मोटी देव्रानी की शादी में पतली जेठानी का पहनावा
मोटी देव्रानी की शादी में पतली जेठानी का पहनावा
(एक चुपचाप रोती हुई बहू की कहानी)
शिवानी की आँख सुबह बहुत जल्दी खुल गई थी।
कमरे में हल्की रोशनी फैल रही थी, पर उसका मन अंधेरे में डूबा हुआ था।
वो पलंग पर बैठी अपनी हथेलियाँ देख रही थी—
मेहंदी अभी पूरी तरह उतरी नहीं थी,
पर दिल में जो डर बैठा था, वो गहरा होता जा रहा था।
“आज मेरी पहली रसोई है…”
“आज सब मुझे देखेंगे…”
“आज फिर तुलना होगी…”
उसकी साँसें भारी हो गईं।
उधर हॉल में शोबना की हल्की-सी हँसी गूँज रही थी।
उसकी हँसी में आत्मविश्वास था, सजावट थी, और वो चमक थी जिसे लोग दूर से ही पहचान लेते हैं।
पड़ोसनें फिर से उसी सुर में बोल उठीं—
“आनंदी बहन, आपकी बड़ी बहू तो आज भी कितनी स्मार्ट लग रही है।”
“देखो ना, जैसे किसी विज्ञापन से निकलकर आई हो।”
फिर दूसरी औरत ने थोड़ा रुककर कहा—
“छोटी बहू तो बस… ठीक ही है।”
‘ठीक ही है।’
ये शब्द शिवानी के कानों में नहीं, सीधे उसके दिल में जाकर चुभ गया।
जैसे किसी ने मुस्कुराते हुए उसे बता दिया हो कि
वो सुंदर नहीं,
खास नहीं,
और देखने लायक भी नहीं।
वो चुपचाप खड़ी रही।
चेहरे पर हल्की मुस्कान थी,
पर भीतर कुछ टूटकर बिखर गया।
उसने उस पल समझ लिया—
कभी-कभी सबसे गहरे ज़ख्म
तानों से नहीं,
तुलना से लगते हैं।
शिवानी रसोई में पहुँची।
तेल चढ़ाया, सब्ज़ी काटी,
लेकिन हाथ काँप रहे थे।
आनंदी की आवाज़ आई—
“ध्यान से बनाना,
आज सबकी नज़र तुम पर है।”
नज़र…
पर सम्मान नहीं।
शोबना अंदर आई।
“शिवानी, मैं भी मदद कर दूँ?”
शिवानी ने सिर झुका लिया।
“नहीं भाभी…
आपके रहते मेरी ज़रूरत किसे पड़ेगी।”
शिवानी की आवाज़ में शिकायत नहीं थी,
बस एक टूटा हुआ विश्वास था।
शोबना वहीं रुक गई।
उसके होंठ कुछ कहने को खुले,
लेकिन शब्द साथ नहीं आए।
उस पल उसे पहली बार एहसास हुआ—
कि जो चीज़ दुनिया के लिए खूबसूरती होती है,
वही किसी के लिए चुपचाप सहा जाने वाला दर्द भी बन सकती है।
वो समझ गई…
कभी-कभी सुंदर होना भी
किसी और के अकेलेपन की वजह बन जाता है।
खाना सबको बहुत पसंद आया।
हर किसी ने जी भरकर खाया,
थाली खाली हुई,
पर दिल नहीं भरा।
लेकिन तारीफ़ किसकी हुई?
तारीफ़ें भी हुईं…
लेकिन शिवानी के हिस्से नहीं आईं।
“ज़रूर शोबना ने सिखाया होगा,”
किसी ने मुस्कुराते हुए कहा।
“इतनी समझ तो छोटी बहू में कहाँ,”
दूसरी आवाज़ भी आ ही गई।
शिवानी चुपचाप सब सुनती रही।
होठों पर हल्की सी मुस्कान थी,
पर आँखों के कोनों में
नमी जम चुकी थी।
वो मुस्कुरा रही थी—
क्योंकि रोने की इजाज़त नहीं थी।
उस रात उसने तकिया भीगने तक रोया।
कोई आवाज़ नहीं,
कोई शिकायत नहीं।
बस एक सवाल—
“क्या मोटी होना गुनाह है?”
