मां की आस्था और बहू का डर
“बेटा, इस बार हमें भुवनेश्वर जाना है,” सावित्री देवी ने अपने बेटे विकास से कहा।
“क्यों मम्मी? कोई ख़ास वजह?”
सावित्री देवी मुस्कुराईं, “इस बार हमारे कुलदेवता का बड़ा उत्सव है। और तुम जानते हो, तुम्हारी शादी के बाद मेरी एक मन्नत अधूरी रह गई थी। इस बार उसे पूरा करना है।”
विकास ने सिर हिलाया, “ठीक है मम्मी, मैं छुट्टी ले लेता हूं। टिकट भी बुक कर दूँगा।"
पास में खड़ी विकास की पत्नी अंजलि धीरे से बोली,
“माँ… वहाँ हमारे लिए रहने का इंतज़ाम हो जाएगा न? पिछले साल तो गाँव में पानी और बाथरूम दोनों की बहुत दिक्कत थी।”
सावित्री देवी गर्व से बोलीं,
“इस बार तुम्हें कोई परेशानी नहीं होगी। तुम्हारे ताऊ जी ने घर की मरम्मत करवाई है। सब कुछ ठीक है।”
अंजलि ने राहत की सांस ली, लेकिन फिर भी मन में हल्की चिंता थी।
8 साल की लंबी प्रतीक्षा...
विकास और अंजलि की शादी को कई साल हो चुके थे, लेकिन उन्हें संतान का सुख नहीं मिला था।
इलाज करवाए, डॉक्टर बदले, दवाइयों पर भरोसा किया… और जब उम्मीद टूटने लगी, तब मन्नतें और प्रार्थनाएँ भी कीं। दोनों ने अपनी तरफ़ से हर संभव कोशिश की थी।
एक शाम अंजलि बेहद दुःखी होकर कमरे में बैठी रो रही थी। तभी सावित्री देवी अंदर आईं।
“बहू, ऐसे रोते नहीं। भगवान देरी करते हैं, पर देते ज़रूर हैं,” उन्होंने अंजलि का सिर सहलाते हुए कहा।
“मम्मी, मैंने सब कुछ किया है… पर कुछ नहीं हुआ।”
अंजलि का दिल टूट चुका था।
सावित्री देवी ने धीरे से कहा,
“मैंने एक मन्नत माँगी थी। हमारे कुलदेवता से।
मैंने उनसे कहा था – ‘मेरी बहू की गोद भरना, मैं पूरी श्रद्धा से पूजा करूँगी।’
बहू, मेरी बात मानो… एक बार हम वहाँ चलकर पूजा कर लें। मुझे विश्वास है, भगवान सब ठीक करेंगे।”
अंजलि ने आँसू पोंछे,
“ठीक है मम्मी… आपकी इच्छा।”
एक साल बाद — भगवान की कृपा...
कुछ ही महीनों में अंजलि गर्भवती हो गई।
पूरा घर ख़ुशी से नाच उठा।
बच्ची हुई—सुंदर, नन्ही, हंसमुख।
नाम रखा—अन्वी।
जब अन्वी एक साल की हुई, सावित्री बोलीं,
“बहू, अब मेरी मन्नत का समय आ गया है। इस बार हमें गाँव ज़रूर जाना है।"
यात्रा की तैयारी...
विकास ने टिकट बुक किए।
पूरा परिवार भुवनेश्वर पहुँचा।
गाँव वाले बड़े प्रेम से उन्हें अपने घर ले गए।
“मम्मी, पूजा में हमें क्या-क्या करना होगा? कोई बुकिंग वगैरह करनी है क्या?” विकास ने पूछा।
“सब हो गया है। बस कल सुबह जल्दी निकलना है,” सावित्री देवी ने समझाया।
अगले दिन मंदिर में बहुत भीड़ थी। ढोल-नगाड़े, फूल, दीपक… एक बड़ा उत्सव चल रहा था।
अंजलि ने आश्चर्य से पूछा,
“मम्मी, इतनी बड़ी पूजा होती है? आपने तो बताया ही नहीं।”
सावित्री देवी हँस पड़ीं,
“अरे बहू, भगवान के घर आने पर बड़ा स्वागत होता है।”
मंदिर के पुजारी ने सावित्री देवी और उनके परिवार को आगे बुलाया।
“आपकी मन्नत पूरी हुई है, इसलिए आपको विशेष पूजा करनी है,” पुजारी ने कहा।
अंजलि की चिंता...
पुजारी ने समझाया,
“आपकी बच्ची को भगवान के चरणों के पास 1 मिनट के लिए बैठाना है। यह आशिर्वाद की परंपरा है। बस इतना ही।”
अंजलि घबरा गई,
“बच्ची इतनी छोटी… कहीं उसे डर न लगे।”
सावित्री देवी ने आश्वासन दिया,
“डरने की जरूरत नहीं, हम सब यहीं हैं।”
लेकिन अंजलि की ममता उसे रोक रही थी।
आखिरकार उसने धीरे से कहा,
“ठीक है… पर मैं उसके पास ही रहूंगी।”
अन्वी का मासूम विश्वास...
पुजारी ने छोटी अन्वी को फूलों के बीच भगवान की प्रतिमा के सामने बिठाया।
ढोल बज रहे थे, पर बच्ची बिलकुल शांत थी।
उसी वक्त अन्वी ने अपने नन्हे हाथ जोड़ दिए।
भीड़ में “जय-जयकार” हुई।
अंजलि की आँखों में आँसू आ गए।
विकास का दिल गर्व से भर गया।
पूजा खत्म होते ही अन्वी अपनी मम्मी को देखते ही खुशी से हाथ फैलाते हुए उनकी तरफ दौड़ी और मीठी तोतली आवाज़ में बोली—
“मां… माँ…” कहते हुए वह मम्मी से लिपट गई, जैसे कुछ बहुत अच्छा हुआ हो।
पूरा परिवार भावुक हो उठा।
घर वापस आकर…
अंजलि ने सावित्री देवी से पूछा,
“मम्मी, आपको बिल्कुल डर नहीं लगा? मैं तो बहुत घबरा गई थी।”
सावित्री ने मुस्कुराकर कहा,
“मुझे भगवान पर पूरा विश्वास था, बहू।
वह हमें कभी नुकसान नहीं होने देंगे।
उन्होंने हमें 8 साल बाद यह बेटी दी है…
जो देते हैं, वही संभालते भी हैं।”
विकास ने कहा,
“मम्मी, आज समझ आया… आस्था और अंधविश्वास में फर्क होता है।
आज की रस्म खूबसूरत थी, सुरक्षित थी… और दिल को छू गई।”
सावित्री देवी बोलीं,
“बस यही समझ लो बेटा—
भगवान डराने के लिए नहीं, सहारा देने के लिए होते हैं।"
सीख:
आस्था में शक्ति होती है, पर किसी को डराना आस्था नहीं।
माँ की ममता और भगवान की कृपा हमेशा बच्चे की रक्षा करती है।
परिवार तब सुंदर बनता है जब एक-दूसरे की भावनाएँ समझी जाएँ।
विश्वास और प्रेम मिलकर चमत्कार बनाते हैं।
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