सफ़र अधूरा नहीं रहता

 

A husband rushing for an urgent work trip realizes his mistake and reconnects with his family through love, understanding, and a heartfelt phone call.


शाम के लगभग 7 बज रहे थे। घर में हल्की भागदौड़, रसोई में भाप उठती सब्ज़ी की खुशबू और टीवी पर धीमी आवाज़ में चलता न्यूज़ चैनल— सब कुछ रोज़ जैसा ही था, बस रोहित का चेहरा गायब था।


आज रोहित को अहमदाबाद ऑफिस के अचानक बुलावे पर रात 10 बजे की फ्लाइट लेनी थी। 8 बजे तक एयरपोर्ट निकलना जरुरी था।

पर 7 बज चुके थे और वह अभी तक घर नहीं पहुँचा था।


शालिनी किचन में खड़ी-खड़ी बार–बार घड़ी देख रही थी।

ऊपर कमरे में रोहित की मां भी बड़बड़ा रही थीं—


“जब भी कहीं जाना होता है, इसी तरह हड़बड़ी! पहले से नहीं बता सकता था? मैं तो उसके लिए लड्डू भी बनाने वाली थी, अब ले जाएगा कि नहीं…”


शालिनी ने धीमे से कहा,

“मां, वो भी ऑफिस में परेशान होगा। आते ही पूछ लूँगी।”


उधर बच्चे—अयान और कृतिका—सोफे पर मुंह फुलाए बैठे थे।


“पापा ने वादा किया था कि रविवार को हमें साइंस सेंटर ले जाएंगे। अब फिर ऑफिस, ऑफिस!”

अयान नाराज़ हो कर बोला।


शालिनी सबका मन संभालती, खुद भी चिंता में डूबी थी।

“कहीं ट्रैफिक में न फँस गया हो…” उसने सोचा।


तभी अचानक डोरबेल बजी।

उम्मीद और नाराज़गी के मिले-जुले भावों के साथ शालिनी ने दरवाज़ा खोला।


रोहित तेज़ी से अंदर आया—

“बहुत लेट हो गया हूँ! बैग पैक हुआ या नहीं? खाना रखा है या नहीं? मां को बोल देना मैं जल्दी आ जाऊँगा, बच्चों से कहना—अगला वीकेंड कहीं भी ले जाऊँगा!”


उसकी आवाज़ चिड़चिड़ी थी।

शालिनी चुपचाप उन्हें देखती रही।


मां कमरे से बाहर आईं—


“लो भई, ये लड्डू लेकर जा। दीपा (उसकी छोटी बहन) को भी दे देना। और हाँ, ये शॉल भी—”


रोहित ने बिना देखे कहा,

“मां! अभी ये सब रखने का टाइम नहीं है!”


बच्चे पास आए,

“पापा—”


“बाद में बात करना, अभी मत परेशान करो!”

रोहित ने उन्हें भी झिड़क दिया।


शालिनी ने धीमे से पूछा,

“खाना लगा दूँ?”


“नहीं! टाइम कहाँ है अभी खाने का!”

रोहित बैग उठाकर दरवाज़े की ओर बढ़ गया।


कैब नीचे इंतज़ार कर रही थी।


रोहित गुस्से में चला गया।

पीछे बच्चों का उदास चेहरा और मां की चिंता भरी सांसें रह गईं।

शालिनी ने दरवाज़ा धीरे से बंद कर लिया।



कैब में बैठते ही…


रोहित की आँखें थोड़ी देर में ठंडी हुईं तो दिल भारी होने लगा।

पूरा दिन ऑफिस में तनाव था, उस तनाव की आग में वो घर वालों पर चिल्ला आया था।


उसे याद आया—

सुबह से उसने ठीक से कुछ खाया ही नहीं था।

फाइलें, ईमेल, रिपोर्ट… और अचानक का ट्रिप…


“मैंने मां को भी परेशान किया… बच्चों की भी बात काट दी… शालिनी के हाथ का खाना भी नहीं खाया…”


उसका गला थोड़ा भर आया।


कैब एयरपोर्ट की ओर बढ़ रही थी।

सड़क किनारे लगी लाइटें धुंधली-सी लग रही थीं जैसे उसका मन।




उसे याद आया कैसे शालिनी हर बार उसके सफ़र में बैग सलीके से पैक करती है।

दवाइयाँ, चार्जर, फॉर्मल कपड़े—सबकी चिंता वही करती है।

और वह, बस ऐसे ही गुस्से में निकल आया।


“क्या वह ठीक है? रोई तो नहीं होगी?”

दिल हल्का-सा चुभ गया।



एयरपोर्ट पहुँचते-पहुँचते…


उसने बैग खोलकर देखा।

ऊपर ही रखा था—

उसकी पसंद की शर्ट।

साथ में एक छोटा-सा नोट—


“फ्लाइट में ठंड लगती है, जैकेट पहन लेना। और खाना खाकर जाना, खाली पेट परेशान हो जाओगे।”


रोहित के हाथ रुक गए।

गला और भर आया।


उसे अचानक एहसास हुआ—

उसे सॉरी बोलना चाहिए। अभी, इसी वक्त।


उसने फोन मिलाया।



“शालिनी… सॉरी।”


उधर शालिनी ने फोन उठाया।

आवाज़ में वह मिठास थी जो सिर्फ़ पत्नी ही दे सकती है—


“पहले ये बताओ… भूख लगी है?”


रोहित ने धीमे से कहा,

“हाँ… थोड़ी।”


शालिनी मुस्कुराई,

“तो बैग की बाईं पॉकेट खोलो। उसमें परांठे, मिक्स वेज और थोड़ा सा दही रखा है। गरम तो नहीं होगा, पर तुम्हें पसंद है, इसलिए रख दिया।”


रोहित के होंठ काँप गए।

“तुम नाराज़ नहीं हो?”


“नाराज़?”

शालिनी हँसी—

“अरे बाबा, मैं जानती हूँ… ऑफिस का स्ट्रेस घर तक आ जाता है। पर याद रखना—

घर तुम्हारा आराम है, युद्ध का मैदान नहीं।

तो अगली बार थोड़ा संभलकर गुस्सा लाना।”


मां की आवाज़ पीछे से आई—

“उसे बताना, लड्डू भी रखे हैं बैग में! और दीपा के लिए शॉल भी!”


शालिनी बोली,

“हाँ, वो भी मैंने रख दिया है बैग की नीचे वाली चेन में।”


बच्चों की आवाज भी आई—

“पापा जल्दी आ जाना! हम इंतज़ार करेंगे!”


रोहित की आँखें भर आईं।


“मैं… मैं सच में बहुत गलत हो गया था… तुम सब इतने अच्छे हो…”


शालिनी बोली—

“बस खाना खा लो। बाकी बातें लौटकर कर लेंगे। और हाँ, अच्छे से मीटिंग करके आना। हम सब यहीं हैं।"


रोहित ने बैग में से डिब्बा निकाला—

गरम तो नहीं था, लेकिन

उसमें घर का स्वाद था, प्यार था, अपनापन था।


वह मुस्कुराया।

दिल हल्का हो गया।



कहानी का संदेश:

हम सब अपनी-अपनी जिंदगी की भागदौड़ में अनजाने में

अपने सबसे क़रीबी लोगों को ही

 सबसे ज़्यादा चोट पहुँचा देते हैं।


पर अगर दोनों एक-दूसरे को समझ लें, थोड़ा रुककर बात कर लें,

तो कोई भी सफ़र अधूरा नहीं रहता…

और कोई भी रिश्ता कमज़ोर नहीं होता।

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