दादी का घर

 

Emotional moment of an Indian bride-to-be holding her grandmother’s hand as the groom’s family arrives with a warm proposal, inside a traditional Indian home.


“लक्ष्मी, ये दुपट्टा क्यों नहीं ले रही? सगाई है आज, बच्ची रानी बनकर बैठेगी, और ये है कि रोए जा रही है!”

चाची झुंझलाती हुई बोली और लाल रंग का दुपट्टा बिस्तर पर फेंककर बाहर चली गईं।


ब्यूटीशियन ने मेरी भीगी पलकों को देखते हुए कहा,

“इतनी प्यारी दुल्हन का मेकअप कैसे करूं, अगर आंसू रुकेंगे ही नहीं?”


मैंने सिर झुका लिया। क्या बताती… मन में जो तूफ़ान चल रहा था, वो किसी को कैसे समझ आता?


बचपन का सहारा...


मैं शायद पाँच साल की ही रही होऊंगी जब सड़क हादसे में माँ–पापा चले गए थे।

घर में बस एक ही सहारा बचा— दादी।


चाची की शादी हो चुकी थी, चाचा नौकरी के कारण दूसरे शहर में रहते थे।

दादी और मैं… बस दो लोग।


दादी ने मुझे सिखाया कैसे चप्पल उलटी न पड़े, कैसे भगवान की थाली में पहला निवाला चढ़ाया जाता है।

और कैसे किसी की कमी को याद करते हुए भी जीना पड़ता है।


वो अकसर मेरे सिर पर हाथ फेरतीं—

“लक्ष्मी, तेरी मम्मी-पापा ऊपर से देख रहे होंगे कि मैं तुझे कितना संभालती हूँ।”


मैं पढ़ाई में अच्छा करती, तो दादी मेरे रिज़ल्ट को ठीक वहीं रखतीं जहाँ माँ–पापा की फोटो लगी थी।

धीरे-धीरे मैंने भी यही करना शुरू कर दिया।

दादी बीमार होतीं, तो दवा देते हुए मैं तस्वीर की ओर देख कर बोलती—

“देख रहे हो न? मैं दादी की ठीक से देखभाल कर रही हूँ।”


हम दोनों एक-दूसरे का संसार बन गए थे।



शादी की बात...


जब मेरे लिए रिश्ता आया, दादी ने सबसे पहले यही पूछा था—

“लड़का इसी शहर में है न? ताकि मेरी गुड़िया मुझे देखने आती रहे।”


मुझे लड़का— अनिरुद्ध— ठीक लगा था।

शांत, सलीकेदार, और सबसे बड़ी बात— मुझे पसंद आया दादी के लिए शहर न बदलना।


पर जिस तरह शादी की तैयारियाँ बढ़ती गईं…

दादी की सेहत गिरती गई…

और मेरा मन घबराहट से भरता गया।


सगाई की शाम...


मंच पर फोटोग्राफ़र बार-बार नए पोज़ बताकर तस्वीरें खिंचवाने में लगा था।

लाइटें चमक रहीं थीं।

अनिरुद्ध मुस्कुरा रहा था…


पर मैं?

मन जैसे किसी बोझ तले दबा हुआ था।


उसी रात दादी के पैर फिर कांपे थे।

मैंने पानी दिया, दवा दी, और पहली बार डर लगा कि दादी अकेले कैसे रहेंगी जब मैं चली जाऊंगी?



सुबह का मैसेज...


“कल मिलना है, ज़रूरी बात है।”

अनिरुद्ध का मैसेज था।


मैंने सोचा— शायद वो भी मेरी उदासी महसूस कर रहा है।


हम मिले तो उसकी आवाज़ में खीझ थी—

“लक्ष्मी, तुम खुश नहीं हो? सच बताओ, शादी से परेशानी है क्या?”


मैंने न हाँ कही, न ही ना… बस चुप रह गई।


तभी उसने कहा—

“और तुम्हारे चाचा जी… उन्होंने अजीब बात कही है। कहते हैं दादी का घर उनके नाम कर दो क्योंकि आगे वही संभालेंगे।”


मुझे जैसे किसी ने थप्पड़ मार दिया हो।

चाचा जी ने?

