दो माँ, एक बहू
नेहा आईने के सामने खड़ी खुद को देख रही थी।
हल्दी की खुशबू, मेहंदी का रंग और आँखों में सपनों की चमक।
“सच में… अब मैं ससुराल जाने वाली हूँ,”
उसने खुद से कहा और मुस्कुरा दी।
तभी पीछे से माँ सरोज की आवाज़ आई—
“नेहा… तैयार हो गई क्या? रिश्तेदार आने वाले हैं हल्दी के लिए।”
“हाँ माँ,”
नेहा बोली,
“आज तो आप मुझे ढेर सारी हल्दी लगाइएगा।”
सरोज हँस पड़ीं—
“अरे! दुनिया की पहली लड़की हो तुम,
जिसे मायके से ज़्यादा ससुराल जाने की जल्दी है।”
नेहा शर्माकर बोली—
“माँ… वहाँ सब बहुत अच्छे हैं।”
उसी समय पंडित जी ने कुंडली बंद की और गंभीर स्वर में बोले—
“एक बात कहनी ज़रूरी है।”
सरोज घबरा गईं—
“क्या हुआ पंडित जी?”
“इस लड़की की कुंडली में दो सास का योग है।”
सरोज हँसकर बात टाल गईं—
“अरे पंडित जी, लड़के की तो एक ही माँ है।”
पंडित जी बोले—
“कुंडली कभी झूठ नहीं बोलती।”
सरोज ने बात बदल दी।
लेकिन किसे पता था कि ये शब्द सच बनकर सामने आएँगे।
शादी और ससुराल...
धूमधाम से नेहा की शादी रोहन से हो गई।
विदाई के समय आँखें नम थीं, लेकिन दिल खुश।
ससुराल पहुँची तो दरवाज़े पर दो महिलाएँ खड़ी थीं।
एक ने मुस्कुराकर कहा—
“आओ बहू, मैं सुमित्रा… इस घर की बड़ी माँ।”
दूसरी ने तुरंत जोड़ दिया—
“और मैं कमला… छोटी माँ।”
नेहा चौंक गई।
दो माँ?
कलश चौखट पर सजा दिया गया।
सुमित्रा ने आगे बढ़कर कलश थाम लिया और स्नेह भरी आवाज़ में बोलीं—
“आओ बहू… मेरे हाथ से इस कलश को गिराकर घर में प्रवेश करो।”
तभी कमला ने हल्का-सा हाथ आगे बढ़ाया, आवाज़ में अपनापन और अधिकार दोनों थे—
“नहीं बहू… पहले मेरे हाथ से गिराना।
इस घर की बहू हो, तो दोनों की हो।”
नेहा समझ गई—
अब यही मेरी परीक्षा है।
दो निगाहें, दो अपेक्षाएँ—
और बीच में खड़ी वह, नई-नवेली दुल्हन।
उसने बिना कुछ कहे,
पहले सुमित्रा के हाथ से कलश गिराया,
फिर झुककर कमला के हाथ का कलश भी गिरा दिया।
इसके बाद दोनों के चरण छुए।
दोनों सास की आवाज़ एक साथ निकली—
“सदा सुहागन रहो।”
पहली रसोई की पहली जंग...
अगली सुबह घर में हलचल शुरू हो चुकी थी।
“बहू, आज पहली रसोई है,”
बड़ी माँ ने आवाज़ लगाई,
“अच्छी तरह पूरी–सब्ज़ी बनाना,
घर की नाक इसी से जुड़ी होती है।”
बात पूरी भी नहीं हुई थी कि
छोटी माँ तुरंत बोल पड़ीं—
“और दम आलू भी बनाना,
साथ में कचौड़ियाँ।
मेरे मायके में पहली रसोई ऐसी ही होती है।”
नेहा ने सिर झुका लिया।
न कोई सवाल,
न कोई शिकायत।
वह चुपचाप रसोई में चली गई।
तेल कढ़ाही में चढ़ा ही था कि
बड़ी माँ ने आकर चूल्हा धीमा कर दिया—
“ऐसे तेज़ आँच पर पूरी नहीं बनती।”
थोड़ी देर बाद
छोटी माँ आईं और तवा घुमा दिया—
“नहीं, ऐसे रखो,
तभी सब्ज़ी सही बनेगी।”
कभी नमक कम बताया जाता,
तो कभी मसाले ज़्यादा।
नेहा का मन भीतर ही भीतर भर आता,
आँखें भीगने लगतीं,
पर हाथ रुकते नहीं थे।
वह जानती थी—
अगर आज एक भी काम बिगड़ गया,
तो दोष उसी के हिस्से आएगा।
इसलिए
दिल रोता रहा,
लेकिन चूल्हे पर
उसके हाथ लगातार चलते रहे।
साड़ी की उलझन...
