जब सच आईने की तरह सामने खड़ा हो गया…
रुचि आँखें पोंछती हुई सोफ़े पर बैठी थी। उसकी सास, किरन देवी, कमरे में दाख़िल हुईं तो उसे रोता देखकर कदम रुक गए।
“क्या हुआ बहू? फिर मायके से कुछ हुआ क्या?”
रुचि ने सिर झुका लिया। आज सुबह उसके मायके में उसकी भाभी ने बहुत कुछ बोल दिया था—वही बातें, जो कभी रुचि अपनी सास को बोला करती थी।
किरन देवी कुछ देर उसे देखती रहीं, फिर धीमे स्वर में बोलीं—
“क्यों? आज जब वहाँ वही सब हुआ जो तुम यहाँ करती थी… तो बात बुरी लग गई? अब पता चला न, चोट कैसी लगती है?”
रुचि ने आँसू पोंछे—
“मम्मी जी प्लीज़… अभी ऐसी बातें मत कहिए। मेरा मन बहुत भारी है।”
उधर से उनका बेटा समर्थ आ गया।
“मम्मी, ये सब मत बोलिए कम से कम अभी तो नहीं। वो पहले से परेशान है।”
लेकिन किरन देवी के दिल में सालों की भड़ास थी।
“क्यों? क्या गलत बोल रही हूँ? जब-जब मैंने समझाना चाहा, तुम्हारी बीवी ने मुझे ‘दकियानूसी’ कहा। सारी उमर की सीख बेकार कर दी। अब वही बातें भाभी ने इसे सुना दीं तो रो रही है!”
रुचि रो पड़े—
“मम्मी जी, मैंने आपसे कहा भी था—मायके की बात कभी ससुराल में मत बताइए।
यहाँ लोग दर्द समझने की जगह जले पर नमक छिड़क देते हैं… और आज आप भी वही कर रही हैं।”
किरन देवी की आवाज़ भर्रा गई—
“मुझे नमक छिड़कने का शौक नहीं है बहू। बस इतना चाहती हूँ… कि तुम समझो, जिस दर्द को तुम मज़ाक समझती थी… वो दर्द असली होता है। मेरी बेटी—नैना—के साथ तुमने क्या-क्या किया था, तुम जानती भी हो?”
समर्थ ने हाथ जोड़कर कहा—
“मम्मी, प्लीज़… आज नहीं। आप मिलने आई हो या सुना रही हो?”
किरन देवी थोड़ी देर चुप रहीं, फिर बोलीं—
“ठीक है, नहीं बोलूँगी। मैं तो बस ये बताने आई थी कि नैना की कॉलेज लेक्चरर की नौकरी लग गई है। उसकी सास पूजन रख रही हैं। तुम्हें बुलाने को कहा है। आना हो तो आ जाना।”
इतना कहकर वो मुड़कर चली गईं।
रुचि के आँसू अचानक वहीं थम गए—
“नैना की नौकरी लग गई?”
समर्थ भी हैरान रह गया।
फ्लैशबैक...
चार साल पहले की बातें रुचि के दिमाग़ में घूमने लगीं…
जब वो शादी होकर इस घर आई थी, घर में किरन देवी, समर्थ और छोटी बहन नैना रहती थीं। पिता का देहांत हो चुका था। समर्थ कमाता था, और नैना पढ़ाई कर रही थी।
किरन देवी अपनी पेंशन से उसका कॉलेज खर्च उठाती थीं—ताकि बेटे पर बोझ न पड़े।
रुचि को यह बात हमेशा चुभती थी।
उसे लगता था—
“सारा पैसा ननद पर ही खर्च होगा। मैं क्यों झुककर चलूँ?”
किरन देवी उसे समझातीं, बात करतीं, प्यार से समझातीं—लेकिन रुचि को लगता था कि सास-ननद उसके खिलाफ हैं।
मोड़ तब आया जब…
नैना का पोस्ट-ग्रेजुएशन करवाने की बात हुई।
समर्थ तैयार था, मगर रुचि फट पड़ी—
“इतना पैसा बहन पर उड़ाओगे? हमारा घर, बच्चे—कुछ सोचोगे भी? कौन-सा IAS बन जाएगी?”