दादी ने जिनके लिए सबकुछ किया?


“अनिरुद्ध, दादी किसी को बोझ नहीं हैं। और ये घर… दादी का सपना है। वो इसे अनाथ बच्चों के लिए देना चाहती हैं। किसी लालच के लिए नहीं।”


अनिरुद्ध ने मेरी बात ध्यान से सुनी।

फिर बस बोला—

“ठीक है। लेकिन तुम खुश रहो, ये मेरे लिए ज़रूरी है।”



अगला दिन— बंधन...


चाची ने सुबह ही कह दिया था—

“अब सगाई हो गई है, शादी तक बाहर नहीं निकलना है।”


अनिरुद्ध ने फोन किया,

“कल मिलोगी?”


मैंने धीमे से कहा—

“नहीं… अभी शादी तक मुझे घर से बाहर जाने की मनाही है।”


उधर से हँसते हुए जवाब आया—

“फिर दूल्हे को ही आना पड़ेगा?”


मैं चाहकर भी मुस्कुरा नहीं पाई।

मन बहुत भारी था।



सुबह की हलचल...


अचानक घर की लड़कियाँ दौड़ते हुए आईं—

“दीदी! जीजाजी आए हैं! उनके पापा भी!”


मेरा दिल धक् से रह गया।

इतनी सुबह?

कहीं कोई समस्या तो नहीं?


बैठक में गई तो दादी की आँखें भरी थीं।

चाचा-चाची भी मौजूद थे।


अनिरुद्ध के पापा ने मुझे आशीर्वाद दिया।

अनिरुद्ध शरारती मुस्कान लिए खड़ा था।


मैं दादी के पास बैठ गई।

“क्या हुआ दादी?”


दादी कांपती आवाज़ में बोलीं—

“इन्होंने तो अजीब-सी मांग रख दी है…”


मैं तमतमाई—

“मकान? घर? हिस्सा?”


दादी कुछ बोलीं नहीं।

अनिरुद्ध धीरे से उठकर मेरे पास आया।

फिर सबके सामने बोला—



वो पल जिसने मेरी दुनिया बदल दी...


“मैंने दादी जी से कहा है कि

अब ये अकेले नहीं रहेंगी।

ये हमारे साथ चलेंगी।

ये घर तो इन्होंने अच्छे काम के लिए सोचा है— वो तो होगा ही।

लेकिन इनका अकेलापन हम दोनों मिलकर नहीं रहने देंगे।

मैं चाहता हूँ कि शादी के बाद दादी उसी तरह हमारे घर की धड़कन बनकर रहें, जैसे अभी तुम्हारी जान हैं।”


दादी स्तब्ध थीं।

मेरी आँखें भर आईं।

अनिरुद्ध के पापा ने कहा—


“बेटा, जब लड़का और घर दोनों अच्छे हों, तो लड़की को रोने की जरूरत नहीं।

हमारी बहू की दादी, हमारी भी दादी।”


मैंने दादी का हाथ पकड़ा—

“दादी, मुझसे पूछ रही थीं न… मैं तुम्हें छोड़कर कैसे जाऊंगी?

अब कैसे जाऊंगी बताओ?”


अनिरुद्ध माँ–पापा की तस्वीर के सामने खड़ा होकर हाथ जोड़ रहा था।

मैं भी उसके पास जा खड़ी हुई।


मन ही मन मैंने कहा—

“देख रहे हो न मम्मी-पापा…

मेरे लिए कितना अच्छा जीवनसाथी चुना है आपने। और दादी के लिए भी कितना अच्छा सहारा भेजा है।”


कहानी की सीख:

सच्चे रिश्ते वही हैं, जहाँ प्यार और ज़िम्मेदारी दोनों साथ निभाए जाते हैं।

शादी सिर्फ़ दो लोगों का नहीं, दो दिलों की समझ और दो परिवारों की संवेदनाओं का मिलन है।

जो इंसान आपके अपने लोगों को अपनाने की क्षमता रखता है, वही वास्तव में आपका जीवनसाथी कहलाने के लायक है।


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