आख़िरी रेलगाड़ी

 

धुंध से भरे रेलवे स्टेशन पर एक बुजुर्ग मजदूर फटे कपड़ों में प्लेटफॉर्म पर बैठा है, उसके सामने उसका बेटा—एक युवा रेलवे अधिकारी—आँसू भरी आँखों से उसकी पुरानी डायरी पकड़े खड़ा है। पटरियाँ दूर धुंध में खो रही हैं और माहौल बेहद भावुक है।


शहर का पुराना रेलवे स्टेशन…

सुबह का धुंधलका था, कोहरे में पटरियाँ जैसे किसी भूली याद की तरह गायब हो रही थीं।

एक दुबला-पतला, झुका हुआ सा आदमी प्लेटफॉर्म पर बैठा था—

फटी शर्ट, हाथों में दरारें, और आँखों में अजीब-सी शांति।


उसका नाम था भोला प्रसाद।


वह रेलवे लाइन पर मजदूरी करता था— पटरियाँ बिछाना, बोल्ट कसना, और गर्मी-सर्दी में काम करना।

लेकिन एक समय था… जब वह मजदूर नहीं था।


पंद्रह साल पहले—

भोला इस स्टेशन का सबसे मशहूर लोको पायलट था।

लोग कहते थे— “भोला इंजन नहीं चलाता, जैसे कहानी सुनाता है।”

बच्चे दूर से हाथ हिलाते थे, और वह मुस्कुराकर सीटी बजाता हुआ गुजर जाता था।


उसकी एक छोटी-सी दुनिया थी—

पत्नी सुशीला, और पाँच साल का बेटा— छोटू।

छोटू की दुनिया भी रेलगाड़ियों के इर्द-गिर्द घूमती थी।


हर शाम भोला उसे अपनी गोद में बैठाकर कहता—

“एक दिन तू बड़ी गाड़ी चलाएगा… मुझसे भी तेज।”


छोटू हँसते हुए कहता—

“पापा, मैं आपकी गाड़ी में आपको घुमाऊँगा!”


पर खुशियाँ भी कितने दिन ठहरती हैं?


एक शाम, तेज़ बारिश के बीच अचानक एक पैसेंजर ट्रेन पटरी से उतर गई।

जाँच हुई— और पूरा इल्ज़ाम भोला पर लग गया।

बोला गया कि उसने ब्रेक समय पर नहीं लगाए।

हालाँकि असली वजह थी— खराब ट्रैक, ढीले बोल्ट, और भ्रष्ट अधिकारियों की लापरवाही।


लेकिन उस रात…

भोला का यूनिफॉर्म छीन लिया गया।

उसकी नौकरी चली गई।

उसकी इज़्ज़त मिट्टी में मिल गई।


सुशीला यह सदमा न झेल सकी।

बीमार पड़ी और कुछ महीनों में ही चल बसी।

छोटू को गाँव के सरकारी अनाथालय भेज दिया गया—

क्योंकि भोला के पास न पैसा था, न घर।


भोला…

जो कभी इंजन चालक था, अब मजदूर बन गया—

उसी रेल का, जिसने उसकी ज़िंदगी पलट दी थी।


पंद्रह साल बाद, एक खबर आई—

“रेलवे स्टेशन का पुनर्निर्माण होगा। पुराने मजदूरों को काम दिया जाएगा।”


भोला आया… सिर्फ काम के लिए नहीं।

वह आया था अपने बेटे के लिए।


उसे सुना था—

छोटू अब बड़ा हो गया है, पढ़-लिखकर कहीं अच्छा काम कर रहा है।

किसी ने कहा— “वह इसी शहर में रेलवे ऑफिसर है।”


भोला पूरे दिन पटरी के पास काम करता, और शाम को स्टेशन पर बैठकर हर चेहरे को देखता।

हर बार सोचता—

“शायद ये मेरा छोटू हो… शायद ये…”


पर कोई उसे पहचानता नहीं।


एक शाम स्टेशन मास्टर ने उसे झिड़क दिया—

“ओए बुजुर्ग! प्लेटफॉर्म पर मत सोया कर, लोगों को डर लगता है।”


भोला ने बस सिर हिला दिया।

वह जानता था— अब वह किसी की नजर में बस एक मजदूर था।


अगले दिन नई चमचमाती गाड़ी स्टेशन पर रुकी।

गाड़ी में से एक स्मार्ट युवक उतरा—

सूट पहने, हाथ में फाइलें, और चेहरे पर आत्मविश्वास।


स्टेशन मास्टर भागकर बोला—

“साहब, स्वागत है! आप ही नए रेलवे सेफ्टी ऑफिसर हैं?”


