खामोश आँगन की किलकारी
रीमा की शादी को पाँच साल हो चुके थे,
पर उसके आँगन में अब तक किसी बच्चे की किलकारी नहीं गूँजी थी।
हर सुबह जब वह तुलसी में पानी डालती,
तो मन ही मन भगवान से एक ही प्रार्थना करती—
“बस एक बार… मुझे भी माँ बना दो।”
उसका ससुराल अच्छा था।
सास शारदा देवी पढ़ी-लिखी नहीं थीं,
पर दिल से बहुत बड़ी थीं।
लेकिन समाज…
समाज को कहाँ किसी का दर्द दिखता है?
एक दिन रीमा अपनी सास के साथ सब्ज़ी मंडी से लौट रही थी।
पीछे से दो औरतों की आवाज़ आई—
“सुना है शारदा की बहू के बारे में?
शादी को पाँच साल हो गए हैं,
लेकिन अब तक उसके घर में
किसी बच्चे की किलकारी नहीं गूँजी।”
“आजकल की लड़कियाँ पहले करियर देखती हैं,
बच्चे बाद में… कौन जाने प्लानिंग है या मजबूरी।”
रीमा के कदम वहीं रुक गए।
दिल जैसे किसी ने मुट्ठी में भींच लिया हो।
शारदा देवी पलटीं,
आँखों में ग़ुस्सा और आवाज़ में गरिमा—
“मेरी बहू के बारे में बात करनी है
तो सामने आकर करो।
पीठ पीछे ज़हर उगलना छोड़ दो।”
और रीमा का हाथ थामकर
सीधे घर ले आईं।
घर आकर रीमा फूट-फूटकर रो पड़ी।
“माँजी…”
रीमा की आवाज़ काँप रही थी।
आँखों में जमा आँसू अब रुक नहीं पा रहे थे।
“क्या मुझमें ही कोई कमी है?”
वह सिर झुकाए बैठी थी,
जैसे अपने ही सवालों से डर रही हो।
“क्या मैं… अधूरी हूँ?”
ये शब्द नहीं थे,
एक स्त्री का टूटा हुआ भरोसा था।
एक माँ बनने की अधूरी चाह थी।
समाज के तानों से छलनी हुआ दिल था।
उसने माँजी की ओर देखा—
जैसे कोई आख़िरी सहारा ढूँढ रही हो।
शारदा देवी ने उसे सीने से लगाया—
“अधूरी तो सोच है उन लोगों की।
अगर भगवान ने देर की है,
तो ज़रूर कोई वजह होगी।”
शाम को ननद पूजा और पति अजय घर आए।
पूजा बोली—
“भाभी,
दुनिया के मुँह नहीं गिनते।
अगर ज़रूरत पड़ी तो इलाज भी है,
और हम सब आपके साथ हैं।”
उम्मीद की किरण...
काफी सोच-विचार के बाद
रीमा ने इलाज शुरू किया।
हर इंजेक्शन,
हर दवाई,
हर डर के साथ
परिवार उसके पीछे दीवार बनकर खड़ा रहा।
और फिर…
एक दिन डॉक्टर ने मुस्कराकर कहा—
“बधाई हो…
आप माँ बनने वाली हैं।”
रीमा की आँखों से आँसू बहने लगे—
इस बार खुशी के।
नौ महीने कैसे बीते,
रीमा को खुद भी पता नहीं चला।
डिलीवरी के दिन
पूरा परिवार अस्पताल के बाहर बैठा था।
काफी घंटों के इंतज़ार के बाद
डॉक्टर बाहर आए और मुस्कराकर बोले—
“बधाई हो…
एक स्वस्थ बेटे ने जन्म लिया है।”
शारदा देवी की आँखों से आँसू बह निकले।
पूजा खुशी से उछल पड़ी—
“मैं बुआ बन गई!”
घर लौटते ही
आँगन में पहली बार
किलकारी गूँजी।
कुछ हफ्तों बाद...
