जब बहू थक गई… तब परिवार जागा
“जिस घर को मैंने अपनी मेहनत और प्यार से संभाला था… उसी घर में एक दिन मुझे यह एहसास दिलाया गया कि अब मेरी जरूरत सिर्फ काम तक सीमित रह गई है। लेकिन उस दिन मुझे समझ आया कि रिश्ते तब नहीं टूटते जब लोग दूर हो जाते हैं… रिश्ते तब टूटते हैं जब कोई एक इंसान चुपचाप सब सहता रहता है…”
पूरे घर में मेहमानों की आवाजें गूंज रही थीं।
ड्रॉइंग रूम में रोशनी जगमगा रही थी। रिश्तेदार हंस-बोल रहे थे। रसोई में पकवानों की खुशबू फैली हुई थी। बाहर गली में बच्चों की आवाजें सुनाई दे रही थीं। लेकिन इस पूरे शोर के बीच नेहा के मन में एक अजीब सी खामोशी थी।
उसने ट्रे में चाय के कप सजाए और धीरे-धीरे चलकर मेहमानों के सामने रख दिए।
तभी उसकी सास सावित्री देवी ने ऊँची आवाज में कहा, “अरे बहू, जल्दी करो। लोगों को इंतजार कराना अच्छी बात नहीं होती।”
नेहा ने हल्की मुस्कान दी और फिर वापस रसोई में चली गई।
सुबह से वह लगातार काम कर रही थी। कभी खाना बनाना, कभी सफाई, कभी मेहमानों को संभालना। ऊपर से दो साल की बेटी परी भी बार-बार उसे ढूंढ रही थी।
लेकिन घर में किसी की नजर उसकी थकान पर नहीं पड़ रही थी।
राहुल सोफे पर अपने दोस्तों के साथ बैठा हंस रहा था। उसने एक बार भी उठकर नहीं पूछा कि नेहा ने कुछ खाया है या नहीं।
नेहा ने पानी पीने के लिए गिलास उठाया ही था कि तभी सास की आवाज फिर गूंज गई।
“बहू, मिठाई खत्म हो गई है। जल्दी से और ले आओ।”
उसने बिना कुछ कहे फिर काम शुरू कर दिया।
रात तक उसके पैरों में सूजन आ चुकी थी। पीठ दर्द से टूट रही थी। लेकिन जब सब मेहमान चले गए तो राहुल ने कमरे में आते ही कहा, “मम्मी कह रही थीं कि तुम आजकल काम में ढील देने लगी हो।”
नेहा कुछ पल उसे देखती रह गई।
“ढील?” उसकी आवाज कांप गई। “सुबह से लगातार काम कर रही हूँ राहुल। एक बार भी तुमने ये नहीं पूछा कि मैं ठीक हूँ या नहीं।”
राहुल झल्लाकर बोला, “तो क्या हुआ? घर की जिम्मेदारी है। मम्मी भी तो उम्रभर करती आई हैं।”
नेहा की आँखें भर आईं।
“फर्क सिर्फ इतना है राहुल… उन्होंने ये सब अकेले नहीं किया था। उनके साथ परिवार था। लेकिन मैं इस घर में अकेली पड़ गई हूँ।”
राहुल ने बात को नजरअंदाज करते हुए मोबाइल उठा लिया। “अब ड्रामा मत शुरू करो।”
उस रात नेहा बहुत देर तक जागती रही।
बगल में सोई छोटी परी बार-बार नींद में उसका हाथ पकड़ रही थी। नेहा उसे देखते हुए सोच रही थी—क्या उसकी बेटी भी बड़ी होकर यही सब सहेगी?
अगले दिन उसकी तबीयत अचानक बिगड़ गई।
तेज बुखार था, शरीर कांप रहा था। फिर भी वह रसोई में खड़ी थी।
सावित्री देवी ने कहा, “इतना भी क्या बीमार होना कि रोटी तक न बन पाए।”
नेहा ने खुद को संभालते हुए आटा गूंथना शुरू किया, लेकिन अचानक उसकी आँखों के सामने अंधेरा छा गया और वह जमीन पर गिर पड़ी।
जब उसे होश आया तो वह अस्पताल में थी।
डॉक्टर गंभीर आवाज में कह रहे थे, “इनके शरीर में बहुत कमजोरी है। तनाव और लगातार काम की वजह से हालत बिगड़ी है। इन्हें आराम की जरूरत है।”
राहुल पहली बार चुप था।
डॉक्टर ने उसकी तरफ देखते हुए कहा, “घर चलाना सिर्फ एक इंसान की जिम्मेदारी नहीं होती। अगर आप लोग इन्हें आराम नहीं देंगे तो आगे परेशानी बढ़ सकती है।”
घर लौटने के बाद पहली बार नेहा को कमरे में आराम करने दिया गया।
लेकिन उसी रात उसने बाहर ड्रॉइंग रूम में राहुल और उसकी माँ की बातें सुन लीं।
सावित्री देवी बोलीं, “आजकल की लड़कियाँ जरा सा काम करके बीमार पड़ जाती हैं।”
राहुल ने धीरे से कहा, “मम्मी… शायद गलती हमारी भी है।”
“मतलब?”
