कुरा दिए—
“हाँ, बहुत अच्छी बात है।”
फिर चुपचाप अपने कमरे में चले गए।
उन्होंने अपनी पत्नी को कभी नहीं बताया…
कि आज बेटे को लाने वह खुद गए थे।
ना ही आर्यन-अवनि को बताया कि बात कितनी दूर तक गई
थी।
क्योंकि वो एक माँ का भरोसा टूटने नहीं देना चाहते थे।
उसे बस इतना ही पता चले कि—
बच्चे आए हैं… अपने मन से आए हैं…
और उसके लिए आए हैं।
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