कितनी कोशिशों के बाद भी रुचि नहीं मानी। वह गुस्से में अपने मायके चली गई।
उसके मायके में भी उसे ही सही ठहराया गया।
तीन महीने बीत गए।
आखिरकार मजबूरी में नैना की शादी एक साधारण परिवार में करनी पड़ी। पर शादी के बाद उसके ससुर जी का निधन, और पति के एक्सीडेंट ने ज़िंदगी उलट-पुलट दी।
नैना की सास बहुत समझदार थीं। उन्होंने उसे पढ़ाई और नौकरी के लिए प्रोत्साहन दिया।
लेकिन इन सबके बीच रुचि का मन हमेशा गलत दिशा में जाता रहा।
उसे लगता था सास उसकी ननद को ज़्यादा प्यार करती है, ज़्यादा देती है।
वो ज़रा-ज़रा सी बात पर ताने देती,
सुधा जी की हर बात में कमी निकालती…
और नैना के आने पर हमेशा बेचैनी दिखाती।
रक्षाबंधन वाला दिन—
उस दिन रुचि सुबह से ही समर्थ को मायके ले गई और वहीं रोक कर रखा।
उधर नैना पूरे दिन भूखी रही।
शाम को उसकी सास उसे लेकर समर्थ के घर आईं—ताकि वो राखी बाँध सके।
रुचि भड़क गई—
“इतनी भूखी थी कि पैसे लेने रात में ही चली आई?”
किरन देवी फट पड़ीं—
“बहू, बदतमीजी की भी हद होती है!”
रुचि और भड़क गई—
“आप पीछे से क्या-क्या दे रही हैं इसे?”
आखिरकार किरन देवी ने तल्ख़ स्वर में कहा—
“बहुत हुआ। ये घर मेरा है। यदि समस्या है तो तुम दोनों कहीं और चले जाओ।”
रुचि गुस्से में चुप हो गई।
कुछ दिनों बाद समर्थ दो कमरे किराए पर लेकर अलग रहने लगा।
चार साल बीत गए…
और अब… वही इतिहास उसके मायके में दोहराया जा रहा था..
भाई की शादी के बाद उसकी भाभी ठीक वही बातें बोल रही थी—
“तुम सास की तरफ हो… ननद को ज़्यादा मत बिगाड़ो… उसके लिए चोरी-छुपे कुछ मत ले जाना…”
रुचि को पहली बार एहसास हुआ—
“मैंने अपनी सास और ननद के साथ क्या-क्या गलत किया…”
वर्तमान..
समर्थ ने गहरी साँस ली—
“मैं नैना के घर जाऊँगा। तुम चलो तो सोच-समझकर। उसकी जिंदगी में बहुत दर्द था… अब जाकर उसकी खुशी लौटी है।”
इस बार रुचि ने रोकने की कोशिश नहीं की।
वो गई—
धीरे से बोली,
रुचि नैना के पास गई… उसकी आँखों में देखने की हिम्मत नहीं हुई।
धीरे से उसका हाथ पकड़कर बोली—
‘नैना… मुझे माफ़ कर देना।’”
नैना मुस्कुरा दी।
लेकिन दिल की गांठें… वो इतनी आसानी से कहाँ खुलती हैं।
वो धीरे-धीरे खुलनी शुरू होने वाली थीं…
लेकिन पूरी तरह खुल पाईं या नहीं—यह वक्त ही बता सकता था।
Part- 02
नैना की नौकरी लगने के बाद घर में छोटा-सा पूजन रखा गया था।
रुचि और समर्थ दोनों तैयार होकर उसके घर पहुँचे।
नैना की सास ने बड़ी गर्मजोशी से स्वागत किया—
“आओ बेटा… नैना ने तुम्हारे ही बारे में बात की थी। कह रही थी—अगर भाई नहीं आए तो खुशी अधूरी रहेगी।”
रुचि का दिल एक पल को रुक गया।
क्या सच में नैना ने ऐसा कहा होगा?
जिस लड़की को उसने कभी बहन नहीं माना… वही उसे याद कर रही थी?
नैना सामने आई—पीली साड़ी में, चेहरे पर हल्की-सी चमक और आँखों में सुकून।
सालों बाद उसे देखकर लगता था जैसे जिंदगी फिर से पटरी पर लौट आई हो।
“भाभी… कैसे हो?”
नैना ने मुस्करा कर पूछा।
रुचि की आँखें भर आईं—
“अच्छी हूँ… तुम तो बहुत खुश लग रही हो।”
नैना ने कुछ नहीं कहा, बस मुस्कराकर चाय परोसने लगी।
पूजन के बाद… सास और बहू की सच्चाई...
