माँ… एक बार और बुला लेती

An emotional hospital scene showing an elderly Indian mother resting peacefully while her daughter sits nearby in grief, expressing love, loss, and family bond.


आरती चार बच्चों की माँ थी,

और तीन बच्चों की नानी।


लेकिन खुद के लिए उसके पास

कभी समय नहीं था।


घर की रसोई में उसकी मेहनत बसी थी,

पूजा के कमरे में उसकी आस्था,

और बच्चों की चिंता में उसकी पूरी दुनिया सिमटी हुई थी।


आरती की तीन बेटियाँ थीं—

नेहा, पूजा और काजल।

सबसे छोटा बेटा अमन, अभी बारह साल का।


नेहा की शादी को चार साल हो चुके थे।

पूजा अपने ससुराल में व्यस्त थी।

काजल कॉलेज में पढ़ती थी।


आरती कई महीनों से ठीक नहीं रहती थी।

कभी सिर भारी,

कभी दिल घबराता,

कभी बिना कारण आँखों से आँसू बहने लगते।


पति रमेश पूछते—

“क्या हुआ, तबीयत ठीक नहीं?”


आरती हल्की मुस्कान के साथ कहती—

“कुछ नहीं जी… बस थक गई हूँ।”


डॉक्टर के यहाँ ले जाया गया।

जाँच हुई।

रिपोर्ट आई— सब नॉर्मल।


डॉक्टर बोले—

“ज्यादा सोचती हैं ये, इन्हें आराम चाहिए।”


आराम…

आरती ने मन ही मन सोचा—

माँओं को कहाँ आराम मिलता है?




फोन की दूसरी तरफ़ माँ...


एक दिन आरती ने काँपते हाथों से नेहा को फोन लगाया।

कुछ पल बाद दूसरी ओर से आवाज़ आई—


“हाँ माँ…”


आरती की आवाज़ भारी हो गई—

“बेटा, आज मन बहुत उदास है… पता नहीं क्यों घबराहट सी हो रही है।”


नेहा ने थकी हुई साँस ली और बोली—

“माँ, मेरी भी हालत ठीक नहीं है। बच्चा सारी रात रोता रहा, ज़रा आँख भी नहीं लगी।”


आरती कुछ पल चुप रही।

उस चुप्पी में उसकी थकान, उसका अकेलापन सब समाया हुआ था।


फिर उसने खुद को संभालते हुए कहा—

“अच्छा… कोई बात नहीं बेटा। तू आराम कर। माँ ठीक है।”


फोन रखते ही आरती की आँखें भर आईं।

वह खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गई।

बाहर आसमान में बादल थे, और भीतर उसके मन में अनकहा बोझ।


तभी रमेश धीरे से बोले—

“नेहा को कुछ दिनों के लिए बुला लें? तुम्हें अच्छा लगेगा।”


आरती ने तुरंत मना कर दिया—

“नहीं जी… उसका भी घर है, उसकी भी मजबूरियाँ हैं।

हम माँ-बाप हैं, सह लेंगे।”


यह कहते हुए आरती मुस्कुरा दी…

लेकिन उस मुस्कान के पीछे

एक माँ का टूटता हुआ मन छिपा था।



बीमारी और इंतज़ार...


सावन का महीना था।

रात गहरी हो चुकी थी। बाहर हल्की-हल्की बारिश हो रही थी।


उसी रात आरती को अचानक तेज़ बुखार चढ़ आया।

उसका शरीर तप रहा था, होंठ सूख चुके थे।


रमेश घबराकर उसके पास आ बैठे।

उन्होंने उसका माथा छुआ और घबराई आवाज़ में बोले—

“आरती… आँखें खोलो… मुझे देखो।”


आरती ने बड़ी मुश्किल से आँखें खोलीं।

कमज़ोर आवाज़ में बुदबुदाई—

“नेहा… नेहा आई क्या?”


