छोटी सी इच्छा…
राधा जी रसोई में खड़ी जल्दी-जल्दी काम निपटा रही थीं। उनके चेहरे पर हल्की थकान साफ झलक रही थी, लेकिन हाथ लगातार चलते जा रहे थे।
तभी उनकी बहू नेहा रसोई में आई।
“मम्मी जी, आप अभी तक काम कर रही हैं? थोड़ा आराम भी कर लिया कीजिए,” नेहा ने प्यार से कहा।
“बस बेटा, खाना बनाकर रख दूं। तेरे पापा जी को समय पर खाना मिल जाए, फिर आराम कर लूंगी,” राधा जी ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया।
नेहा ने गौर से अपनी सास को देखा। उनकी आँखों में कुछ थकान के साथ-साथ एक दबा हुआ सा खालीपन भी था।
“मम्मी जी, आज मंदिर में भजन संध्या है ना? आप जाने वाली थीं?” नेहा ने पूछा।
राधा जी कुछ पल चुप रहीं, फिर बोलीं— “जाना तो चाहती थी… लेकिन रहने दे। घर का काम भी तो है।”
“काम तो रोज़ ही रहेगा मम्मी जी… लेकिन मन की खुशी रोज़ नहीं मिलती,” नेहा ने धीरे से कहा।
राधा जी ने हल्की हंसी में बात टाल दी— “अब हमारी उम्र में क्या भजन, क्या घूमना-फिरना… तुम लोग जाओ, वही अच्छा लगता है।”
नेहा समझ गई—बात सिर्फ काम की नहीं है, कुछ और भी है जो राधा जी को रोक रहा है।
रात को जब सब खाना खा रहे थे, तब नेहा ने बात छेड़ी—
“पापा जी, कल मोहल्ले में महिलाओं का एक छोटा सा कार्यक्रम है—भजन, कीर्तन और थोड़ा मिलना-जुलना… मम्मी जी को भेज देते हैं ना?”
नेहा की बात सुनकर रमेश जी (ससुर जी) ने तुरंत कहा— “उन्हें इन सब चीज़ों में क्या करना है? घर में ही ठीक हैं।”
राधा जी चुपचाप थाली में रोटी तोड़ती रहीं। उनकी आँखों में एक पल के लिए हल्की निराशा झलकी, जिसे शायद कोई और नहीं देख पाया… लेकिन नेहा ने देख लिया।
उस रात नेहा को नींद नहीं आई।
अगले दिन सुबह उसने तय कर लिया—कुछ बदलना ही होगा।
दोपहर का समय था। नेहा ने सारा काम जल्दी-जल्दी निपटाया और राधा जी के पास आकर बैठ गई।
“मम्मी जी, आप सच-सच बताइए… आपको कभी मन नहीं करता बाहर जाने का? अपनी सहेलियों से मिलने का?” नेहा ने सीधे पूछा।
राधा जी ने कुछ पल चुप रहकर कहा— “मन तो बहुत करता है बेटा… लेकिन आदत नहीं रही अब। पहले कोशिश की थी… लेकिन तेरे पापा जी को पसंद नहीं था। धीरे-धीरे मैंने खुद ही छोड़ दिया।”
“और आपकी खुशी?” नेहा ने धीरे से पूछा।
राधा जी हल्का सा मुस्कुराईं— “औरतें अपनी खुशी ढूंढना कब सीख पाती हैं बेटा…”
नेहा के दिल में ये बात चुभ गई।
शाम को रमेश जी ऑफिस से लौटे। नेहा ने उन्हें चाय देते हुए बात शुरू की—
“पापा जी, एक बात पूछूं?”
“हां बेटा, पूछो।”
“आपको अपने दोस्तों से मिलना अच्छा लगता है?”
“बहुत अच्छा लगता है! जब दोस्तों के साथ बैठते हैं ना, तो सारी थकान दूर हो जाती है,” रमेश जी ने मुस्कुराते हुए कहा।
“और अगर कोई आपसे कह दे कि आप अपने दोस्तों से मिलना बंद कर दीजिए… तो कैसा लगेगा?” नेहा ने सीधा सवाल किया।
रमेश जी थोड़ा चौंक गए— “अजीब सवाल है ये… बुरा लगेगा।”
नेहा ने धीरे से कहा— “बस पापा जी… यही मम्मी जी के साथ भी हुआ है।”
रमेश जी चुप हो गए।
नेहा आगे बोली— “उन्होंने कभी शिकायत नहीं की… लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ा। उन्होंने आपकी खुशी के लिए अपने मन की हर छोटी-बड़ी इच्छा छोड़ दी।”
कुछ देर तक कमरे में खामोशी छाई रही।
फिर रमेश जी ने धीमी आवाज़ में कहा— “मुझे… कभी एहसास ही नहीं हुआ।”
“अभी भी देर नहीं हुई पापा जी,” नेहा ने मुस्कुराते हुए कहा।
अगले दिन शाम को…
राधा जी रसोई में काम कर रही थीं कि तभी रमेश जी अंदर आए।
“राधा, आज खाना थोड़ा जल्दी बना लो… और हां, तैयार भी हो जाना।”
राधा जी ने हैरानी से पूछा— “क्यों?”
“आज तुम्हें भजन संध्या में जाना है… और मैं खुद छोड़कर आऊंगा,” रमेश जी ने मुस्कुराते हुए कहा।
राधा जी एक पल के लिए उन्हें देखती रह गईं। उनकी आँखों में विश्वास और खुशी दोनों थे।
“सच?” उनकी आवाज़ हल्की कांप गई।
“हां, और अब से हर हफ्ते जाओगी,” रमेश जी ने प्यार से कहा।
राधा जी की आँखें भर आईं।
दरवाज़े पर खड़ी नेहा ये सब देख रही थी। उसके चेहरे पर सुकून भरी मुस्कान थी।
उस दिन सिर्फ राधा जी ही भजन में नहीं गई थीं…
बल्कि वो अपनी छोटी सी दबाई हुई इच्छा को फिर से जीने निकल पड़ी थीं।
सीख:
कभी-कभी किसी की जिंदगी बदलने के लिए बड़े फैसले नहीं…
बस किसी के मन को समझने की छोटी सी कोशिश ही काफी होती है। ❤️

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