दीवार के उस पार
पायल को इस घर में आए पाँच साल हो चुके थे।
पाँच साल…
और फिर भी वह आज तक तय नहीं कर पाई थी कि यह घर उसका है या नहीं।
सुबह के पाँच बजे थे।
अलार्म बजने से पहले ही उसकी आँख खुल गई।
आदत बन चुकी थी—
सबसे पहले उठना, ताकि किसी को यह न कहने का मौका न मिले कि
“दिन भर सोती रहती है।”
वह चुपचाप उठी, पानी गरम किया, चाय रखी और फिर रसोई में लग गई।
घर बड़ा था, पर आवाज़ें छोटी-छोटी बातों पर ऊँची हो जाती थीं।
डाइनिंग टेबल पर अख़बार रखते हुए उसने देखा—
उसकी ननद राधिका मोबाइल पर किसी से हँस-हँसकर बात कर रही थी।
“हाँ-हाँ…
अब तो यहाँ सब मेरे हिसाब से ही होता है।”
पायल ने अनसुना कर दिया।
अनसुना करना उसने बहुत पहले सीख लिया था।
हर बात में ताना...
नाश्ते पर राधिका ने बिना देखे कहा—
“आज पराठे कुछ ज़्यादा सख़्त हैं।”
पायल ने धीमे से कहा—
“कल आटा कम था, इसलिए—”
“बहाने मत बनाया करो,”
राधिका ने बात काट दी।
“जिस घर में आई हो, उसके हिसाब से चलना सीखो।”
पायल चुप रही।
उसके पति विवेक ने सब सुना,
पर उसने अख़बार से नज़र नहीं हटाई।
पायल को यह सबसे ज़्यादा चुभता था—
विवेक की चुप्पी।
समय के साथ पायल की दुनिया सिमटती गई।
पहले उसे पूजा में आगे बुलाया जाता था।
फिर कहा गया—
“तुम पीछे रहो।”
पहले उससे राय पूछी जाती थी।
फिर कहा गया—
“तुम्हें क्या पता इन सब बातों का।”
धीरे-धीरे वह घर में रहते हुए भी
घर का हिस्सा नहीं रही।
एक दिन उसने अलमारी बदली हुई पाई।
उसके कपड़े नीचे वाले खाने में रख दिए गए थे।
राधिका ने सहज भाव से कहा—
“मेरे कपड़े ज़्यादा हैं,
तुम तो वैसे भी कम ही पहनती हो।”
उस दिन पायल बहुत देर तक बाथरूम में बैठी रही।
रोई नहीं।
वह देर तक अकेली बैठी सोचती रही—
क्या इस घर में रहते-रहते मैं खुद ही कम होती जा रही हूँ?
विवेक का भ्रम...
विवेक को लगता था—
सब ठीक है।
“तुम ज़्यादा सोचती हो,”
वह कह देता।
पायल हँस देती।
उसे पता था—
अगर वह बोलेगी,
तो उसे ही “घर तोड़ने वाली” कहा जाएगा।
वह दिन...
उस दिन राधिका की सहेलियाँ आई थीं।
ड्राइंग रूम में ठहाके गूँज रहे थे।
पायल रसोई में चाय बना रही थी।
तभी आवाज़ आई—
“पायल!
यहाँ ज़रा जल्दी आओ।”
वह हाथ पोंछकर बाहर आई।
राधिका ने कहा—
“इनके सामने ज़रा झाड़ू लगा दो।
कल साफ़ नहीं हुआ लगता है।”
पायल रुक गई।
सहेलियाँ चुप थीं।
देख रही थीं।
पायल का चेहरा लाल हो गया।
उसने पहली बार सिर उठाकर देखा।
“यह मेरा घर है,”
उसने धीमी लेकिन साफ़ आवाज़ में कहा।
“मैं यहाँ काम करने वाली नहीं हूँ।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
पहली बार आवाज़...
विवेक ने सब सुन लिया था।
उसने अख़बार नहीं उठाया।
उसने पायल को देखा।
पहली बार उसने समझा—
चुप्पी भी चोट पहुँचाती है।
“राधिका,”
उसने कहा,
“अब यह सब बंद होगा।”
राधिका हँस पड़ी—
“अब यह तुम्हें सिखाएगी?”
विवेक का स्वर सख़्त हो गया—
“नहीं।
अब मैं समझ गया हूँ।”
दीवार...
अलग होने का फैसला उस दिन नहीं हुआ था।
न कोई बहस थी, न कोई ऐलान।
पर उसी पल—
मन के भीतर एक दीवार खड़ी हो चुकी थी।
ऐसी दीवार,
जो दिखाई नहीं देती,
पर जिसके बाद
सब कुछ बदल जाता है।
कुछ महीनों बाद घर बँटा।
कोई लड़ाई नहीं।
कोई ड्रामा नहीं।
बस एक फैसला।
नई जगह...
नई जगह छोटी थी।
पर वहाँ पायल की चीज़ें उसकी जगह पर थीं।
वह अब सुबह डर से नहीं उठती थी।
वह अब चुप रहने को मजबूर नहीं थी।
एक शाम वह खिड़की के पास बैठी चाय पी रही थी।
विवेक ने कहा—
“तुम बदल गई हो।”
पायल मुस्कराई—
“नहीं…
मैं बस वापस आ गई हूँ।”
सीख:
👉 हर अत्याचार शोर मचाकर नहीं होता।
कुछ ज़ुल्म चुप्पी की आड़ में पनपते हैं।
और हर चुप्पी के टूटने के लिए
आवाज़ का ऊँचा होना ज़रूरी नहीं—
बस सच का सामने आना काफ़ी होता है।

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