एक दिन दोपहर को पड़ोस की कुछ महिलाएँ नेहा को देखने आ पहुँचीं।
उनके आने की भनक लगते ही
दोनों सास अपने–अपने कमरे से साड़ियाँ लेकर बाहर आ गईं।
बड़ी सास ने साड़ी फैलाते हुए कहा—
“बहू, ये साड़ी पहन लो। आज मेहमान आए हैं।”
तभी छोटी सास ने दूसरी साड़ी सामने रख दी—
“नहीं, बहू मेरी वाली पहनना। पड़ोसनें देख रही हैं।”
दोनों की आवाज़ों के बीच
नेहा का दिल जैसे सिकुड़ गया।
वह चुपचाप कमरे में चली गई
और बिस्तर पर बैठते ही
उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
थोड़ी देर बाद रोहन कमरे में आया।
“नेहा… क्या हुआ?”
उसने नरमी से पूछा।
नेहा ने भर्राई आवाज़ में कहा—
“मैं किसका दिल रखूँ रोहन?
एक को खुश करूँ तो दूसरी नाराज़ हो जाती है।”
रोहन ने उसके सिर पर हाथ रखा
और हल्की मुस्कान के साथ बोला—
“आज तुम अपनी माँ की दी हुई साड़ी पहन लो।”
नेहा चौंक गई—
“पर… बुरा मान जाएँगी।”
रोहन ने भरोसे से कहा—
“मुझ पर यकीन रखो।”
थोड़ी हिचकिचाहट और डर के साथ
नेहा ने अपनी माँ की दी हुई साड़ी पहन ली।
साड़ी पहनते ही
उसके चेहरे पर सादगी और अपनापन उतर आया,
लेकिन दिल अब भी धड़क रहा था—
आने वाले तूफ़ान के डर से।
तानों की बरसात...
मेहमानों के जाते ही
घर का माहौल अचानक बदल गया।
जो चेहरे थोड़ी देर पहले मुस्कुरा रहे थे,
अब कठोर हो चुके थे।
बड़ी सास ने तीखे स्वर में कहा—
“आज तो हमारी नाक ही कटवा दी तूने।
सबके सामने अपनी माँ की साड़ी पहनकर
हमारी इज़्ज़त मिट्टी में मिला दी।”
छोटी सास ने ताना जोड़ा—
“छोटे घर की सोच यही होती है।
ससुराल की मर्यादा क्या होती है,
इन्हें कौन समझाए?”
ये शब्द नहीं थे…
नेहा के दिल पर चलाए गए वार थे।
उसका गला भर आया।
आँखों के बाँध टूट गए।
वह कुछ बोल न सकी,
बस वहीं खड़ी-खड़ी
फूट-फूटकर रो पड़ी।
उसकी सिसकियों में
एक ही सवाल था—
“क्या बहू होने की कीमत
इतनी ही होती है?”
सच का सामना...
तभी अब तक चुप खड़े ससुर जी की आवाज़ गूँजी।
उनकी आवाज़ में गुस्सा भी था
और दर्द भी।
“बस… अब बहुत हो गया।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
“तुम दोनों ने इस घर को घर नहीं,
अखाड़ा बना दिया है।”
उन्होंने नेहा की ओर देखा—
जो सिर झुकाए, आँसू पोंछ रही थी।
“ये लड़की यहाँ बहू बनकर नहीं आई है,
ये बेटी बनकर इस घर में कदम रखकर आई है।”
आवाज़ भर्रा गई।
“और तुम दोनों…
उसे बाँटने में लगी हो।
कभी अपनी बहू,
कभी मेरी बहू…
क्या बेटी ऐसे बाँटी जाती है?”
कमरे में सिर्फ़ नेहा की सिसकियों की आवाज़ रह गई।
दोनों सास एक-दूसरे को देखने लगीं।
उनकी आँखों में अब गुस्सा नहीं था—
पछतावा था।
भर आई आँखों से
वे समझ चुकी थीं
कि गलती कहाँ हुई थी।
सुमित्रा ने आगे बढ़कर नेहा को अपने सीने से लगा लिया।
उसकी आँखें भर आईं।
“बहू… मुझे माफ कर दे।
अनजाने में तुझे बहुत दुख दिया।”
कमला भी आगे आईं।
आवाज़ काँप रही थी—
“आज से तू हमारे लिए बहू नहीं,
हमारी बेटी है।
अब हम तुझ पर कभी अपना अहंकार नहीं थोपेंगे।”
नेहा की आँखों से आँसू बहने लगे।
उसने दोनों के चरणों में सिर झुका दिया।
“मुझे दो सास नहीं मिलीं…”
वह सिसकते हुए बोली,
“मुझे तो दो माँ मिल गईं।”
उस पल के बाद
वह घर
न ‘दो सासों’ का रहा,
न किसी खींचतान का—
वह घर बन गया
दो माँ के स्नेह से भरा हुआ एक परिवार।

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