युवक ने सिर हिलाया—

“हाँ, मैं आदित्य कुमार प्रसाद।”


भोला जो कुछ दूर बैठा था, यह नाम सुनकर काँप गया।


आदित्य…

ये तो उसके छोटू का असली नाम था।

वह काँपते कदमों से आगे बढ़ा।


“बेटा…?”


युवक पलटा—

“जी? आप कौन?”


भोला ने काँपती आवाज़ में कहा—

“मैं… मैं तुम्हारा बाप हूँ। भोला… भोला प्रसाद…”


आदित्य एकदम पीछे हट गया।

उसकी आँखों में अविश्वास था।


“नहीं… मेरे पापा तो रेल दुर्घटना में दोषी थे। वो तो सब छोड़कर चले गए। मैं अनाथालय में बड़ा हुआ हूँ… वो कभी मुझसे मिलने भी नहीं आए।”

भोला की आँखों से आँसू गिर पड़े।


“बेटा… मैं आया था…

हर महीने आता था।

पर वो लोग कहते थे— ‘मिलने नहीं दे सकते।’

मेरी हालत देखकर शायद उन्हें शर्म आती थी…”


आदित्य चुप रहा।

भूली-बिसरी यादें जैसे मन में चुभने लगीं—

पापा की सीटी, पापा की गोद, गाड़ियों की कहानियाँ…


भोला ने अपनी गंदी थैली से एक मुड़ी-तुड़ी डायरी निकाली—

जिसमें छोटे-छोटे स्टेशन के टिकट चिपके थे, और हर टिकट के पास एक लाइन—


“छोटू, आज भी पापा तुम्हें याद करते हैं।”


आदित्य के होंठ कांप उठे।

वह डायरी पकड़ न पाया।


उसी वक्त तेज सीटी बजी।

सामने वही पुरानी लाइन थी—

जहाँ बोल्ट ढीले थे, और मजदूर वहाँ काम कर रहे थे।


अचानक स्टेशन पर हड़कंप मच गया—

“साहब! पटरियों पर दरार है!”

“गाड़ी नहीं रोक सकते, वायरलेस काम नहीं कर रहा!”


हर कोई घबरा गया।

कोई समझ नहीं पा रहा था कि क्या किया जाए।


भोला एकदम दौड़ा।

उसे पटरियों का हर मोड़ याद था—

कौन सा बोल्ट कहाँ ढीला हो सकता है।


वह बिना सोचे-समझे ट्रैक पर कूद गया—

और अपने हाथों से बोल्ट कसने लगा।

तेज गाड़ी की हेडलाइट सामने थी—

सब चिल्ला रहे थे— “हट जाओ!”


पर भोला नहीं हटा।

उसने आखिरी बोल्ट कसकर सीटी मारी—

वही सीटी, जो वह कभी ड्राइवर रहते हुए बजाता था।


गाड़ी सुरक्षित गुजर गई।

लेकिन जब धुआँ हटने के बाद लोगों ने नीचे देखा—

भोला ट्रैक के किनारे अचेत पड़ा था।


वह बच नहीं सका।


आदित्य दौड़ा, उसे गोद में उठा लिया।

उसके हाथ काँप रहे थे।


“पापा… अब पहचान लिया मैंने…

आप दोषी नहीं थे…

आप तो हीरो थे…”


भोला ने आखिरी बार आँखें खोलीं।

उसकी सूखी आवाज़ निकली—


“आज… तूने गाड़ी बचाई… मुझे गर्व है…”


और उसकी सांसें थम गईं।


उस दिन पहली बार स्टेशन पर कोई खामोशी टूटकर रोई।

आदित्य कई मिनटों तक अपने पिता को पकड़े बैठा रहा।


कुछ हफ्तों बाद—

स्टेशन के नए बोर्ड पर एक नाम लिखा गया—


“भोला प्रसाद पथ — उस लोको पायलट की याद में, जिसने रेल, ड्यूटी और अपने बेटे के लिए जान दी।”


और आदित्य ने एक नया नियम बनाया—

रेलवे के हर मजदूर के बच्चे को मुफ्त शिक्षा।


उसने एक छोटा सा कमरा बनवाया—

जिसमें भोला की डायरी, पुरानी सीटी, और एक यूनिफॉर्म रखी थी।


हर सुबह जब वह काम पर निकलता, वह उस कमरे के सामने खड़ा होकर कहता—


“पापा… आज मैं आपकी गाड़ी चला रहा हूँ।”


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