मां का घर
शाम का समय था। धूप धीरे-धीरे आँगन की चौखट से फिसल रही थी।
पूरे घर में अजीब-सी शांति थी, जैसे कोई सांसें रोककर ज़िंदगी को देख रहा हो।
किरण रसोई में बैठी आटे की लोई बना रही थी, जबकि उसकी मां, लक्ष्मी, खिड़की के पास बैठी मुस्कुरा रही थी।
किरण ने चौंककर पूछा—
“मां… आज इतनी खुश? महीनों बाद तुम्हारे चेहरे पर ये मुस्कान देख रही हूँ। क्या हुआ?”
लक्ष्मी ने धीरे से कहा—
“तेरे मामा आए थे… दोनों।”
किरण के हाथ रुक गए।
“मामा? अचानक? और वो भी दोनों?”
लक्ष्मी बोली—
“हाँ। कह रहे थे कोई जरूरी काम अटका है। मेरे साइन चाहिए थे। कुछ कागज़… बस साइन करवाए और चले गए।”
किरण का चेहरा सख़्त हो गया।
“आपने पढ़ा क्या था उन पेपर्स में?”
लक्ष्मी ने हंस दिया—
“अरे मेरे छोटे भाई हैं। क्या शक करना? और फिर, तीन साल बाद आए हैं, कुछ तो वजह होगी।”
किरण ने गहरी सांस लेते हुए कहा—
“मां, दुनिया उतनी साफ़ नहीं जितनी दिखती है। ज़रूर कुछ गड़बड़ है।”
लक्ष्मी ने उसे डांटकर कहा—
“मूर्ख मत बन। हमारे पास है ही क्या? ये किराए का घर? या हमारी सिलाई-कढ़ाई? सब तो उन्हीं की मदद से शुरू हुआ था। तेरे पापा के जाने के बाद कौन आया था हमारे पीछे? वही दोनों।”
किरण चुप हो गई, लेकिन दिल में बेचैनी घूम रही थी।
रक्षाबंधन का दिन...
कुछ ही दिनों बाद रक्षाबंधन का त्योहार आ गया।
पुरानी यादों की हल्की-सी लहर, मिठाई की खुशबू और धूप की नरम किरणें—सब मिलकर घर में एक सौंधी-सी गर्माहट फैला रही थीं।
दस बजे के करीब स्कूटी की आवाज आई।
किरण ने खिड़की से झांका—दोनों मामा आए थे।
लक्ष्मी को यकीन नहीं हुआ।
बीते दो वर्षों में ना रक्षाबंधन पर आए, ना भाईदूज पर।
बस मनीऑर्डर भेज देते थे।
दोनों अंदर आए—
“प्रणाम दीदी।”
लक्ष्मी के चेहरे पर चमक आ गई।
वो उतावली होकर बोली—
“किरण, जल्दी से मिठाई ले आ।”
मामा हंस पड़े—
“दीदी, मिठाई-राखी हम लाए हैं। आप बस प्यार से बांध दीजिए।”
लक्ष्मी की आंखें भर आईं।
उधर किरन दूर खड़ी दोनों को शक भरी नजरों से देख रही थी।
सबसे छोटे मामा ने कहा—
“अरे बेटियां भी राखी बांधती हैं। आओ किरन।”
किरण अनमने भाव से बैठ गई।
राखी बांधने के बाद उसने अचानक पूछा—
“मामाजी… वो कौन से पेपर्स थे जिन पर आपने मां से साइन करवाए?”
लक्ष्मी झल्ला गई—
“किरण! अभी ज़रूरी है क्या!”
लेकिन बड़े मामा ने मुस्कुराते हुए कहा—
“नहीं दीदी, उसे पूछने दो।”
वो बोले—
“बेटा, तुम्हारे नानाजी ने वर्षों पहले एक बाजार में छोटी-सी प्रॉपर्टी ली थी। उनका इरादा था कि तुम्हारी मां का नाम उस पर रहे। हम अपने नाम करवाना चाहते भी तो मां के साइन के बिना मुमकिन नहीं था। इसलिए साइन करवाए थे।”
किरण बोली—
“यानी वो जगह अपने नाम करवाना चाहते थे?”
छोटे मामा ने कहा—
“हाँ… मगर अपने लिए नहीं, तुम्हारे लिए।”
किरण अवाक रह गई।
उन्होंने एक बड़ा पैकेट किरन और दूसरा लक्ष्मी को दिया—
“ये आपके लिए। घर जाकर खोल लीजिए, हम चलते हैं।”
दोनों चले गए।
सच सामने आया...
एक पल को दोनों मां-बेटी चुप बैठी रहीं।
किरण ने गुस्से में पैकेट खोला।
अंदर नए कपड़े थे।
और एक सुरक्षा कवर में रखे कुछ कागज़… साथ में एक चिट्ठी।
किरण ने चिट्ठी खोली—
दीदी,
पापा के साथ मिलकर हमने एक दुकान और ऊपर घर बनवाने का काम शुरू किया था।
पापा चाहते थे कि ये जगह आपकी हो, ताकि किराए के घर में रहने की मजबूरी खत्म हो जाए।
जीजाजी के बाद आप अकेले पड़ गईं… और हमें लगा अब वक्त है कि आपको आपका हक मिले।
आपके साइन इसलिए लिए क्योंकि निर्माण पूरा हो चुका है, और अब दुकान व घर—दोनों आपके नाम पर दर्ज हो चुके हैं।
आप नीचे दुकान में सिलाई-कढ़ाई का काम कर सकती हैं।
किरण भी सीख लेगी, तो ये दुकान आप दोनों का सहारा बनेगी।
हम दूर रहे… ये सच है।
मगर रिश्ता कभी दूर नहीं था, दीदी।
आप मां की तरह हैं।
हम बेटे की तरह आपके पास हमेशा रहेंगे।
जब नाराज़गी दूर हो जाए, तो फोन ज़रूर कर देना।
शिफ्टिंग करवानी है…
और हां, मुस्कुराती रहना।
आपके नटखट भाई
रवि और मोहन
चिट्ठी पढ़ते-पढ़ते किरन की आंखें भर आईं।
लक्ष्मी की आंखों से भी आँसू बह निकले।
लक्ष्मी ने रुंधे गले से कहा—
“देखा? रिश्ते तो आज भी विश्वास पर ही टिके हैं।”
किरण फूटकर रो पड़ी—
“मां… मैं गलत थी। हर रिश्ते में स्वार्थ नहीं होता। कभी-कभी भाई सच में पिता जैसा बन जाता है।”
लक्ष्मी ने सिर थपथपाया—
“और बहन… मां का रूप।”
किरण ने मोबाइल उठाया—
“चलो मां… अपने भाइयों को फोन करते हैं। आज हमारा भी रक्षाबंधन पूरा होगा।”
घर में पहली बार महीनों बाद हंसी गूंजी।
और बाहर शाम की हवा जैसे आशीर्वाद बनकर बहने लगी।
कहानी की सीख:
“रिश्तों में शक से नहीं, विश्वास से मजबूती आती है।
हर बार ज़िंदगी वैसी नहीं होती जैसी हमें बाहर से दिखाई देती है—
कभी-कभी वही लोग, जिन पर हमें संदेह होता है,
हमारे लिए सबसे बड़ी ढाल बनकर खड़े रहते हैं।”
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