सीमा की चुप्पी
“सीमा, ज़रा जल्दी कर! बार-बार याद दिलाना पड़ता है तुझे।”
दीपक की आवाज़ पूरे घर में गूंज रही थी।
सीमा ने जल्दी-जल्दी अपने बालों में कंघी की, साड़ी ठीक की और जवाब दिया —
“बस पाँच मिनट दीजिए, निकल ही रही हूँ।”
“हर बार यही कहती हो, पाँच मिनट, पाँच मिनट। शादी को बीस साल हो गए, पर तेरी यही आदत नहीं गई।”
दीपक ने झल्लाते हुए दरवाज़ा ज़ोर से पटका।
सीमा कुछ नहीं बोली। उसे अब गुस्से की आदत हो चुकी थी।
वो शांत रही, जैसे हमेशा रहती थी।
आज सीमा के पिताजी की बरसी थी। हर साल वो जाना चाहती थी,
पर दीपक को ये बात कभी पसंद नहीं आती थी।
“हर साल वही रोना-धोना देखकर क्या मिलेगा?”
दीपक का यही जवाब होता था।
लेकिन इस बार सीमा के भाई विनोद का फोन आया —
“दीपक जी, इस बार तो सीमा को ज़रूर भेजिए, पंडित जी ने कहा है कि बेटी का होना ज़रूरी है।”
दीपक ने अनमने मन से हामी भर दी।
सीमा को पहली बार अपने मायके जाने की इजाज़त मिली थी —
पूरे पाँच साल बाद।
ट्रेन में बैठी सीमा खिड़की से बाहर देख रही थी।
हर पेड़, हर खेत उसे अपना-सा लग रहा था।
वो मुस्कुरा रही थी, पर आँखों में नमी थी।
“कितना बदल गया सब कुछ...” उसने सोचा।
उसे याद आया, कैसे बचपन में वो और उसकी बहनें खेतों में दौड़ती थीं,
कुएँ पर पानी भरती थीं, और माँ के साथ रोटी बेलती थीं।
अब वो सब बीते ज़माने की बात लग रही थी।
ट्रेन जब उसके गाँव के स्टेशन पर पहुँची, तो दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।
“क्या पापा का घर अब भी वैसा ही होगा?”
गाँव के रास्ते से गुजरते हुए उसने देखा —
जहाँ कभी कच्चे मकान थे, अब पक्के घर बन चुके थे।
जहाँ मिट्टी की खुशबू आती थी, वहाँ अब सीमेंट की दीवारों की ठंडक थी।
घर पहुँची तो दरवाज़े पर भाई विनोद मिला।
चेहरे पर उम्र की लकीरें साफ दिख रही थीं,
पर आँखों में वही अपनापन था।
“दीदी!” विनोद ने आवाज़ लगाई।
सीमा कुछ कह न सकी, बस दौड़कर भाई के गले लग गई।
दोनों की आँखें भर आईं।
“कितने साल हो गए दीदी… तुम तो भूल ही गई मायका।”
सीमा रोते हुए बोली,
“भूलने की कोशिश नहीं की भाई,
बस हालात ने भूलने पर मजबूर कर दिया।”
घर के आँगन में पाँव रखते ही उसे माँ की याद आ गई।
दीवार पर पापा की फोटो टंगी थी —
माथे पर तिलक, फूलों की माला और नीचे दीपक की लौ टिमटिमा रही थी।
सीमा ने धीरे से कहा,
“पापा, देखिए, आपकी बिटिया आ गई।”
पापा की मुस्कराती तस्वीर देख उसकी आँखों से आँसू टपक पड़े।
वो ज़मीन पर बैठ गई और बोली —
“आपने तो हमेशा कहा था, बेटी का घर मायका कभी बंद नहीं होना चाहिए…
पर मैंने खुद अपने ही हाथों से वो दरवाज़ा बंद कर दिया था।”
शाम को जब सब खाना खा रहे थे, तो भाभी बोलीं —
“दीदी, आप रुको ना कुछ दिन और। घर में आपकी हँसी की बहुत कमी थी।”
सीमा ने मुस्कुराकर कहा,
“मन तो है भाभी, पर घर पर सब मुझ पर निर्भर हैं।”
भाई विनोद ने हँसते हुए कहा,
“दीदी, ये मत कहना कि जीजाजी खाना नहीं बना सकते!”
सीमा ने चुपचाप नज़रें झुका लीं।
भाभी ने बात बदल दी —
“चलो, कल तुम्हें पुराने बाग में ले चलते हैं। बचपन में तुम वहीं तो झूला झूलती थीं।”
अगले दिन सीमा बाग में पहुँची।
पेड़ तो वही थे, पर झूले की जगह अब बच्चों के झूले लगे थे।
वो मुस्कुराई, फिर आँखे मूँद लीं।
उसे लगा जैसे बचपन की अपनी सहेली राधा पुकार रही हो —
“सीमा, धीरे झूलना, वरना गिर जाएगी!”
वो हँस पड़ी, खुद से, अपनी यादों से।
उसी समय पीछे से किसी ने कहा,
“दीदी, आओ, माँ बुला रही हैं।”
सीमा ने मुड़कर देखा —
भाई की बेटी, अनन्या, वही उम्र, वही मासूमियत जो कभी उसकी अपनी थी।
सीमा ने उसे गले से लगा लिया और बोली,
“बिटिया, कभी अपने मायके को मत भूलना… चाहे कितनी भी दूर चली जाओ।”
सीमा वापस ससुराल लौटने से पहले पापा की तस्वीर के पास बैठी और धीरे से बोली —
“पापा, अब मैं अक्सर आऊँगी,
क्योंकि मायका सिर्फ जगह नहीं होता,
वो एक अहसास होता है —
जहाँ बेटी खुद को बेटी महसूस करती है।”
उस दिन पहली बार, सीमा के चेहरे पर सुकून की मुस्कान थी।
सीख:
हर बेटी के लिए उसका मायका वो दरवाज़ा है जहाँ
वो बिना किसी डर के सांस ले सकती है।
मायका कभी बोझ नहीं होता —
वो तो वो ठिकाना है जहाँ से लड़की की आत्मा को शांति मिलती है।
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