माँ का स्कूल

 

गाँव के आँगन में बेटी अपनी माँ को लिखना सिखा रही है — एक भावनात्मक दृश्य जो नारी शिक्षा और सशक्तिकरण को दर्शाता है।


सुबह के आठ बजे थे। सूरज की हल्की किरणें खिड़की से अंदर आ रही थीं। आशा अपने घर के बाहर लगी छोटी सी चौकी पर बैठी, स्कूल की कॉपियाँ जाँच रही थी।

वह सरकारी स्कूल में अध्यापिका थी, लेकिन आजकल कुछ और सोच रही थी।


बगल वाले कमरे में उसकी माँ चुपचाप बैठी थीं। साठ साल की हो चली थीं, पर चेहरे पर आज भी एक अद्भुत शांति थी। कभी-कभी वे खिड़की से झाँककर बच्चों को स्कूल जाते देखतीं और मुस्कुरातीं।


आशा ने धीरे से कहा,

“अम्मा, आप भी चलिए ना मेरे साथ स्कूल। वहाँ सब बच्चे आपको देखकर बहुत खुश होंगे।”


माँ ने मुस्कुराकर कहा,

“बेटी, अब मेरी उम्र किताबों की नहीं रही। मैं तो बस तेरे बचपन की कॉपियाँ देखती हूँ तेरी आँखों में।”


आशा हँस दी, लेकिन उसके मन में एक विचार पनप चुका था।

वह बचपन में देखती थी — उसकी माँ बहुत समझदार थीं, पर पढ़ नहीं पाई थीं। पिता के गुजर जाने के बाद माँ ने खेतों में मजदूरी करके उसे पढ़ाया था।


रात को जब सब सो गए, आशा अपनी माँ के पास बैठी और बोली —

“अम्मा, अगर मैं आपको सिखाऊँ, तो आप पढ़ेंगी?”


माँ ने चौंककर कहा,

“मैं? इस उम्र में? अब तो चश्मा लगाकर भी सुई में धागा नहीं डाल पाती हूँ!”


“तो क्या हुआ!” आशा ने प्यार से कहा, “पढ़ाई की कोई उम्र नहीं होती। आपने मुझे सिखाया था कि कभी हार नहीं माननी चाहिए। अब मेरी बारी है आपको सिखाने की।”


माँ हँस दीं,

“तू भी न पगली है, पर ठीक है, कोशिश कर देखते हैं।”



अगले दिन से घर में एक नया स्कूल खुल गया — “माँ का स्कूल”।

सुबह-सुबह रसोई में रोटी सेंकते हुए माँ ‘क’ से ‘कबूतर’ और ‘ख’ से ‘खरगोश’ दोहरातीं।

आशा उन्हें स्लेट पर लिखना सिखाती।

कभी आटे में उँगली से अक्षर बनातीं, तो कभी अखबार पर पेन से नाम लिखने की कोशिश करतीं।


पहले दिन बहुत मुश्किल हुआ।

माँ कहतीं — “रेखाएँ टेढ़ी हो रही हैं।”

आशा हँसकर कहती — “सीधी रेखा ज़िंदगी में भी कब रही अम्मा!”


धीरे-धीरे शब्द बनने लगे — ‘माँ’, ‘बेटी’, ‘घर’, ‘आशा’।

जब पहली बार माँ ने अपना नाम लिखा — “सवित्री”, तो उनकी आँखों से आँसू बह निकले।

“अब मैं भी अपने नाम पर दस्तखत कर सकती हूँ,” उन्होंने गर्व से कहा।



गाँव में यह बात फैल गई कि आशा अपनी माँ को पढ़ा रही है।

पहले तो लोग हँसे — “क्या करेगी पढ़-लिखकर सवित्री? उम्र देखो जरा!”


लेकिन कुछ दिनों बाद, वही औरतें सवित्री के घर आने लगीं।

“भाभी, हमें भी सिखाओ ना थोड़ा-बहुत। अपने बच्चों की कॉपी तो पढ़ लिया करें।”


सवित्री मुस्कुराई,

“अब मैं गुरु बनूँगी क्या?”

आशा ने कहा — “क्यों नहीं अम्मा, यही तो असली पढ़ाई है — दूसरों को सिखाना।”


धीरे-धीरे शाम को घर के आँगन में पाँच-छह औरतें आने लगीं।

कोई सब्जी काटते हुए ‘अ’ ‘आ’ बोलती, तो कोई पानी भरते समय गिनती दोहराती।

गाँव में हँसी-खुशी का माहौल था।



एक दिन स्कूल में “साक्षरता दिवस” मनाया जा रहा था।

आशा ने अपनी माँ और उनकी छात्राओं को भी बुलाया।

मंच पर जब सवित्री ने माइक पकड़कर कहा —

“मेरा नाम सवित्री है। अब मैं अपना नाम खुद लिख सकती हूँ।”

तो पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा।


जिला अधिकारी ने उन्हें सम्मानित किया और कहा —

“सवित्री जी, आपने साबित किया कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती। आपने सैकड़ों महिलाओं को प्रेरणा दी है।”


आशा की आँखें भर आईं।

उसकी माँ ने उसके सिर पर हाथ रखकर कहा —

“बेटी, तूने मुझे माँ से गुरु बना दिया।”



कहानी की सीख:

कभी-कभी शिक्षा किताबों से नहीं, हिम्मत और प्यार से

 मिलती है।

जिसने दूसरों के लिए अपना सब कुछ दिया,

वही असली “माँ” और असली “शिक्षक” है।


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