“मैंने कभी नेहा की तरफ ध्यान ही नहीं दिया।”
सावित्री देवी कुछ पल चुप रहीं, फिर बोलीं, “मैंने भी शायद उसे बहू समझा… बेटी नहीं।”
कमरे के अंदर लेटी नेहा की आँखों से आँसू बह निकले।
अगले दिन कुछ अलग हुआ।
राहुल खुद रसोई में गया। उसने चाय बनाई। स्वाद अजीब था, लेकिन पहली बार उसमें कोशिश थी।
सावित्री देवी ने खुद नेहा के कमरे में खाना लाकर रखा।
“खा लो बेटा।”
नेहा हैरानी से उन्हें देखने लगी।
सावित्री देवी धीरे से बोलीं, “मुझे माफ कर दो। मैं भूल गई थी कि इंसान थक भी जाता है।”
नेहा की आँखें भर आईं।
उस दिन के बाद घर धीरे-धीरे बदलने लगा।
राहुल ऑफिस से लौटकर परी को संभालने लगा। कभी बर्तन धो देता, कभी रसोई में हाथ बँटा देता।
शुरू-शुरू में उसे बहुत दिक्कत हुई। एक दिन तो उसने गलती से नमक की जगह चीनी डाल दी।
नेहा हंस पड़ी।
शायद कई महीनों बाद वो खुलकर हंसी थी।
धीरे-धीरे घर में झगड़े कम होने लगे।
सावित्री देवी भी अब नेहा को हर वक्त टोकने के बजाय उसकी तारीफ करने लगीं।
एक दिन उन्होंने मोहल्ले की औरतों से कहा, “घर सिर्फ बहू के भरोसे नहीं चलता। परिवार साथ दे तो घर स्वर्ग बन जाता है।”
नेहा ने ये बात सुनी तो उसकी आँखें नम हो गईं।
कुछ महीनों बाद राहुल ने नेहा से कहा, “तुम फिर से अपनी पढ़ाई पूरी क्यों नहीं करती?”
नेहा चौंक गई।
शादी के बाद उसने अपना बी.एड अधूरा छोड़ दिया था।
“अब कैसे?” उसने धीमे से पूछा।
राहुल मुस्कुराया। “जैसे तुमने हमेशा सबका साथ दिया… अब हमारी बारी है।”
उस दिन नेहा को लगा जैसे किसी ने उसके अंदर बुझ चुकी रोशनी फिर जला दी हो।
उसने दोबारा पढ़ाई शुरू की।
सावित्री देवी परी को संभालतीं। राहुल घर के काम में हाथ बँटाता।
दो साल बाद नेहा एक स्कूल में टीचर बन गई।
जिस दिन उसकी पहली तनख्वाह आई, उसने सबसे पहले सास के हाथ में मिठाई रखी।
सावित्री देवी की आँखें भर आईं। “मुझे तुम पर गर्व है बेटा।”
नेहा मुस्कुराई।
उसे पहली बार लगा कि ये घर सच में उसका अपना है।
आज जब राहुल रसोई में खड़ा चाय बना रहा होता है, और परी अपनी दादी के साथ हंसती खेलती है… तब नेहा अक्सर सोचती है—
समस्या जिम्मेदारियों में नहीं होती… समस्या तब होती है जब एक इंसान सारी जिम्मेदारियाँ अकेले उठाने लगता है।
अगर परिवार साथ खड़ा हो जाए… तो सबसे थका हुआ इंसान भी फिर से मुस्कुराना सीख जाता है।
क्योंकि रिश्ते सिर्फ साथ रहने से नहीं चलते… रिश्ते एक-दूसरे का बोझ हल्का करने से चलते हैं।

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