पहली रस्म ही अधूरी रह गई…
रीमा की शादी को अभी छह ही महीने हुए थे।
मायके से सब कहते थे—
“बहुत अच्छे लोग हैं… तुझे राजकुमारी बना कर रखेंगे।”
पर ससुराल में कदम रखते ही उसे पता चल गया था कि राजकुमारी तो दूर, उसे घर की पहली कामवाली समझा जाता है।
सुबह पाँच बजे से रात दस बजे तक काम…
“रीमा छत पर कपड़े फैला दो।”
“रीमा दाल चढ़ा दो।”
“रीमा पूजा की थाली तैयार कर दो।”
ऐसा लगता था जैसे उसके दो नहीं, सबके काम निपटाने के लिए दस-दस हाथ हों।
उसके पति अमन काम में रहते, पर रीमा को दिल से समझते थे।
कहते—
“सब ठीक हो जाएगा… तू थोड़ा धैर्य रख।”
पर रीमा की सास, शारदा देवी, उसे पल भर भी चैन न लेने देतीं।
और ऊपर से ननद—काजल, जो कॉलेज जाती थी और घर के एक भी काम को हाथ न लगाती।
एक दिन…
रीमा सब्ज़ी काट रही थी, तभी सास की तेज आवाज़ गूंजती—
“अरे बहू! चाय नहीं बनी? मेरी तबियत ठीक नहीं… चाय ले आओ।”
रीमा मन में सोचती—
“काश कह पाती कि दो कदम चलकर खुद ले लीजिए…
पर बहू हूँ… कह भी कहाँ सकती हूँ…”
वो चाय लेकर पहुंचती है, तभी काजल वहाँ आ जाती है।
चेहरे पर फेस मास्क लगाए, फोन में रील बनाती हुई—
“भाभी, मेरी एक रिक्वेस्ट है—
कल मुझे लड़के वाले देखने आ रहे हैं।
कृपया प्लीज़, सब तैयारी आप ही संभाल लेना।
मुझे तो बस तैयार होना है।”
रीमा थकी नींद और टूटे मन के बीच बस मुस्कुरा दी—
“हाँ काजल… चिंता मत कीजिए।”
शाम को हुआ हादसा…
काजल अपना मास्क उतारती है और जोर से चीख उठती है—
“ओह मेरी त्वचा!! ये क्या हो गया! पूरा चेहरा लाल पड़ गया!”
सास दौड़ी आती हैं—
“हे भगवान! काजल!
लड़के वाले कल आने वाले हैं…
ये कैसा पैक लगा लिया तूंने?”
रीमा भागते हुए आती है—
“काजल! घबराइए मत… शायद एलर्जी हुई है, मैं चंदन का पेस्ट बना देती हूँ। रात तक राहत मिल जाएगी।”
काजल रो रही थी।
सास काँप रही थीं।
घर में अफरा-तफरी थी।
ऐसे में सिर्फ एक इंसान शांत थी—रीमा।
वो दवा-पत्ती करती रही, तब तक जब तक काजल का चेहरा ठीक न हो गया।
अगला दिन — “लड़के वाले आ रहे हैं”...
सुबह चार बजे ही रीमा उठ गई।
सारा घर साफ, पर्दे बदले, सोफा कवर बदला, मिठाई बनाई, नाश्ता तैयार…
और काजल के लिए खूबसूरत मेकअप भी वही करवा रही थी।
सास बोलीं—
“बहू, तू तो मेरी बेटी से भी ज्यादा मेहनत कर रही है।”
रीमा बस मुस्कुरा दी।
“बेटी जैसी?”
मन चुभा, पर होंठ चुप रहे।
लड़के वाले आए।
नाश्ता किया।
और काजल के संस्कार, व्यवहार, सब देख कर खुश हो गए।
सास गर्व से बोलीं—
“सब कुछ मेरी बहू ने किया है… मेरी रीमा।”
रीमा का दिल पहली बार हल्का हुआ था।
उसे लगा शायद उसे भी आज थोड़ा मान मिलेगा।
शाम को…
शादी की तारीख लगभग पक्की होने ही वाली थी।
सारा घर खुश था।
रीमा किचन में खड़ी चाय बना रही थी।
उसे लग रहा था आखिर मेहनत रंग लाई… अब सब ठीक होगा…
तभी काजल चुपचाप आती है और कहती है—
“भाभी… मैं ये शादी नहीं कर सकती।”
रीमा का हाथ काँप गया।
कप गिरते-गिरते बचा।
“क्…क्या?”
काजल की आंखें आँसुओं से भरी थीं—
“मैं किसी और को पसंद करती हूँ।
मम्मी-पापा को नहीं बता सकती…
उन्होंने इतने सपने देखे हैं।
पर मैं उस लड़के को छोड़ भी नहीं सकती।”
रीमा के पैरों तले जमीन खिसक गई।
उसकी हफ्तों की मेहनत, रात-रात जागना, हर छोटी-बड़ी तैयारी…
सब एक पल में धड़ाम से टूट गया।
काजल फिर बोली—
“बस… आप मम्मी को संभाल लेना, मैं अभी अमन से भी कह दूंगी।”
और बिना जवाब सुने चली गई।
रीमा वहीं कुर्सी पर बैठ गई...
दिल की धड़कन तेज।
आँखों से आंसू बहते रहे।
सास-ससुर की उम्मीद टूटी…
घर की पहली रस्म अधूरी रही…
और सारी जिम्मेदारी फिर रीमा के सिर।
उस रात रीमा ने बहुत सोचा—
“किसी की खुशी के लिए खुद को जलाते-जलाते
कब मेरी अपनी पहचान खो गई… पता ही नहीं चला…”
अगली सुबह...
रीमा सीधी सास के कमरे में गई।
आज पहली बार उसकी आवाज़ में डर नहीं था।
“मम्मी जी, मैं काजल का सच बताने आई हूँ।
शादी रुकवाना किसी की बेइज़्ज़ती नहीं…
गलत रिश्ते को निभाना सबसे बड़ी भूल होती है।”
सास चौंक गईं।
पर रीमा की आंखों की दृढ़ता देख समझ गईं कि आज ये बहू टूटकर नहीं, खड़ी होकर आई है।
कुछ मिनट की सन्नाटा…
फिर सास ने गहरी सांस लेकर कहा—
“तूने सही किया बहू…
हमने तुझ पर बहुत बोझ डाला…
पर तूने हर बार घर का मान रखा।
अब हम काजल का फैसला सुनेंगे।”
रीमा की आंखों में राहत के आँसू आ गए।
काजल की शादी टूटने की नौबत ही नहीं आई—
क्योंकि परिवार ने उसकी पसंद को समझ लिया।
रीमा पहली बार खुद को इस घर की बहू नहीं,
घर का हिस्सा महसूस कर रही थी।
पहली शादी की रस्म तो सच में अधूरी रह गई,
पर उसी दिन एक और रिश्ता पूरा हो गया—
रीमा और उसके ससुराल का।
सीख:
सच बोलना हमेशा आसान नहीं होता, लेकिन गलत रिश्ते को रोक लेना ही सही होता है।
बहू का दर्जा काम से नहीं, उसके चरित्र और हिम्मत से तय होता है।
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