सब लोग बैठकर भोजन कर रहे थे। तभी नैना की सास ने कहा—
“नैना के संघर्ष में सबसे बड़ा हाथ इसकी माँ का था। इन्होंने इसे कभी गिरने नहीं दिया।”
किरन देवी चौंक गईं—
“नैना ने तुम्हें बताया होगा… कैसे रुचि के कारण हमें मजबूरी में शादी करनी पड़ी।”
नैना की सास ने मुस्कराकर कहा—
“नहीं बहनजी, उसने कुछ नहीं कहा। उल्टा कहती है—
‘मेरी भाभी की भी परेशानियाँ रही होंगी। हर इंसान अपनी समझ से जीता है।’”
किरन देवी चुप हो गईं।
रुचि का चेहरा झुक गया।
वो खुद जानती थी कि उसने क्या किया था…
लेकिन किसी ने उसे कठोर शब्द नहीं कहे।
यही बात उसके भीतर गहरी उतर गई।
मन के भीतर की लड़ाई...
भोजन के बाद सब आँगन में बैठे थे।
नैना का पति, जो एक्सीडेंट में महीनों तक बिस्तर पर रहा था, अब ठीक था और स्कूल में क्लर्क की नौकरी करता था।
उसने रुचि से कहा—
“भाभी, नैना तो आपको बहुत मानती है।
वो कहती है—अगर माँ और भाभी दोनों का साथ और प्यार मिल जाए,
तो लड़की कितनी भी मुश्किल से नई जिंदगी शुरू कर सकती है।”
रुचि अंदर तक हिल गई।
जिसे उसने हमेशा दुश्मन समझा, वह दिल से इतना साफ़ है?
सबसे बड़ा सच—किरन देवी की बात...
घर लौटते समय किरन देवी अचानक बोलीं—
“बहू, आज मैं तुमसे कुछ कहूँ?”
रुचि सहम गई—
“हाँ मम्मी जी…”
“तुमने बहुत गलतियाँ कीं। मैंने भी गुस्से में तुम्हें बहुत सुनाया।
लेकिन आज मैं समझ गई हूँ एक बात—
जिस बहू का दिल मायके की उलझनों में अटका रहे, वह ससुराल को कभी अपना नहीं बना पाती।
और जिसका मायका उसे गलत दिशा में धकेल दे… वह और भी टूट जाती है।”
रुचि रोने लगी—
“मम्मी जी… मैं बदतमीज़ थी। नासमझ थी। मेरी सोच ही गलत थी।”
किरन देवी ने उसके सिर पर हाथ रखा—
“गलती से बड़ा रिश्ता होता है बहू। जरुरी नहीं कि दिल की गाँठें एक दिन में खुलें…
लेकिन अगर हम खोलना चाहें, तो वक्त ज़रूर मदद करता है।”
रुचि पहली बार अपनी सास से लिपटकर रो पड़ी।
बाद में समर्थ ने धीरे से कहा—
“रुचि… आज नैना की आँखों में जो खुशी मैंने देखी… वह बहुत कम लड़कियों को मिलती है।
हम दोनों ने भी बहुत कुछ खोया है।
अब आगे से हम किसी की खुशी का रास्ता नहीं रोकेंगे
—न बहन का,
—न माँ का,
—न एक-दूसरे का।”
रुचि ने सिर हिलाया। उसकी आँखों में ठहराव था।
कुछ महीने बाद…
राखी वाले दिन नैना खुद समर्थ के घर आई।
इस बार रुचि ने दरवाज़ा खोला तो उसके हाथ में मिठाई थी…
और दिल में सालों बाद पहली बार कोई जलन नहीं थी।
नैना मुस्कुरा कर बोली—
“भाभी… आज मैं खास आपके हाथ की चाय पीने आई हूँ।”
रुचि भी हल्के से मुस्कुराई—
“और आज घर में सबसे पहले तुम ही अंदर आओगी।”
राखी बाँधने के बाद नैना बोली—
“भाभी… अब कभी-कभी घर भी आ जाया करो। मम्मी आपकी बहुत इंतज़ार करती हैं।”
रुचि ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा—
“आऊँगी नैना… अब तुम बुलाओगी भी नहीं, तब भी आ जाऊँगी।”
नैना की आँखें चमक उठीं।
किरन देवी यह सब दूर से देख रही थीं—
उनके चेहरे पर वही सुकून था जिसे वो सालों से तरस रही थीं।
उनकी आँखों में चमक थी—
रिश्ते शायद पूरी तरह नहीं बदले थे…
पर बदले की शुरुआत हो चुकी थी।
और कभी-कभी, बस इतना ही काफी होता है।
रुचि ने पहली बार महसूस किया—
रिश्तों को बचाने के लिए हमेशा दूसरों के बदलने
की ज़रूरत नहीं होती…
कभी-कभी एक कदम पीछे हटकर,
दिल खोलकर,
अपने अहंकार को थोड़ा कम कर देने से भी…
टूटे रिश्ते फिर से जुड़ जाते हैं।

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