संडे का सच
रविवार की सुबह थी। जैसे ही फोन की घंटी बजी, रेनू ने मुस्कुराते हुए उठाया।
फोन उसकी बेटी नीतू का था।
“माँ, आज हम सब आ रहे हैं। रवि, बच्चे और मैं। भाभी को बोलना मेरी पसंद वाले आलू के पराँठे और दही जरूर बनाना। बच्चों के लिए पनीर-पुलाव… और हाँ, शाम को गोलगप्पे भी बनवा देना।”
फोन पर नीतू की लाड़ भरी आवाज़ सुनकर कुछ पल को तो रेनू खुश हुई,
लेकिन फिर धीरे से बोली—
“बेटा, बहू कोई तुम्हारी या मेरी नौकर नहीं है…
जो मेरे बोलने पर तुम्हारी पसंद का खाना बनाएगी।
अगर तुम आना चाहती हो, तो खाना तुम्हें खुद ही बनाना होगा।
नहीं तो… आज मत आओ। अपने घर ही रहो।”
नीतू का मुँह खुला का खुला रह गया।
“माँ! ये आप क्या बोल रही हो? सब ठीक तो है?
आप ही तो कहती थीं कि तुम्हें देखे बिना चैन नहीं मिलता।
और आज आप मुझे मना कर रही हो?”
रेनू ने बिना कुछ बोले फोन काट दिया।
रेनू का परिवार...
रेनू के दो बच्चे थे—
बेटा अनिकेत, और बेटी नीतू।
पति की मौत के बाद अनिकेत और उसकी पत्नी मेघा रेनू को शहर ले आए।
नीतू भी तुरंत अपने पति का ट्रांसफर पास ही के इलाके में करा लाई।
मायका नज़दीक हो तो भला कौन मौका छोड़े?
हर शनिवार की रात, वो पूरा परिवार लेकर आ जाती—
पति, बच्चे, सामान, तीन–तीन थैले… और ढेर सारी फरमाइशें।
सुबह का नाश्ता उससे लेकर रात के खाने तक—
सब मेघा के जिम्मे।
कभी बच्चों के टिफिन, कभी नीतू की पसंद, कभी पति की माँगें…
हर रविवार मेघा रसोई में ही बीत जाता।
अनिकेत की भी एक ही छुट्टी होती थी।
लेकिन वह छुट्टी मेघा के लिए युद्ध का मैदान बन चुकी थी।
वो सोचती— “आखिर मैं पत्नी हूँ या घर की मशीन?”
तंग आकर एक दिन…
एक रविवार की रात थकी हुई मेघा बोली—
“अनिकेत, ये हर हफ़्ते दीदी का पूरा परिवार लेकर आ जाना चाहिए क्या?
मैं इंसान हूँ… मशीन नहीं।
तुमसे बात करने का, साथ बैठने का एक पल भी नहीं मिलता।
कब तक चलेगा ये?”
अनिकेत भी परेशान था।
धीरे से बोला—
“मेघा… मुझे भी पता है, पर दीदी को बोलूँगा तो बुरा मानेंगी।
तुम कुछ प्यार से समझा दो न…”
मेघा ने सिर हिलाया—
“ठीक है, इस बार मैं ही बोलूँगी।”
अगले रविवार मेघा ने चाल चली...
जैसे ही नीतू आई, मेघा ने मुस्कुराकर कहा—
“दीदी, अब तो संडे का मतलब ही आप हो गए हो।
आप ना आएँ तो लगता ही नहीं कि छुट्टी है!”
नीतू शान से बोली—
“हाँ, मैं भी माँ के लिए ही भागती हूँ।
वरना कौन आता है इतना खर्च करके!”
बस यही बात मेघा सुनना चाहती थी।
वह तुरंत बोली—
“तो दीदी, आप परेशान मत हुआ कीजिए…
अब हर रविवार मैं माजी को आपके घर भेज दूँगी।
आपका किराया भी बचेगा, माँ से मिल भी लिया करेंगे।
और माजी भी जगह बदल कर खुश हो जाएँगी।”
रेनू भी पास ही खड़ी थी।
उन्होंने भी बोल दिया—
“हाँ मेघा, सही कहती है।
अब अगले रविवार मैं नीतू के घर जाऊँगी।”
नीतू के चेहरे का रंग उड़ गया।
लेकिन कुछ कह न सकी।
नीतू का असली चेहरा सामने आया...
पहले रविवार नीतू ने माँ का स्वागत किया।
बातें कीं, हँसी–मजाक हुआ।
लेकिन दूसरे रविवार आते–आते…
वह बहाने बनाने लगी—
“माँ, मैं थोड़ी देर पड़ोसन के घर जा रही हूँ।”
कभी फोन में बिज़ी, कभी बच्चों के नाम पर बाहर।
बेचारी रेनू कई–कई घंटे अकेली बैठी रहतीं।
तीसरे रविवार तो नीतू ने दरवाज़ा भी देर से खोला।
और कहा—
“माँ, आज बहुत काम है।
आप बैठो, मैं फुर्सत मिलकर बात करती हूँ।”
रेनू को अब सब समझ आने लगा था।
फिर एक महीना बीत गया…
नीतू ने माँ को न बुलाया।
ना फोन किया।
फिर एक दिन अचानक फोन करके बोली—
“माँ! आप आई नहीं।
मैं तो आपका इंतजार कर रही थी।
रुकिए, आज ही आ जाती हूँ।
बस मेघा भाभी को बोलना मेरी पसंद के पराँठे—”
तभी रेनू ने उसकी बात काट दी—
“नीतू…
बहू क्या हमारी नौकर है?
अब अगर तुम आओगी,
तो खाना तुम खुद बनाओगी।
आज से मेघा की हर रविवार की छुट्टी है।
वो अपने पति के साथ घूमेगी।
और मैं घर पर अकेली रहूँगी।”
नीतू हड़बड़ा गई—
“माँ… ये आप क्या कह रही हैं?”
रेनू की आवाज़ मजबूती से भरी थी—
“जब बेटी अपनी माँ को अकेला छोड़ सकती है,
तो बहू क्यों नहीं अपनी सास को?
तुम्हारे आने से घर में काम बढ़ता है,
और तुम खुद अपनी माँ से घबराने लगी हो…
तो मेघा भी घबरा सकती है।
अब हर रविवार वो बाहर जाएगी—
और अगर तुम्हें आना है,
तो अपने सारे काम खुद करोगी।”
नीतू खामोश हो गई।
माँ की बातों ने उसे आईना दिखा दिया था।
दूसरी तरफ…
दरवाज़े पर खड़ी मेघा सब सुन रही थी।
उसने राहत की साँस ली और सोचा—
“चलो, माजी को आज सच्चाई समझ आ गई।
अब कम से कम मेरा रविवार तो मेरा होगा।”
और नीतू…
अपने ही स्वार्थ भरे व्यवहार के कारण
माँ की नज़रों में भी गिर चुकी थी।
कहानी का संदेश:
रिश्ते सेवा से नहीं,
सहयोग और सम्मान से चलते हैं।
और माँ–बेटी का रिश्ता हो या सास–बहू का—
स्वार्थ जहाँ बढ़ जाए,
प्यार वहीं कम पड़ जाता है।

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