डॉक्टर ने रीमा को
पूरा आराम करने की सख्त हिदायत दी थी।
घर का ज़्यादातर काम
अब पूजा संभालने लगी।
पड़ोसनें फिर फुसफुसाने लगीं—
“अब तो बहू रानी बन गई है।
ननद को नौकर बना दिया।”
धीरे-धीरे
पूजा के मन में भी
एक चुभती हुई पीड़ा घर करने लगी।
एक दोपहर
जब बच्चा रोने लगा
और रीमा उसे गोद में लिए बैठी थी,
उसने हल्की आवाज़ में कहा—
“पूजा,
जरा बच्चे के लिए दूध गरम कर दोगी?”
पूजा झुंझला गई—
“मैं कोई मशीन नहीं हूँ भाभी।
हर काम मेरे ही हिस्से क्यों?”
शारदा देवी चौंक गईं।
यह वही पूजा थी
जो कभी भाभी पर जान छिड़कती थी।
कुछ दिनों बाद
जब रीमा नहा रही थी
और बच्चा ज़ोर-ज़ोर से रो रहा था—
पूजा ने अनदेखा कर दिया।
शारदा देवी यह दृश्य देख नहीं पाईं।
उनके भीतर बरसों का संयम टूट गया।
वे तेज़ कदमों से आगे बढ़ीं
और ग़ुस्से में नहीं,
दर्द और टूटे हुए विश्वास के आवेग में
काजल के गाल पर एक थप्पड़ पड़ गया।
काँपती हुई आवाज़ में वे बोलीं—
“ये कोई बोझ नहीं है…
ये बच्चा है, नासमझ…
और याद रख—
यह तेरा भतीजा है,
तेरा अपना खून।
जिस दिन तू माँ बनेगी ना,
उस दिन समझेगी
कि किसी रोते बच्चे से मुँह मोड़ लेना
कितना बड़ा अपराध होता है।”
पूजा फूट पड़ी—
“जब से ये आया है
सबका ध्यान इसी पर है।
मेरी कोई कीमत नहीं बची।”
सब कुछ सुनने के बाद भी
रीमा कुछ नहीं बोली।
उसने किसी से कोई शिकायत नहीं की।
रात हो गई थी।
सब लोग सो गए थे,
लेकिन रीमा नहीं सोई।
उसने खुद घर के काम निपटाए,
बर्तन धोए,
रसोई साफ की।
फिर अपने बच्चे को गोद में लिया
और उसे प्यार से संभालते हुए
सुला दिया।
और फिर पूजा के पास आकर
बस इतना कहा—
“अगर तुम्हें बहुत थकान महसूस हो रही है,
तो कल से निश्चिंत होकर ऑफिस चली जाना।
घर और बच्चे की ज़िम्मेदारी
मैं खुशी-खुशी संभाल लूँगी।”
उस रात
पूजा सो नहीं पाई।
दिन गुजरते गए।
पूजा ने देखा— रीमा बिना शिकायत
सब कुछ संभाल रही है।
तब उसे समझ आया—
माँ बनना आसान नहीं होता…
और माँ बनते ही इंसान स्वार्थी नहीं,
बल्कि और ज़्यादा अकेला हो जाता है।
माफी और प्रेम...
एक दिन पूजा ने
रीमा के पैर पकड़ लिए—
“मुझे माफ़ कर दो भाभी।
मैं जल गई थी…
लेकिन अब समझ आ गया।”
रीमा ने आगे बढ़कर
उसे अपने सीने से लगा लिया।
उस आलिंगन में
न कोई शिकायत थी,
न कोई शिकवा—
बस अपनापन था।
गोद में लेटा बच्चा
मानो सब समझ रहा हो,
उसके होंठों पर
एक नन्ही-सी मुस्कान खिल उठी।
आँगन, जो कभी
खामोशी से भरा रहता था,
आज पहली बार
किलकारियों से गूँज उठा।
और उसी पल
रीमा ने महसूस किया—
आज सच में
उसका घर पूरा हो गया।
संदेश:
> माँ बनना कोई अधिकार या घमंड की बात नहीं,
यह एक बड़ी ज़िम्मेदारी होती है।
और परिवार वही होता है,
जो हर मुश्किल समय में
एक-दूसरे के साथ खड़ा रहे।

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