जब खालीपन बोलने लगा

 

Elderly mother sitting with her son, daughter-in-law, and grandson in a warm family moment at home


खिड़की के पास रखी कुर्सी पर बैठी कमला अपने हाथों की रेखाओं को बार-बार देख रही थी। जैसे उन रेखाओं में बीते सालों को पढ़ने की कोशिश कर रही हो।


घर में सब कुछ ठीक था—सब कुछ अपनी जगह पर।

पर कुछ था जो अब कभी अपनी जगह पर नहीं लौट सकता था।


कमला के पति, शरद जी…

अब इस दुनिया में नहीं थे।


उनके जाने के बाद घर की दीवारें तो वही रहीं, पर घर का मतलब बदल गया था।


पहले हर बात में आवाज होती थी—

“कमला, चाय बनी?”

“आज क्या बनाया है?”

“चलो, थोड़ा बाहर घूम आते हैं…”


अब वही घर चुप था।


इतना चुप… कि कभी-कभी अपनी सांसों की आवाज भी भारी लगती थी।



शादी के बाद कमला ने कभी अपने बारे में सोचा ही नहीं था।

उसकी पूरी दुनिया बस पति, बच्चे और घर तक सीमित रह गई थी।


शरद जी अक्सर मुस्कुराते हुए उससे कहते—

“कमला, तुमने अपने लिए क्या रखा है? कभी अपने बारे में भी सोचा है?”


वह हर बार हंसकर बात टाल देती—

“मुझे अपने लिए क्या चाहिए? आप सब खुश हैं, वही मेरे लिए काफी है।”


तब यह बात उसे बहुत साधारण लगती थी…

लेकिन आज वही शब्द उसके दिल में गहरे तीर की तरह चुभ रहे थे।



बेटा निखिल नौकरी में व्यस्त रहता।

बहू पूजा अपने ऑफिस और फोन में।


पोता आरव स्कूल और ट्यूशन में।


कमला सबके बीच रहकर भी अकेली थी।



एक दिन उसने सोचा—

“चलो, पूजा के साथ थोड़ा समय बिताया जाए।”


वह रसोई में गई और बोली—

“पूजा, मैं मदद कर दूं?”


पूजा ने बिना उसकी तरफ देखे कहा—

“मम्मी जी, आप रहने दीजिए… मैं कर लूंगी।”


कमला चुपचाप वापस आ गई।


यह “रहने दीजिए” अब उसे अपने होने पर सवाल जैसा लगने लगा था।



कुछ दिनों बाद उसने निखिल से कहा—

“बेटा, बहुत खालीपन लगता है…”


निखिल लैपटॉप पर नजरें टिकाए बोला—

“मां, आप बाहर जाया करो… पार्क में बैठो, लोगों से मिलो… अच्छा लगेगा।”


कमला ने सिर हिला दिया।


वह गई भी…


पर वहां भी हर किसी की अपनी कहानी थी, अपने लोग थे।

वह किसी की कहानी का हिस्सा नहीं थी।



धीरे-धीरे उसने खुद को सीमित कर लिया।


अब वह कम बोलती…

कम हंसती…

और ज्यादा सोचती।



एक दिन उसने सोचा—

“क्यों न कुछ अच्छा बनाया जाए?”


उसने पूरे मन से पुलाव और हलवा बनाया।


जब सब खाने बैठे—


निखिल ने कहा—

“मां, आजकल मैं कम खाता हूं…”


पूजा बोली—

“मम्मी जी, थोड़ा ऑयली है…”


आरव ने कहा—

“मुझे पास्ता चाहिए था…”


कमला ने कुछ नहीं कहा।


बस थाली में खाना परोसती रही।


उस दिन पहली बार उसे लगा—

वह इस घर में है… पर इस घर की नहीं रही।



रात को उसने अलमारी खोली।


पुरानी साड़ी, कुछ तस्वीरें, और एक फाइल।


उस फाइल में था—

वृद्धाश्रम का फॉर्म।


कुछ दिन पहले ही उसने मंगवाया था।


आज उसने उसे ध्यान से देखा।


सोचा—

“शायद अब यही सही है…”



दिन बीतते गए।


उसने तय कर लिया—

“अगले महीने चली जाऊंगी।”


पर जाते-जाते किसी को तकलीफ न हो—

बस यही सोच रही थी।



एक दिन अचानक दरवाजे की घंटी बजी।


कमला ने दरवाजा खोला।


सामने पूजा खड़ी थी—घबराई हुई।


“मम्मी जी…” उसकी आवाज कांप रही थी,

“मेरी मां को हार्ट अटैक आया है… मुझे जाना होगा…”


उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे।


कमला ने बिना कुछ सोचे उसे संभाला—

“तू जा, पूजा… मैं हूं ना यहां।”


“पर आरव की परीक्षा…”


“मैं देख लूंगी सब।”



पूजा चली गई।


घर की जिम्मेदारी फिर से कमला के हाथ में आ गई।



आरव को पढ़ाना…


उसके साथ बैठना…


उसे समझाना…


उसके सवाल सुनना…


कमला को लगा—

वह फिर से जी रही है।


आरव भी अब उसके पास बैठने लगा।


“दादी, आप सबसे अच्छी हो…”


उसकी यह बात कमला के दिल को छू गई।



चार दिन बाद पूजा लौटी।


घर में कदम रखते ही उसने कमला को गले लगा लिया।


“मम्मी जी… अगर आप नहीं होतीं…”


वह आगे कुछ बोल नहीं पाई।



उस दिन के बाद कुछ बदल गया।


पूजा अब उसके साथ बैठती…

उससे बात करती…

उससे सीखती…



एक दिन पूजा बोली—

“मम्मी जी, इस बार कॉलोनी की पार्टी हमारे घर रखेंगे।”


कमला चौंक गई—

“सच?”


“हाँ… और सब आप ही संभालेंगी।”



उस दिन घर में फिर से रौनक थी।


हंसी… बातें… चाय की खुशबू…


सब कुछ लौट आया था।



रात को पूजा ने कमला का हाथ पकड़ कर कहा—

“मम्मी जी, आप कहीं नहीं जाएंगी… यह घर आपका है।”


कमला ने उसकी तरफ देखा।


आंखों में आंसू थे—

पर इस बार दर्द के नहीं… अपनापन के।



अगले दिन कमला ने अलमारी खोली…


वृद्धाश्रम का फॉर्म निकाला…


और धीरे-से फाड़ दिया।



खिड़की के पास बैठी कमला बाहर देख रही थी।


आज धूप अलग लग रही थी।


हल्की… सुनहरी…

और सुकून देने वाली।


उसे लगा—

शायद जिंदगी खत्म नहीं हुई थी…


बस थोड़ी देर के लिए रुक गई थी।


और अब…


फिर से चल पड़ी है।




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