आदतों का सच
“बहू, ये क्या तरीका है काम करने का? सुबह-सुबह भी तुझे जल्दी नहीं होती!”
दरवाज़े के पास खड़ी विमला देवी ने ऊँची आवाज़ में कहा।
रसोई में खड़ी पूजा गैस पर पराठा सेक रही थी। उसने पलटकर शांत स्वर में कहा,
“माँजी, सब काम हो रहा है… बस थोड़ा-थोड़ा करके कर रही हूँ।”
“थोड़ा-थोड़ा करके? अरे घर ऐसे चलता है क्या? हमारे ज़माने में तो सूरज निकलने से पहले सब काम निपट जाते थे,” विमला देवी बड़बड़ाईं।
पूजा चुप रही। उसे समझ आ गया था कि आज फिर वही शुरू हो गया है।
दरअसल, पूजा की शादी को अभी छह महीने ही हुए थे। उसका पति रवि एक प्राइवेट कंपनी में काम करता था और दोनों शहर में रहते थे। शुरू से ही दोनों ने मिलकर घर संभालना सीखा था—कभी रवि खाना बना देता, तो कभी पूजा।
लेकिन इस बार रवि की माँ, यानी विमला देवी, गाँव से कुछ दिन के लिए आई थीं… और उनके आते ही घर का माहौल बदलने लगा था।
“रवि उठ गया क्या?”
विमला देवी ने पूछा।
“जी माँजी, अभी तैयार हो रहे हैं,” पूजा ने जवाब दिया।
“तो फिर तू यहाँ क्या कर रही है? जा, उसके कपड़े निकाल दे, टिफिन पैक कर दे, जूते पॉलिश कर दे… लड़का है वो, ये सब काम थोड़े ही करेगा!”
पूजा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
“माँजी, कपड़े वो खुद निकाल लेते हैं, टिफिन मैं बना रही हूँ, और जूते वो खुद ही पॉलिश करते हैं।”
“क्या?”
विमला देवी की आँखें फैल गईं।
“मेरा बेटा ये सब काम करेगा? और तू खड़ी देखती रहेगी?”
पूजा ने धीरे से कहा,
“देखती नहीं माँजी… साथ देती हूँ।”
इतने में रवि बाहर आया, शर्ट के बटन लगाते हुए।
“माँ, चाय मिलेगी?” उसने हँसते हुए पूछा।
“हाँ-हाँ बेटा, अभी लाती हूँ,”
विमला देवी तुरंत रसोई की तरफ बढ़ीं।
लेकिन पूजा ने पहले ही चाय कप में डालकर ट्रे में रख दी थी।
“ये लीजिए,” उसने कहा।
रवि ने चाय लेते हुए मुस्कुराकर कहा,
“थैंक यू।”
विमला देवी यह देखकर थोड़ा चुप हो गईं।
थोड़ी देर बाद रवि अपना बैग उठाने लगा, तो पूजा ने कहा,
“टिफिन काउंटर पर रखा है, रख लेना।”
रवि ने सहजता से टिफिन उठाकर बैग में रख लिया।
विमला देवी से रहा नहीं गया—
“बहू, ये क्या है? तू खुद नहीं रख सकती थी?”
पूजा ने शांत स्वर में जवाब दिया,
“रख सकती थी माँजी… लेकिन जब ये खुद कर सकते हैं, तो क्यों ना करें?”
रवि ने माँ की तरफ देखते हुए कहा,
“माँ, इसमें क्या दिक्कत है? हम दोनों मिलकर काम करते हैं, तो जल्दी भी हो जाता है और थकान भी कम होती है।”
विमला देवी कुछ बोल नहीं पाईं।
दिन यूँ ही बीतता गया, लेकिन उनके मन में सवाल उठते रहे।
अगले दिन सुबह फिर वही बात…
“बहू, रवि के कपड़े प्रेस क्यों नहीं किए?”
“माँजी, उन्होंने खुद कर लिए,” पूजा ने जवाब दिया।
“अरे, ये सब काम तो औरत के होते हैं!”
विमला देवी ने ज़ोर देकर कहा।
इस बार पूजा ने थोड़ा अलग तरीके से जवाब दिया—
“माँजी, काम का कोई लिंग नहीं होता… बस ज़िम्मेदारी होती है।”
विमला देवी चुप हो गईं, लेकिन बात उनके दिल में बैठ गई।
उस दिन दोपहर में जब रवि ऑफिस चला गया, तो पूजा किचन में काम कर रही थी। अचानक उसने देखा—विमला देवी चुपचाप बैठी हुई हैं।
“क्या हुआ माँजी?”
पूजा ने पास जाकर पूछा।
विमला देवी ने धीरे से कहा,
“एक बात पूछूँ बहू?”
“जी पूछिए।”
“क्या सच में… ये सब ठीक है? मतलब… पति-पत्नी बराबरी से काम करें?”
पूजा मुस्कुराई,
“माँजी, जब दो लोग मिलकर जिंदगी जीते हैं, तो जिम्मेदारियाँ भी मिलकर ही निभानी चाहिए ना?”
विमला देवी कुछ सोचने लगीं।
थोड़ी देर बाद बोलीं,
“तेरे ससुर भी मेरी मदद करते थे… लेकिन मैंने कभी उसे सही तरीके से समझा ही नहीं… हमेशा यही सोचा कि वो मेरी मदद कर रहे हैं, जबकि सच में वो अपनी जिम्मेदारी निभा रहे थे।”
पूजा चुपचाप सुनती रही।
“शायद… मैं ही गलत थी,”
विमला देवी ने धीमे से कहा।
उस दिन के बाद घर का माहौल धीरे-धीरे बदलने लगा।
अब जब रवि पानी लेने उठता, तो विमला देवी उसे रोकती नहीं थीं।
जब वो अपना काम खुद करता, तो वो चुप रहतीं… बल्कि कभी-कभी मुस्कुरा भी देतीं।
एक दिन तो उन्होंने खुद पूजा से कहा—
“बहू, आज मैं रोटी बेल देती हूँ… तू थोड़ा आराम कर ले।”
पूजा ने आश्चर्य से उनकी तरफ देखा।
“क्या हुआ? मैं नहीं कर सकती क्या?”
विमला देवी ने हँसते हुए कहा।
पूजा की आँखों में हल्की चमक आ गई।
उसे समझ आ गया था—
बदलाव धीरे-धीरे ही आता है… लेकिन अगर समझ आ जाए, तो रिश्ते भी आसान हो जाते हैं।
और उस दिन पहली बार, घर में सिर्फ काम ही नहीं…
सोच भी बराबर बँटी हुई थी।

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