पुरानी कुर्सी
“अरे ये कुर्सी अब फेंक दो न! जगह ही घेर रखी है,” सीमा ने झुंझलाते हुए कहा।
“नहीं! इसे कोई नहीं फेंकेगा,” रवि ने ज़ोर से जवाब दिया।
सीमा ने भौंहें सिकोड़ लीं, “अरे भई, इस टूटी-फूटी कुर्सी से तुम्हारा ऐसा क्या लगाव है?”
रवि कुछ पल चुप रहा, फिर धीरे से बोला — “इस कुर्सी पर पापा बैठते थे।”
घर में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।
रवि के पिता, रिटायर्ड स्कूल टीचर, बहुत सादे और सिद्धांतों वाले इंसान थे।
हर सुबह अख़बार लेकर इसी कुर्सी पर बैठते, चाय की चुस्की लेते और अख़बार के साथ देश-दुनिया पर टिप्पणी करते।
“पढ़ाई ही असली पूंजी है बेटा,” वो अक्सर कहा करते थे।
रवि को याद है, जब उसने पहली बार इंजीनियरिंग कॉलेज की परीक्षा पास की थी, तो पापा ने उसी कुर्सी पर बैठे-बैठे खुशी के आँसू पोंछे थे।
“मेरा बेटा अब बड़ा आदमी बनेगा,” उन्होंने कहा था।
लेकिन ज़िंदगी ने करवट ली।
एक दिन अचानक पापा को हार्ट अटैक आया और वो कुछ ही मिनटों में चले गए।
रवि के लिए वो कुर्सी तब से सिर्फ़ लकड़ी का टुकड़ा नहीं रही, बल्कि यादों का सहारा बन गई थी।
शुरू के दिनों में वो हर रात उसी कुर्सी के पास बैठा रहता।
कभी लगता पापा अख़बार पढ़ रहे हैं, कभी लगता वो अभी बोलेगे — “चाय बना बेटा।”
कभी-कभी तो रवि खुद चाय बना कर उसी कुर्सी के पास रख देता था।
सीमा समझती थी कि रवि अब भी अपने पिता के ग़म से पूरी तरह बाहर नहीं निकला है।
एक दिन रवि ऑफिस से लौटा तो देखा, सीमा ने घर की सफाई करते हुए वो पुरानी कुर्सी छत पर रख दी थी।
वो ग़ुस्से में बोला — “कौन बोला इसे हटाने को?”
सीमा ने प्यार से कहा — “रवि, वो अब नहीं हैं, उनकी यादें तो दिल में हैं, कुर्सी में नहीं।”
रवि कुछ नहीं बोला, बस चुपचाप छत पर जाकर कुर्सी को साफ़ करने लगा।
वो उसे ऐसे पोंछ रहा था जैसे किसी अपने के चेहरे से धूल हटा रहा हो।
फिर बोला —
“सीमा, तुम्हें पता है...
पापा कहा करते थे,
‘घर में पुरानी चीज़ें संभाल कर रखो बेटा, वो सिर्फ़ सामान नहीं, सबक होती हैं।’”
सीमा की आँखें भर आईं।
वो पास आई और बोली — “ठीक है, इसे रख देते हैं... पर अब इसमें धूल नहीं जमेगी।”
उस दिन से वो कुर्सी फिर से लिविंग रूम में रखी जाने लगी।
रोज़ सुबह रवि वहीं चाय पीता और अख़बार पढ़ता।
धीरे-धीरे उनके बेटे आर्यन को भी आदत हो गई कि “दादाजी की कुर्सी” पर कोई नहीं बैठेगा।
कई साल बीत गए।
एक सुबह सीमा ने देखा — रवि उसी कुर्सी पर बैठा अख़बार पढ़ते-पढ़ते सो गया था।
वो मुस्कराई और बोली — “अब उठिए जनाब, ऑफिस नहीं जाना क्या?”
पर रवि नहीं उठा।
वो बहुत शांत था, बहुत सुकून में — जैसे किसी का इंतज़ार खत्म हो गया हो।
शायद अब वो अपने पापा से मिलने चला गया था...
उस कुर्सी पर बैठे-बैठे — जहाँ से कभी उसके पापा उठे ही नहीं थे।
अब घर के एक कोने में वही पुरानी कुर्सी है।
सीमा और आर्यन रोज़ उसे साफ़ करते हैं, फूल रखते हैं।
कभी आर्यन पूछता — “माँ, ये कुर्सी इतनी ज़रूरी क्यों है?”
सीमा मुस्कुरा कर कहती —
“क्योंकि कुछ यादें कभी पुरानी नहीं होतीं, बस उनका रूप बदल जाता है।”
संदेश:
कभी-कभी ज़िंदगी में कुछ चीज़ें सिर्फ़ वस्तु नहीं होतीं,
वो हमारे बीते हुए प्यार, यादों और रिश्तों का आख़िरी धागा होती हैं।
उन्हें सहेजना — उन लोगों को सहेजना है, जो अब भी हमारे दिल में ज़िंदा हैं।
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