रिश्तों की गर्माहट
सुबह का समय था।
कमलेश जी चाय का कप लेकर बालकनी में बैठे थे, तभी उनकी पत्नी रीता जी रसोई से आवाज़ लगाती हैं —
“सुनिए जी, ज़रा रश्मि को देखिए, फिर से देर तक सोई हुई है। आज भी ऑफिस में लेट हो जाएगी।”
कमलेश जी मुस्कुराए —
“अरे भई, नई-नई नौकरी लगी है, थोड़ा समय दो। हर बात पर टोकोगी तो बच्ची घबरा जाएगी।”
रीता जी झट से बोलीं —
“समय? पूरे दो महीने हो गए। ऑफिस की चिंता है, लेकिन घर की नहीं। न उठना समय से, न पूजा-पाठ, न हमसे ठीक से बातें करना।”
कमलेश जी ने धीरे से कहा —
“रीता, तुम भूल रही हो शायद... जब तुम पहली बार इस घर में आई थीं, तब भी तुम्हें सबकुछ समझने में वक्त लगा था। तुम्हारी सास यानी मेरी माँ भी कहती थीं — ‘बेटा, रिश्ते पकते हैं, उबलते नहीं।’”
रीता चुप हो गईं। पर मन में एक हल्की चुभन रह गई।
रश्मि अपने कमरे से तैयार होकर निकली —
“गुड मॉर्निंग मम्मी!”
“गुड मॉर्निंग!” रीता जी ने जवाब तो दिया, पर चेहरे पर मुस्कान नहीं थी।
रश्मि को महसूस हुआ कि घर का माहौल कुछ दिन से बदल गया है।
माँ हर बात पर नाराज़ हो जाती हैं, पापा समझाते हैं, लेकिन कुछ असर नहीं होता।
शाम को जब ऑफिस से लौटी तो देखा, माँ बरामदे में बैठी हैं, शायद कुछ सोच रही थीं।
रश्मि पास जाकर बोली —
“मम्मी, चाय बना दूँ?”
“नहीं, मुझे नहीं चाहिए।”
“मम्मी, गुस्सा हैं मुझसे?”
रीता जी ने गहरी साँस ली —
“नहीं बेटा, गुस्सा नहीं हूँ। बस लगता है कि आजकल तुम बदल गई हो। पहले तो हर बात बताती थी, अब तो दिनभर मोबाइल और ऑफिस में ही खोई रहती हो।”
रश्मि थोड़ा रुकी, फिर बोली —
“मम्मी, नौकरी नई है, जिम्मेदारियाँ ज़्यादा हैं। मैं आपसे बात करना चाहती हूँ पर सोचती हूँ कहीं आप नाराज़ न हो जाएँ। मुझे आपकी हर बात याद रहती है, बस समय नहीं मिल पाता।”
रीता की आँखें भर आईं —
“अरे पगली, नाराज़ कैसे हो सकती हूँ! मैं तो चाहती हूँ कि तुम आगे बढ़ो। पर थोड़ा समय अपने घर, अपने रिश्तों के लिए भी रखो। हम भी तुम्हारे हिस्से की मुस्कान देखने को तरस जाते हैं।”
रश्मि ने माँ का हाथ पकड़ लिया —
“आप सही कहती हैं मम्मी। चलिए, आज आपकी पसंद की चाय मैं बनाती हूँ, फिर साथ में बातें करेंगे।”
उस दिन दोनों देर रात तक बातें करती रहीं — पुरानी यादें, पापा की हँसी, स्कूल के किस्से, सब याद कर-करके हँसती रहीं।
कमलेश जी ने अखबार से झाँकते हुए कहा —
“लगता है अब घर में फिर से रौनक लौट आई है।”
रीता मुस्कुराईं —
“हाँ जी, मैंने भी सीख लिया है कि रिश्तों को शब्दों से नहीं, भावनाओं से जोड़ा जाता है।”
कुछ दिनों बाद रश्मि ने ऑफिस में एक अवॉर्ड जीता।
वो घर आकर झट से बोली —
“मम्मी-पापा, ये अवॉर्ड आप दोनों के लिए है। आपकी सीख, आपकी डांट और आपके विश्वास के बिना मैं कुछ नहीं थी।”
रीता जी ने उसे गले लगाते हुए कहा —
“बस बेटा, यही तो चाहिए था… तू आगे बढ़े, लेकिन जड़ें अपने परिवार में बनी रहें।”
सीख:
रिश्तों को समझने के लिए बड़े-बड़े शब्दों की ज़रूरत नहीं होती।
बस थोड़ा समय, थोड़ा अपनापन और थोड़ी
समझ — यही वो मसाले हैं जो हर घर के रिश्तों को सुगंधित बनाए रखते हैं।
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