पुराने रेडियो की आवाज़

 

एक बुज़ुर्ग व्यक्ति अपनी दिवंगत पत्नी की तस्वीर और टूटे रेडियो के साथ अकेले बैठा है — प्रेम, याद और सन्नाटे की गहराई को दर्शाता भावुक दृश्य।


रिटायरमेंट को दस साल बीत चुके हैं।

अब मेरी उम्र पचहत्तर साल है।

शरीर से ज़्यादा थकान अब मन में महसूस होती है।

पत्नी दो साल पहले ही चली गई थी।

घर बड़ा है, पर अब हर कमरा खाली लगता है।


सुबह-सुबह जब आँगन में झाड़ू लगाता हूँ तो अक्सर वही पुरानी बात याद आ जाती है —

"अरे छोड़ो ना जी, मैं लगा दूँगी झाड़ू,"

— वो मुस्कुराती थी, और मैं हमेशा कहता —

"तुम बस बातें करती रहो, मैं कर लूँगा।"


अब वो बातें नहीं हैं, और मैं रोज वही झाड़ू लगाता हूँ,

जैसे किसी अधूरी आदत को निभा रहा हूँ।



बेटा-बेटी सब अपनी-अपनी दुनिया में व्यस्त हैं।

बेटा शहर के बड़े इलाके में रहता है, बेटी विदेश में।

महीने में एक बार फोन आता है —

“पापा, दवाई लेते रहिएगा, अकेले बाहर मत जाया कीजिए।”

बस इतना कहकर वो अपने काम में लग जाते हैं।


बात खत्म होने के बाद मोबाइल स्क्रीन पर "कॉल एंडेड" लिखा आता है,

और मैं कई मिनट तक उस स्क्रीन को देखता रहता हूँ।

कभी-कभी लगता है, अब इंसान की ज़रूरत नहीं — बस उसकी आवाज़ चाहिए।


एक दिन अटारी में पुराना रेडियो मिला — वही जो मेरी पत्नी को बहुत पसंद था।

उसके बिना खाना बनाना अधूरा लगता था, और बिना रेडियो के वो खाना नहीं बनाती थी।

“गीत सुनते हुए सब कुछ अच्छा लगता है,” वो कहती थी।


रेडियो पर धूल जमी थी।

धीरे-धीरे कपड़े से पोंछा, स्विच ऑन किया —

“टर्र...टर्र...” की आवाज़ आई, फिर अचानक किसी स्टेशन से पुराना गाना बजा —


“तेरे बिना ज़िंदगी से कोई शिकवा तो नहीं...”


और मैं रुक गया।

दिल जैसे किसी ने कस कर पकड़ लिया हो।

आँखों के कोनों से कुछ ढलक पड़ा।

उस दिन पहली बार महसूस हुआ —

यादें भी आवाज़ों में कैद हो सकती हैं।


अब रोज़ शाम मैं रेडियो के पास बैठता हूँ।

टीवी चलता है घर में, पर दिल सिर्फ उस रेडियो में है।

कभी-कभी लगता है, वो यहीं कहीं पास बैठी है —

बस मैं देख नहीं पा रहा।


एक दिन रेडियो ने आवाज़ देना बंद कर दी।

कितनी भी कोशिश की — चालू नहीं हुआ।

जैसे किसी ने अचानक चुप्पी ओढ़ ली हो।


मैंने रेडियो को अपने पास रखा, और फुसफुसाया —

“अब तू भी चली गई क्या?”


अगले दिन बेटा आया।

मुझे उदास देखा तो बोला,

“पापा, नया रेडियो ले आते हैं, ये पुराना कब तक चलाओगे?”


मैंने मुस्कुराते हुए कहा —

“बेटा, नया रेडियो तो मिल जाएगा,

पर इस पुराने में तेरी माँ की हँसी गूँजती थी,

वो कहाँ से लाऊँ?”


बेटा कुछ पल चुप रहा।

फिर बोला, “ठीक है पापा, इसे ठीक करवा देंगे।”


उसने रेडियो उठाया और बाहर चला गया।

मैंने खिड़की से देखा —

वो गाड़ी में बैठकर रेडियो ले गया।

उस दिन के बाद, वो रेडियो फिर कभी वापस नहीं आया।


अब कमरे की दीवार पर एक फोटो टंगी है —

पत्नी की मुस्कुराती हुई तस्वीर,

और उसके नीचे एक खाली जगह —

जहाँ वो रेडियो रखा करता था।


कभी-कभी लगता है,

उस खाली जगह से अब भी वही आवाज़ आती है —

“रेडियो बंद मत करना, गाना अधूरा रह जाएगा।”


मैं हल्के से मुस्कुराता हूँ,

आँखें बंद करता हूँ,

और हवा में उसके होने का एहसास ढूँढता हूँ।


अंतिम पंक्तियाँ:

अब मुझे किसी के आने की उम्मीद नहीं रहती।

बस हर शाम, सूरज ढलते ही,

मैं उस खाली जगह को देखकर कहता हूँ —


“सुनो, आज फिर बहुत सन्नाटा है...

थोड़ा गाना सुना दो ना।”


संदेश:

कभी-कभी यादें चीज़ों में बस जाती हैं —

रेडियो, तिजोरी, चाभी या कोई पुराना फोटो।

लोग चले जाते हैं,

पर उनके होने का अहसास उन चीज़ों से हमेशा ज़िंदा रहता है।


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