जो दराज़ 1 सालों तक नहीं खुली…
रीमा की शादी को आज पूरा एक साल हुआ था।
ससुराल में सब अच्छे थे, पर उसके दिल में एक कमी हमेशा चुभती थी—
सासु माँ की याद।
रीमा की सास, सावित्री देवी, उसकी शादी से छह महीने पहले गुज़र गई थीं।
लोग कहते थे—
“अगर माँ होतीं, रीमा को बेटी जैसा प्यार देतीं।
बहुत सीधी-सादी, दयालु और घर को संभालकर रखने वाली थीं।”
रीमा ने उनकी तस्वीर तो देखी थी…
पर रिश्ता बनने का मौक़ा ही नहीं मिला।
शादी के बाद..
रीमा अपने कमरे में अक्सर सावित्री देवी की फोटो को देखती।
मन में अजीब-सा अपनापन महसूस होता।
जैसे कोई उसे दूर से आशीर्वाद दे रहा हो।
घर भी बड़ा था, पर उसमें एक कमरा हमेशा बंद रहता था—
सासु माँ का कमरा।
कहते हैं, उनकी चीजें जैसी थीं, वैसी ही रख दी गईं।
न पति ने छुआ, न देवरों ने।
सबको लगता था—कमरे को खोला तो दर्द वापस लौट आएगा।
छह साल से कोई उस कमरे में नहीं गया था।
एक दिन…
रीमा सुबह पूजा कर रही थी, तभी उसके पति आदित्य ने धीरे से कहा—
“रीमा… क्या तुम माँ का कमरा एक बार साफ कर दोगी?
मैं… हिम्मत नहीं कर पाता।”
रीमा ने सिर हिलाया।
आज पहली बार उसे वो ताला खोलना था जिसे एक साल से किसी ने छुआ नहीं था।
कमरे का माहौल..
जैसे ही ताला खुला…
पुराने इत्र की एक हल्की-सी खुशबू कमरे में फैल गई।
खिड़की पर हल्की धूल जमी थी,
टेबल पर दवाईयों की खाली शीशी,
और दीवार पर वही—
सावित्री देवी की मुस्कुराती तस्वीर।
रीमा जैसे-जैसे सामान हटाती जा रही थी,
कमरा उतना ही भावुक हो रहा था।
अलमारी खोली—
एक सूती साड़ी बहुत सलीके से, साफ़-सुथरे तरीके से तह करके रखी मिली।
जैसे अभी पहनकर आए हों।
पलंग के पास एक छोटी-सी लकड़ी की स्टडी टेबल।
और उस पर—
एक पुरानी चाबी।
उस चाबी को देखकर रीमा रुक गई।
टेबल की दाईं दराज़ बंद थी… और चाबी शायद उसी की थी।
जब दराज़ खुली…
रीमा ने चाबी लगाई।
थोड़ी जंग लगी थी, पर खुल गई।
और जो कुछ अंदर रखा था—
उसे देखकर रीमा की साँस थम गई।
एक मोटी डायरी
कवर पर लिखा था—
“मेरी बहू के नाम…”
रीमा के हाथ काँप गए।
उसने धीरे से पहला पन्ना खोला।
डायरी की शुरुआत...
“पता नहीं मेरी बहू कैसी होगी…?”
“क्या वो मुझे माँ कहेगी…?”
“क्या मैं उसे अपनी बेटी बना पाऊँगी…?”
रीमा ने पढ़ना जारी रखा—
“मुझे डर है कि कहीं मैं बहुत जल्दी इस दुनिया से चली गई तो…
मेरी बहू को लगेगा कि मैंने उसे कभी अपनाया ही नहीं।”
रीमा की आँखें भर आईं।
डायरी में हर पन्ने पर सावित्री देवी के दिल की बातें थीं—
कैसे वह अपनी आने वाली बहू के लिए मेहँदी की कोनें खरीदकर रखतीं,
कैसे उन्होंने खुद छोटी एक जोड़ी पायल चुनी थी
“मेरी बहू के लिए”।
दूसरा पन्ना...
“अगर मेरी बहू पढ़ी-लिखी होगी… तो मैं उसके साथ अंग्रेज़ी सीखूँगी।”
“और अगर वह खाना अच्छे से बनाती होगी… तो मैं उसे अपनी राजस्थानी मिठाइयों की रेसिपी दूँगी।”
रीमा रो पड़ी।
डायरी का आख़िरी पन्ना...
“अगर मैं अपनी बहू से मिलने से पहले चली जाऊँ…
तो यह डायरी उसे दे देना।
ताकि उसे पता चले—
कि मैंने उसे कभी देखा नहीं,
पर उसे अपनी बेटी की तरह चाहा है।
मेरे कमरे की दाईं दराज़ में एक छोटा सा बॉक्स है—
वो भी उसी के नाम।”
रीमा ने तुरंत दराज़ में हाथ डाला।
छोटा बॉक्स...
एक सुंदर-सा लकड़ी का बॉक्स।
उसमें—
एक जोड़ी चांदी की पायल
एक छोटी-सी मंगलसूत्र की मनोकामना माला
और एक कागज़
कागज़ पर लिखा था—
“बहू,
जिस दिन तू मेरे कमरे में आएगी…
उस दिन समझूँगी कि तूने मुझे अपनाया है।
ये सब तेरे लिए है।
मैंने अपनी बहू को बेटी की तरह चाहा है,
चाहे मैं उससे मिल न पाऊँ।”
रीमा फूट-फूटकर रो पड़ी।
उसने पायल को सीने से लगाया—
“माँ… आपने मुझे बिना मिले इतना प्यार दिया…”
शाम को...
रीमा ने सारी चीजें आदित्य को दिखाईं।
आदित्य रो पड़ा—
“माँ… तुमने ये मुझसे भी छुपाया…”
दोनों ने मिलकर सासु माँ की फोटो के सामने दीया जलाया।
रीमा ने पायल पहनकर धीरे से कहा—
“माँ… आपकी बहू आज आपके
कमरे में आई है।
और आपके दिल में हमेशा रही है।”
कहानी का संदेश:
रिश्ते खून से नहीं, दिल से बनते हैं।
कभी-कभी जिससे हम मिले भी नहीं—
वो हमें सबसे गहरा अपनापन दे जाता है।
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