समझ का असली आईना

 

Indian mother teaching daughter responsibility in family kitchen scene



सविता जी रसोई में खड़ी थीं। चाय बनाते-बनाते उनका ध्यान बार-बार दरवाज़े की ओर जा रहा था। तभी फोन की घंटी बजी।


“हैलो मम्मी…”


“हाँ बेटा, बोल रानी…”


“मम्मी… मैं कल सुबह आ रही हूँ… पांच-छह दिन रुकूंगी…”


“अरे वाह! आ जा बेटा…”


फोन रखते ही सविता जी के चेहरे की मुस्कान हल्की-सी सोच में बदल गई।


उन्होंने तुरंत अपने बेटे राहुल और बहू नंदिनी को बुलाया।


“राहुल, तुम कल सुबह नंदिनी को उसके मायके छोड़ आना…”


“क्या?” राहुल चौंक गया।


नंदिनी भी हैरान, “मम्मी जी… मैंने कुछ गलत किया क्या?”


“नहीं बहू,” सविता जी ने प्यार से कहा, “गलती तुम्हारी नहीं है…”


राहुल ने पूछा, “तो फिर क्यों?”


सविता जी ने गहरी सांस ली, “क्योंकि प्रिया आ रही है…”


राहुल समझ गया, लेकिन चुप रहा।


नंदिनी बोली, “तो क्या हुआ मम्मी जी… दीदी आएंगी तो अच्छा लगेगा…”


सविता जी हल्का-सा मुस्कुराईं, “तुम्हारा दिल बहुत साफ है बहू… लेकिन हर बार चुप रहना सही नहीं होता…”


राहुल धीरे से बोला, “मम्मी… आप फिर वही सोच रही हैं?”


“सोच नहीं रही बेटा… देख रही हूँ,” सविता जी बोलीं, “हर बार प्रिया आती है… और पूरा घर नंदिनी संभालती है… और वो बस आदेश देती रहती है…”


नंदिनी तुरंत बोली, “मम्मी जी, मुझे सच में कोई दिक्कत नहीं होती…”


“यही तो समस्या है,” सविता जी ने कहा, “तुम्हें दिक्कत नहीं होती… लेकिन उसे ये समझ भी नहीं आता कि वो गलत कर रही है…”


राहुल ने पूछा, “तो आप उसे सिखाना चाहती हैं?”


“हाँ,” सविता जी बोलीं, “क्योंकि कभी-कभी जिंदगी की सबसे बड़ी सीख शब्दों से नहीं… हालात से मिलती है…”



अगले दिन...


सुबह-सुबह नंदिनी अपने मायके चली गई।


करीब दो घंटे बाद…


“मम्मी… मैं आ गई!”


प्रिया खुशी से अंदर आई और सोफे पर धम्म से बैठ गई।


“उफ्फ… बहुत थक गई… मम्मी एक अदरक वाली चाय बना दो ना…”


सविता जी ने मुस्कुराकर कहा, “रसोई वहीं है बेटा…”


प्रिया चौंकी, “अरे भाभी कहाँ हैं?”


“मायके गई हैं…”


“क्या?? मेरे आने से पहले ही?”


“हाँ… जरूरी काम था…”


प्रिया ने मुंह बनाया, “हम्म… कामचोर कहीं की…”


सविता जी कुछ नहीं बोलीं, बस हल्की मुस्कान के साथ उसे देखती रहीं।



पहला दिन...


प्रिया ने जैसे-तैसे चाय बनाई।


दोपहर तक उसे समझ आ गया कि घर संभालना आसान नहीं है।


“मम्मी… आज क्या बनाऊं?”


“जो मन करे…”


किचन में खड़ी प्रिया पहली बार उलझन में थी।


सब्जी आधी कच्ची, आधी जली…


रोटी गोल की जगह नक्शा बन गई…


खुद ही खाया, खुद ही झुंझलाई।



दूसरा दिन...


सुबह उठते ही—


“उफ्फ… फिर से वही काम…”


झाड़ू, बर्तन, नाश्ता…


अब उसे नंदिनी याद आने लगी।


“भाभी ये सब कैसे करती हैं रोज…”


शाम को राहुल आया।


“दीदी, कैसी हो?”


प्रिया थकी आवाज में बोली, “भैया… ये सब बहुत मुश्किल है…”


राहुल मुस्कुराया, “बस दो दिन में थक गई?”


प्रिया चुप हो गई।



तीसरा दिन...


अब प्रिया का रवैया बदलने लगा था।


वो धीरे-धीरे काम ठीक से करने लगी।


और हर काम के साथ उसे नंदिनी की मेहनत समझ आने लगी।


एक दिन उसने खुद से कहा—


“मैं कितनी गलत थी… मैं सिर्फ आदेश देती रही…”



चौथा दिन...


प्रिया शाम को माँ के पास बैठी।


“मम्मी…”


“हाँ बेटा…”


“मैं गलत थी ना?”


सविता जी ने उसकी ओर देखा, “तुम्हें क्या लगता है?”


प्रिया की आंखें भर आईं, “मैंने कभी भाभी की मेहनत को समझा ही नहीं…”


सविता जी ने उसके सिर पर हाथ रखा, “अब समझ गई ना… बस वही काफी है…”



कुछ दिन बाद...


नंदिनी वापस आई।


दरवाज़ा खुलते ही—


“भाभी… आप बैठो… मैं चाय बनाती हूँ…”


नंदिनी हैरान, “अरे नहीं दीदी…”


“नहीं भाभी,” प्रिया बोली, “अब मेरी बारी है…”


राहुल और सविता जी एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा रहे थे।



रात को...


प्रिया धीरे से नंदिनी के पास आई—


“भाभी… माफ कर दो मुझे…”


नंदिनी ने तुरंत उसे गले लगा लिया, “दीदी… माफी कैसी…”


“नहीं… अब मैं सच में समझ गई हूँ… घर चलाना कितना मुश्किल होता है…”



उस दिन के बाद…


प्रिया जब भी मायके आती—


वो मेहमान नहीं…


घर की जिम्मेदार सदस्य बनकर आती थी।


और सविता जी को सुकून था कि—


उन्होंने सिर्फ एक बेटी को नहीं…


एक इंसान को बेहतर बना दिया।




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