सास का झूठा दुलार
सुबह के ठीक दस बजे थे। अजमेर के पुराने मोहल्ले में बने चौड़े से घर में आज भी वही रोज वाला हंगामा था।
निधि रसोई में खड़ी सबके लिए नाश्ता बना रही थी। तभी पीछे से एक तेज़ आवाज आई—
“ये क्या बनाया है तूने?!”
निधि मुड़ी तो देखा — सास सरोज देवी और देवरानी जैसी ही बर्ताव करने वाली ननद रिद्धि दरवाज़े पर खड़ी थी।
रिद्धि ने गुस्से से हाथ में पकड़ी टोस्ट वाली प्लेट झटके से उठाई और सीधे सिंक में जोर से पटक दी, कि प्लेट की आवाज़ सारा किचन हिला गई।
टक्क्क!
रिद्धि ने गुस्से में कहा,
“इतना बोरिंग नाश्ता कौन खाता है? मेरा पेट दुखने लगा ये देखकर ही!”
सरोज देवी ने अपनी बेटी का साथ देते हुए कहा,
“बहू, इस घर में आए हुए तुम्हें छह महीने हो गए, अभी तक तो रिद्धि की पसंद समझ में नहीं आई? इतनी छोटी-सी बात भी नहीं सीख पाई?”
निधि ने धीरे से कहा,
“मम्मी जी रोज तो मैं ही पूछती हूँ कि नाश्ते में क्या बनाऊँ, पर रिद्धि दीदी खुद बोलती—‘कुछ भी बना लो!’”
रिद्धि ने तमतमाते हुए कहा,
“ओए चुप! मेरी बातों में घुसना नहीं! और हाँ—मेरे सामने यह ‘दीदी-दीदी’ मत बोला कर, ड्रामा लगता है!”
सरोज देवी अब और तेज़ बोलीं—
“बहू तू बहस बहुत करती है! रिद्धि अगर प्लेट फेंक भी दे तो क्या हुआ? लगी थोड़ी ना? बात को बढ़ाने की आदत है तेरी!”
निधि के दिल पर जैसे किसी ने पत्थर मार दिया।
उसने चुपचाप सिंक के पास झुकी प्लेटें उठाईं और कूड़े में पड़े टूटे टोस्ट फेंकने लगी।
दोपहर...
निधि ने खुद के लिए थोड़ा-सा उपमा निकालकर कमरे में जाकर खा लिया।
उसे आज फिर बहुत कमजोरी लग रही थी। डॉक्टर ने कहा था—
“तनाव मत लो…वरना ब्लड प्रेशर डाउन होता है।”
लेकिन इस घर का तनाव तो हर घंटे का था।
अचानक दरवाज़े की घंटी बजी।
निधि अभी कमरे से बाहर आई ही थी कि रिद्धि बिजली की तरह दौड़कर दरवाज़ा खोलते हुए बाहर से बर्गर–पिज्ज़ा का बड़ा बैग लेकर अंदर आई।
निधि को देखते ही बोली—
“कोई गलतफहमी में मत रहना कि तेरे बिना हम भूखे मर जाएंगे! पैसा फेंकेंगे तो सौ लोग खाना दे देंगे!”
और बिना मुड़े अपने कमरे में घुस गई।
शाम – सब्र की सीमा...
शाम को निधि ने फिर सबके लिए दाल, चावल और मिक्स वेज बनाकर रखा।
आटा गूँध कर रोटियाँ भी तैयार कर लीं।
पति अंकित ऑफिस से आया और रोज़ की तरह खाने की टेबल पर बैठ गया।
निधि ने थाली परोसी।
लेकिन सास–ननद कमरे से बाहर ही नहीं आईं।
अंकित ने पूछा,
“मम्मी, रिद्धि! खाना लग गया है, आ जाओ।”
दोनों गुस्से से बाहर आई और सरोज देवी ने कहा—
“बेटा, हम तेरी बीवी का खाना नहीं खाएँगे। जवाब देती है हमें!”
निधि चुप खड़ी रही।
अंकित ने गहरी साँस लेकर कहा—
“मम्मी, आप लोग खाना न खाकर हल निकालेंगे क्या? बैठिए, शांति से खाइए।”
रिद्धि बीच में बोली—
“गलती तेरी बीवी की है! उसने मेरी पसंद का नाश्ता नहीं बनाया। इसलिए मैंने प्लेट फेंकी थी।”
अंकित ने सख़्त लहज़े में कहा—
“प्लेट फेंकना गलती नहीं, बदतमीज़ी है, रिद्धि।
और मम्मी, आप गलत को बढ़ावा दे रही हैं।”
दोनों को उम्मीद थी कि अब अंकित निधि को डांटेगा।
लेकिन हुआ उल्टा।
अंकित का फैसला...
अंकित ने निधि की ओर मुड़कर कहा—
“निधि, मेरे लिए गर्म रोटी बना दो।
और मम्मी–रिद्धि की थाली कमरे में रख दो।
अब से ये लोग जो बोल रही हैं—कि वो तुम्हारे हाथ का खाना नहीं खाएँगी—
तो ठीक है…
आज से तुम इनके लिए खाना मत बनाना।
ये दोनों अपने लिए खुद देखेंगी।”
सरोज देवी और रिद्धि हक्की–बक्की रह गईं।
रिद्धि फुसफुसाई—
“भइया, आप तो हमेशा मेरी साइड लेते थे!”
अंकित ने सख़्ती और साफ़ शब्दों में जवाब दिया—
“गलत का साथ अब नहीं दूँगा।
और मम्मी…
कल जब रिद्धि शादी होकर जाएगी—
अगर उसने ससुराल में ऐसी हरकतें कीं,
तो क्या आप उसके लिए लड़ने जाएँगी?”
सरोज देवी चुप।
रिद्धि भी चुप।
निधि ने रोटी सेकनी शुरू कर दी।
सारे घर में जैसे सन्नाटा फैल गया।
तीन दिन बाद…
पहले दिन दोनों ने बाहर से खाना मंगाया।
दूसरे दिन भी।
तीसरे दिन रिद्धि बड़बड़ाते हुए बोली—
“बाहर का खाना सिर दर्द कर देता है!”
चौथे दिन दोनों ने खुद रसोई में खाना बनाने की कोशिश की—
पर आपस में इतनी बहस हुई कि आधा खाना जल गया।
पाँचवें दिन सरोज देवी ने खुद चुपचाप निधि की बनाई रोटी उठाई और खाने लगीं।
रिद्धि थोड़ी देर बाद आई और प्लेट रखकर बैठ गई।
उन्होंने कुछ नहीं कहा…
निधि ने भी कुछ नहीं कहा।
लेकिन उस दिन पहली बार…
पूरे घर में शांति थी।
आदत बदलना मुश्किल है, पर असंभव नहीं...
धीरे–धीरे सरोज देवी का गुस्सा कम होने लगा।
रिद्धि ने प्लेट फेंकना तो बंद कर ही दिया।
और निधि ने भी बोलना बंद नहीं किया, लेकिन सम्मान से जवाब देना सीख लिया।
घर का माहौल पहले जैसा कड़वा नहीं रहा।
कभी–कभी छोटी बातों पर बहस हो जाती,
लेकिन वो ताने, चिल्लाना और प्लेटें फेंकना सब खत्म हो गया था।
क्योंकि उस दिन…
अंकित ने एक बात साफ कह दी थी—
“गलत का साथ देने से घर टूटते हैं।
गलत को रोकने से घर बचते हैं।”
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