रमेश का दिल भर आया।

सच बोलने की हिम्मत नहीं हुई।

उन्होंने आँसू छिपाते हुए कहा—

“हाँ… बेटा… आने वाली है।”


अगली सुबह रमेश ने काँपते हाथों से नेहा को फोन लगाया।

“बेटा, तेरी माँ की तबीयत बहुत खराब है।”


फोन के उस पार नेहा की आवाज़ भर्रा गई—

“पापा… मैं आना चाहती हूँ…

लेकिन बच्चा बहुत छोटा है…

उसे छोड़कर आना मुश्किल है।”


कुछ पल तक रमेश चुप रहे।

गला रुंध गया था।

फिर खुद को संभालते हुए बोले—

“ठीक है बेटा… तू बच्चे को संभाल।”


फोन कट गया।


कमरे में अजीब सी ख़ामोशी फैल गई।


आरती ने धीमी, टूटी हुई आवाज़ में पूछा—

“नेहा… नहीं आ रही?”


रमेश ने नज़रें झुका लीं।

बहुत हल्की आवाज़ में बोले—

“बेटा बीमार है।”


आरती ने कुछ नहीं कहा।

बस आँखें बंद कर लीं।


उसकी पलकों के कोरों से

एक आँसू चुपचाप तकिए पर गिर पड़ा।



तीसरे दिन आरती की हालत अचानक बहुत ज़्यादा बिगड़ गई।

साँस उखड़ने लगी, शरीर में बिल्कुल जान नहीं बची थी।


घबराए हुए रमेश तुरंत उन्हें शहर के बड़े अस्पताल ले गए।

डॉक्टरों ने इमरजेंसी में ले जाकर जाँच शुरू कर दी।


कुछ देर बाद डॉक्टर बाहर आए।

उनके चेहरे पर गंभीरता थी।


डॉक्टर बोले—

“हम पूरी कोशिश कर रहे हैं…

लेकिन हालत बहुत नाज़ुक है।”


अंदर बेड पर लेटी आरती ने

कमज़ोर हाथों से रमेश का हाथ पकड़ लिया।


धीमी और काँपती आवाज़ में बोली—

“जी… अगर मैं न बच पाऊँ…

तो मेरी बेटियों से कहना…”


रमेश की आँखों से आँसू बहने लगे—

“ऐसा कुछ मत बोलो आरती,

तुम ठीक हो जाओगी।”


आरती ने हल्की सी मुस्कान के साथ कहा—

“मैंने कभी उनसे कुछ माँगा नहीं…

बस इतना कहना…

कि माँ आख़िरी वक्त तक

उनका इंतज़ार करती रही।”


इतना कहकर

उसकी पकड़ ढीली पड़ने लगी।


आँखें धीरे-धीरे बंद हो गईं।


मॉनिटर की आवाज़ तेज़ हुई…

और फिर…


सब कुछ शांत हो गया।



बहुत देर हो चुकी थी


जब नेहा अस्पताल पहुँची,

तो सब कुछ खत्म हो चुका था।

माँ की देह ठंडी पड़ चुकी थी,

और चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी—

जैसे अब कोई दर्द बाकी ही न हो।


नेहा वहीं ज़मीन पर बैठ गई।

माँ के पैरों से लिपटकर फूट-फूटकर रो पड़ी—

“माँ… मैं आ गई हूँ…

अब तो आँखें खोल लो…

देखो न, तुम्हारी बेटी आ गई है।”


लेकिन माँ की पलकें नहीं हिलीं।

वो आवाज़, जिसे सुनकर माँ हमेशा उठ बैठती थीं,

आज भी वहीं रह गई…

हवा में बिखरकर।


आज भी,

जब नेहा अपने बच्चे को बुखार में तपता देखती है,

उसे माँ की ठंडी हथेलियाँ याद आ जाती हैं—

जो कभी उसके माथे पर रखा करती थीं।


दिल भर आता है…

साँस भारी हो जाती है…


और वह खुद से बुदबुदाती है—

“काश…

उस दिन मैं सब कुछ छोड़कर चली जाती।

काश…

एक बार फिर माँ की बेटी बन पाती।”


लेकिन अब…

न माँ है,

न वो दिन,

न वो मौका।


अब बस एक सच्चाई है—


तब तक बहुत देर हो चुकी थी।




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