आकाश बाहर से मजबूत दिखता था,
पर अंदर से उलझा हुआ।
दोस्तों की बातें—
“भाई, तेरी बीवी तो…”
“इतनी मोटी?”
वो चुप रहता,
पर चुप्पी भी चोट करती है।
रात के सन्नाटे में आकाश अक्सर करवट बदलते हुए शिवानी को सोते हुए देखता।
उसका शांत चेहरा, थकी हुई साँसें और बंद पलकों के पीछे छुपा दर्द उसे भीतर तक हिला देता।
उसके मन में बार-बार एक ही बात गूंजती—
“वो बुरी नहीं है…
बल्कि मुझसे कहीं ज़्यादा सच्ची और साफ़ दिल की है।”
पर उसी के साथ दिल के किसी कोने में एक अनकहा दर्द भी उठता—
“क्या मैं उसे सच में अपना पाया हूँ?
या सिर्फ़ निभा रहा हूँ एक रिश्ता,
जिसे दिल से स्वीकार करने का साहस अब तक नहीं जुटा पाया?”
उस पल उसे सबसे ज़्यादा शर्म अपने आप से आती—
क्योंकि गलती शिवानी की नहीं थी,
गलती उसकी अपनी सोच की थी।
एक दिन शोबना ने अलमारी खोली।
उसने अपने चमकीले कपड़े अलग रख दिए।
आईने में खुद को देखा—
“अगर मेरी सुंदरता किसी को चोट पहुँचा रही है,
तो क्या ये सुंदरता सच में अच्छी है?”
उस दिन वो साधारण साड़ी पहनकर बाहर आई।
पड़ोसन बोली—
“आज क्या हुआ?
आज तो आप फीकी लग रही हैं।”
शोबना मुस्कुराई—
“आज मैं किसी को फीका महसूस नहीं कराना चाहती।”
एक टूटती हुई लड़की...
शिवानी धीरे-धीरे खुद से नफ़रत करने लगी।
कम खाना,
छुपकर रोना,
आईने से डरना।
एक दिन वो बाथरूम में बेहोश हो गई।
घर में हड़कंप मच गया।
डॉक्टर बोला—
“बहू को कमजोरी नहीं,
भावनात्मक थकान है।”
ये शब्द आनंदी के दिल में उतर गए।
उस रात आनंदी सो नहीं पाई।
उसे याद आया—
कैसे उसने शिवानी को बिना देखे चुन लिया
कैसे उसने सिर्फ दहेज देखा
कैसे उसने तुलना करवाई
उसे पहली बार लगा—
“मैंने एक लड़की की ज़िंदगी को बोझ बना दिया।”
सुबह उसने शिवानी को बुलाया।
कांपती आवाज़ में बोली—
“बेटा…
मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई।”
शिवानी फूट-फूटकर रो पड़ी।
आकाश ने सबके सामने कहा—
“मुझे अपनी पत्नी पर गर्व है।
वो जैसी है, वैसी ही मेरी है।”
शिवानी पहली बार बिना डर के रोई।
इस बार आँसू दर्द के नहीं,
सुकून के थे।
समय का असर...
शिवानी ने खुद पर ध्यान देना शुरू किया—
किसी को खुश करने के लिए नहीं,
खुद को बचाने के लिए।
वो बदली,
पर सबसे ज़्यादा बदली सोच।
अब वो आईने से डरती नहीं थी।
एक शादी में फिर वही लोग—
“ये वही छोटी बहू है?”
“अब तो इसमें अलग ही चमक है।”
आनंदी ने कहा—
“अब मुझे फर्क नहीं पड़ता
लोग क्या देखते हैं।
मुझे सिर्फ इंसान दिखता है।”
अंतिम सीख:
> सुंदरता अगर किसी को छोटा महसूस कराए
तो वो सुंदरता नहीं,
अहंकार है।

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