माया की खामोश सुबहें
रात के साढ़े बारह बज चुके थे। पूरा मोहल्ला सो चुका था, बस एक घर में हल्की-सी खटर-पटर सुनाई दे रही थी।
रसोई में माया बर्तन धो रही थी, हाथों पर गर्म पानी से लाल निशान पड़ गए थे, पर चेहरा स्थिर था — जैसे उसकी थकान भी थक गई हो।
टेबल पर उसके लिए रखी आधी कचौरी अब सख़्त हो चुकी थी। वह उसे देखती रही…
कुछ खाने की ताक़त थी नहीं, और भूख तो कब की दिल से उतर चुकी थी।
पीछे से सासू माँ की आवाज़ आई,
“अरे माया, तुझे कब नींद आती है? सुबह चार बजे उठना भी तो है। जल्दी कर, लाइट बंद कर दे।”
माया ने बस “हाँ” कहा, मगर उसके मन ने चुपचाप “थक गई हूँ” कह दिया।
पर उसके मन की बात सुनने वाले घर में कोई नहीं था।
कमरे में पति करण अपने फोन पर स्क्रॉल कर रहा था।
माया अंदर आई तो उसने पूछा ही नहीं कि वह अब तक जाग क्यों रही थी।
बस बोला,
“कल मेरा लंच मत भूलना, मीटिंग है।”
और करवट बदलकर सो गया।
माया ने तकिये के कोने में सिर रखा।’ आँखें बंद करते ही अलार्म बज गया — सुबह के चार।
शरीर ने चीखा, पर उसने सुनने से इनकार कर दिया।
सुबह की वही दिनचर्या…
रसोई में चाय चढ़ी थी।
डिब्बों की खड़खड़ाहट सुनकर ऐसा लगता था जैसे घर उसी पर चल रहा हो।
सास बोलीं,
“माया, पराठे थोड़ा पतले बनाना। मोटे पराठे से मुझे गैस होती है।”
ससुर अखबार समेटकर बोले,
“अरे बहू, मेरा गर्म पानी कहाँ है?”
करण बोला,
“मेरी कमीज़ ढूँढो, समय नहीं है!”
तीनों की आवाज़ें माया की तरफ़ तीरों की तरह आतीं,
और वह चुपचाप हर आवाज़ को अपना काम मान लेती।
बच्चे उठे,
“मम्मी, आज मेरा प्रोजेक्ट है, आपने बनाया नहीं!”
“मम्मी, मुझे देर हो रही है!”
“मम्मी, मोज़े कहाँ हैं?”
माया कहीं भी “माया" नहीं थी।
सिर्फ “मम्मी”, “बहू”, “भाभी” थी —
उसका अपना नाम घर में जैसे खो गया था।
दोपहर की खामोशी… जो सिर्फ़ बाहर थी, भीतर नहीं
सबके जाने के बाद घर शांत था,
पर माया का मन शोर करता रहा।
वह झाड़ू लगाती, पोछा लगाती, कपड़े धोती, सब्ज़ी काटती…
और हर काम के साथ एक सवाल दिल में उठता—
“किसी ने आज तक मुझसे पूछा कि मैं कैसी हूँ?”
शाम को बच्चों ने होमवर्क करवाया,
सास ने टीवी की आवाज़ धीमी करने को कहा,
ससुर ने बोल दिया कि चाय में चीनी कम है।
करण आया तो बोला,
“बहुत थक गया हूँ… खाना दो।”
माया ने सोचा—
“मैं भी थक गई हूँ।”
पर कहना उसके हिस्से में नहीं था।
एक दिन… उसकी साँसें धीमी हो गईं
माया को कई दिनों से बुखार था,
पर उसने किसी को बताया नहीं।
किसी ने पूछा भी नहीं।
रात को वह रसोई में चपाती सेंक रही थी।
अचानक उसे लगा कि पैरों तले ज़मीन खिसक गई है।
उसने चूल्हे का सहारा लिया, फिर कुर्सी पर बैठ गई।
थोड़ी देर बाद बच्चे बोले,
“मम्मी, पानी चाहिए!”
पर रसोई से कोई जवाब नहीं आया।
रात के ढाई बजे… करण की नींद खुली
उसे रसोई की लाइट जलती दिखी।
वह चिढ़कर बोला,
“माया फिर सोई नहीं क्या?”
जब वह पास गया, तो देखा —
माया कुर्सी पर झुकी हुई थी, बिल्कुल शांत।
“माया!”
उसने घबराकर उसका कंधा हिलाया।
हाथ ठंडे थे।
करण का दिल धड़क गया।
पूरे घर में हलचल मच गई।
डॉक्टर आया, जाँच की, और बोला —
“बहुत देर हो चुकी है… शरीर ने जवाब दे दिया है।
ये कई दिन से बुखार में काम कर रही थी। इन्हें आराम की ज़रूरत थी…
बहुत ज़्यादा आराम की।”
सास ने रोते हुए कहा,
“पर उसने कभी बताया ही नहीं…”
डॉक्टर ने उनकी तरफ़ देखे बिना कहा,
“कहने के लिए सुनने वाला भी होना चाहिए।”
घर का हर कोना चुप था।
वो चुप्पी जो तड़पाती है।
कुछ दिनों बाद… अलमारी में एक नोट मिला
करण कपड़े निकाल रहा था कि एक कागज़ गिरा।
उसमें लिखा था —
“मेरी दिनचर्या”
और नीचे—
“सुबह 4 बजे उठना
चाय
नाश्ता
लंच
बच्चों का काम
घरेलू काम
सास-ससुर की दवाइयाँ
रात का खाना
दूसरे दिन की तैयारी
और…
कभी-कभी…
रो लेना — चुपचाप।”
दूसरे पन्ने पर लिखा था —
“ऐसा कोई दिन नहीं जब मैं थकती नहीं,
पर ऐसा भी कोई दिन नहीं जब कोई पूछता हो कि
‘माया, तू ठीक है?’”
करण पढ़ता गया,
और हर शब्द उसके सीने पर घूँसे की तरह लगता गया।
आख़िरी पन्ने पर—
“अगर मैं कभी थककर रुक जाऊँ,
तो मेरी जगह आने वाली औरत से
बस रोज़ एक बार ‘ठीक हो?’ पूछ लेना।
ये तीन शब्द किसी को ज़िंदा रखने के लिए काफ़ी होते हैं।”
करण की आँखों से आँसू गिर पड़े।
उसने नोट सीने से लगा लिया।
उस दिन के बाद…
उस घर में अब भोजन समय पर बनता था,
पर उसमें वो प्यार नहीं था।
घर साफ़ रहता था,
पर वो गर्माहट नहीं थी।
करण अब किसी भी औरत से घरेलू काम करवाने से पहले खुद एक बार हाथ बँटाता था।
सास हर सुबह अपने आप चाय बनाती थीं।
बच्चे स्कूल जाने से पहले खुद अपना बैग सेट करते थे।
क्योंकि अब किसी को डर था —
कहीं फिर कोई माया चुपचाप टूट न जाए।
अंत में सीख:
हर घर में एक माया होती है —
जिसे कोई मशीन की तरह चलाता रहता है।
वो ना शिकायत करती है,
ना रुकती है…
बस थकती रहती है।
कभी उसके पास बैठकर पूछ लेना—
“तुम ठीक हो?”
शायद यही सवाल
एक और स्त्री को खोने से बचा ले।
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