भटकन की देहरी

 

Beautiful Indian woman standing on a balcony at sunset, reflecting on life while children laugh inside a warm family home


आज जब मैं अपने घर की बालकनी में खड़ी होकर बच्चों की हँसी सुनती हूँ, पति की आवाज़ में अपनापन महसूस करती हूँ, तो मन अनायास ही पीछे लौट जाता है।

वो समय…

जब मैं सब कुछ होते हुए भी खुद को खोने के कगार पर खड़ी थी।


मेरा नाम नंदिनी है।


मैं एक सामान्य नहीं, बल्कि बहुत स्नेहिल और संस्कारों से भरे परिवार में पली-बढ़ी।

पिताजी सरकारी अधिकारी थे और माताजी गृहिणी।

घर में कभी पैसों की कमी नहीं रही और सोच भी हमेशा उदार रही।

मेरे दो बड़े भाई—समीर और रोहन—और मैं उनकी लाडली छोटी बहन।


माँ अक्सर कहतीं—

“बेटी, ज़िंदगी फूलों का बाग नहीं होती, हर कदम संभलकर रखना।”


पर मुझे क्या पता था कि फूलों की खुशबू भी कभी-कभी इंसान को भटका देती है।


कॉलेज के दिन थे।

यौवन की दहलीज़ पर खड़ी मैं खुद को बहुत समझदार समझने लगी थी।

लड़कियों में मेरा नाम लिया जाता, लड़कों की नज़रें ठहर जातीं।

यह सब मुझे अच्छा लगता था।

शायद यहीं से मेरे भीतर अहं ने जन्म लिया।


मेरे बड़े भाई समीर का एक मित्र था—रवि।

साधारण कपड़े, शांत स्वभाव और आँखों में गहराई।

वह आर्थिक रूप से कमजोर था, लेकिन पढ़ाई में तेज़।

भाई ने उसे घर के ऊपर बने छोटे से कमरे में रहने की अनुमति दिला दी थी।


मैं अक्सर उससे पढ़ाई में मदद ले लेती।

वह कम बोलता था, पर उसकी बातें असर छोड़ जाती थीं।


एक दिन उसकी किताबों के बीच मुझे एक पुरानी नोटबुक मिली।

जिज्ञासा हुई।

मैंने खोली।


उसमें कविताएँ थीं…

और एक कविता का शीर्षक था —

“नंदिनी के नाम”


दिल की धड़कन तेज़ हो गई।


कविता पढ़ते-पढ़ते मैं खुद को किसी और ही दुनिया में महसूस करने लगी।

किसी ने मुझे इस तरह देखा था, सोचा था—यह कल्पना ही मुझे मदहोश कर रही थी।


रवि आ गया।

मैं घबरा गई और नोटबुक अपने बैग में रख ली।


उस रात मैं सो नहीं सकी।

हर पंक्ति मुझे अपने भीतर खींचती चली गई।

मैंने भी पहली बार अपने मन की बात काग़ज़ पर उतारी—

एक छोटा सा पत्र।


अगले दिन जब मैंने उसकी नोटबुक लौटाई, वह घबरा गया।

उसे डर था कि मैं शिकायत कर दूँगी।

लेकिन मैंने मुस्कराकर कुछ नहीं कहा।


उस दिन से मेरा मन पढ़ाई में नहीं लगा।

हर सपना, हर कल्पना—रवि के इर्द-गिर्द घूमने लगी।


इसी बीच मैंने सुना—

माँ-पिताजी मेरे विवाह की बात कर रहे थे।


दिल बैठ सा गया।


मैं भागी-भागी रवि के पास पहुँची।

रोते हुए कहा—

“मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती, चलो शादी कर लेते हैं।”


रवि शांत था।

उसने समझाया—

“नंदिनी, प्यार से पेट नहीं भरता।

मेरे पास अभी कुछ नहीं है।

मैं तुम्हें दुख नहीं दे सकता।”


पर मुझे उसकी समझदारी डर लगी,

और उसका डर मुझे बेवफाई।


मैंने उसे भड़काया—

“अगर प्यार सच्चा है तो सब हो जाएगा।”


आख़िरकार मैंने घर से पैसे और गहने लेकर रात में मिलने का निर्णय लिया।


उस रात…

मैं सब कुछ छोड़कर उसके पास पहुँची।


पर कमरा खाली था।


न रवि,

न उसका सामान,

न कोई जवाब।


मैं टूट गई।


घर लौटी,

सबके बीच हँसती रही,

और रात में चुपचाप रोती रही।


कुछ समय बाद मेरा विवाह आदित्य से हो गया।

वह एक सुलझे हुए, संवेदनशील और ज़िम्मेदार व्यक्ति थे।

उन्होंने मुझे कभी किसी चीज़ की कमी महसूस नहीं होने दी।


एक बेटी हुई—

मेरी दुनिया।


पर कभी-कभी मन के किसी कोने में पुराना दर्द सिर उठाता…

लेकिन मैं उसे दबा देती।


एक दिन बाज़ार में अचानक एक महंगी कार रुकी।

अंदर से रवि उतरा।


वह सफल लेखक बन चुका था।

नाम, पैसा, शोहरत—सब था।


उसने कहा—

“अब भी देर नहीं हुई, नंदिनी।”


मेरे भीतर तूफान उठा।


घर लौटी।

रात को पति देर से आए।

साथ में एक बच्चा था।


उन्होंने बताया—

“मेरे दोस्त की पत्नी अपने पुराने प्रेमी के साथ भाग गई।

वह यह सदमा नहीं सह पाया।

यह बच्चा अब अनाथ है।”


फिर उन्होंने मेरी ओर देखा—

“क्या हम इसे अपना सकते हैं?”


मैं उस बच्चे के चेहरे को देखती रही…

और अपने दिल के आईने में खुद को।


उसी क्षण मुझे समझ आ गया—

मैं किस भटकन के कगार पर खड़ी थी।


मैंने उस बच्चे को सीने से लगा लिया।


उस रात मैं कहीं नहीं गई।


आज…

मेरा घर बच्चों की किलकारियों से भरा है।

और मेरा मन—

शांत।


अब जब कभी अतीत की परछाईं दिखती है,

तो मैं डर जाती हूँ—


क्योंकि अगर उस दिन मैंने एक कदम और बढ़ा दिया होता,

तो आज यह मुस्कुराता हुआ संसार मेरा नहीं होता।


सीख:

भावनाओं में बहकर लिया गया निर्णय कभी-कभी पूरी ज़िंदगी को भटका सकता है।

सच्चा प्रेम वही है, जो दूसरों की ज़िंदगी उजाड़कर नहीं, बल्कि जिम्मेदारी निभाकर जिया जाए।




No comments

Note: Only a member of this blog may post a comment.

Powered by Blogger.