बंद दरवाज़े की चीख
रीना अभी अठारह साल की थी। उम्र खेलने-कूदने की थी, सपने देखने की थी… लेकिन उसकी दुनिया इतनी आसान नहीं थी। माँ-बाप के गुजर जाने के बाद वो अपने मामा-मामी के साथ रहती थी।
उस दिन सुबह से ही घर में अजीब हलचल थी।
“रीना, जल्दी तैयार हो जा!” मामी ने कड़क आवाज़ में कहा।
“पर किसलिए मामी? आज तो कोई त्योहार भी नहीं है…”
“बहुत सवाल पूछती है! जो कहा है वो कर।”
मामी ने एक चमकदार लाल लहंगा उसकी ओर फेंक दिया।
रीना डर गई।
“मामी, ये… ये दुल्हन जैसे कपड़े क्यों?”
मामा गुस्से में बोले—
“क्योंकि आज तेरी शादी है। समझ में आया?”
रीना की साँसें अटक गईं।
“शादी? किससे? मैं अभी पढ़ना चाहती हूँ… इतनी छोटी उम्र में शादी?”
मामा दहाड़े—
“हम कोई तेरे लिए राजकुमार नहीं लाएंगे! शहर में एक बड़ा आदमी है—बहुत पैसा है उसके पास। तुझे रानी की तरह रखेगा!”
रीना रोने लगी—
“कौन आदमी?”
मामा ने एक गंदी हँसी हँसी—
“राघव सेठ। पचपन साल का है… लेकिन क्या फर्क पड़ता है? तुझसे तो शादी करेगा, वरना वो हमें एक पैसा भी नहीं देगा।”
रीना जमीन पर बैठकर रोने लगी—
“मामा, प्लीज मत कीजिए मेरी शादी… मैं आपकी सारी जिंदगी सेवा करूँगी… घर भी संभालूँगी… बस ये नहीं।”
मामी ने उसका बाल जोर से खींच लिया—
“ओय! बहुत रोना आता है तुझे? राघव सेठ ने हमें पचहत्तर हजार देने की बात की है। इतनी बड़ी रकम हमने कभी देखी भी नहीं!”
रीना ने डरकर मामा के पैर पकड़ लिए—
“आप मेरे रिश्तेदार हैं… आपको मेरी रक्षा करनी चाहिए… मुझे बेचना नहीं चाहिए…”
पर उनकी आंखों में पैसा चमक रहा था।
उस शाम जबरदस्ती रीना की शादी राघव सेठ से करवा दी गई।
शहर पहुँचते ही राघव सेठ की तीन मंज़िला कोठी देखकर रीना डर गई।
अंदर पहुंचते ही एक औरत सामने आई।
“मैं राघव की पहली पत्नी, सुजाता,” उसने ठंडी नजरों से कहा।
रीना घबराकर एक कदम पीछे हट गई।
“तो… फिर उन्होंने मुझसे शादी क्यों की?”
राघव सेठ हँस पड़ा—
“कौन सी शादी? वो तो नाटक था। बस तेरे रिश्तेदारों को पैसे देने के लिए ड्रामा किया। हमें घर में एक नौकरानी चाहिए थी। सुजाता को भी कोई चाहिए जो काम करे।”
रीना की आँखें भर आईं—
“और आपने मुझे दुल्हन की तरह लाकर… नौकर बना दिया?”
सुझाता बोली—
“सिर्फ नौकर नहीं। हमारी बात मानोगी तो ठीक। नहीं तो…”
वो चुप हो गई, पर उसकी आँखें सब कह रही थीं।
दिनभर काम—बर्तन, झाड़ू, पोछा, कपड़े, खाना…
और रात को सोने के लिए सिर्फ एक छोटा सा स्टोर रूम।
ग़लती की तो मार।
धीमी चली तो गालियाँ।
बात की तो खाना बंद।
एक दिन राघव सेठ ने कहा—
“अगर हमारे लिए एक बच्चा पैदा कर दे… तो ये कोठी हमारी हो जाएगी। और तू बस नौकर की तरह रहेगी।”
रीना डर के मारे कांप गई—
“आपकी पत्नी तो है… आप ऐसा कैसे सोच सकते हैं?”
सुझाता ने ताना मारा—
“बच्चा मेरा होगा, समझी? तू सिर्फ पैदा करेगी। लेकिन हक? वो मेरा है।”
रीना को हर दिन एक नया दुख मिलता।
फिर एक दिन उसे टीवी पर एक हेल्पलाइन नंबर दिखा।
महिलाओं की सुरक्षा का।
रीना ने चुपके से वो नंबर कागज पर लिख लिया।
एक रात राघव और उसकी पत्नी किसी पार्टी में गए।
रीना ने जल्दी से लैंडलाइन उठाया और नंबर मिलाया।
“नमस्ते, महिला सुरक्षा हेल्पलाइन।”
फोन पर एक शांत आवाज़ आई।
“मैं… रीना बोल रही हूँ… मुझे यहाँ जबरन नौकर बनाकर रखा गया है… मारते हैं… मुझे बेचा गया है… प्लीज मेरी मदद कीजिए…”
“घबराना मत,” आवाज बोली,
“मैं इंस्पेक्टर कविता सिंह बोल रही हूँ। कल सुबह हम पहुंच रहे हैं।”
रीना की आँखों में पहली बार उम्मीद चमकी।
अगले दिन...
दरवाज़े पर पुलिस की जीप रुकी।
राघव सेठ घबरा गया।
इंस्पेक्टर कविता ने कहा—
“हमें शिकायत मिली है कि यहां एक लड़की को बंद करके रखा गया है।”
सुझाता बोली—
“नहीं मैडम, हमारे यहाँ कोई लड़की नहीं है!”
“अच्छा? फिर ये कमरा खोलिए।”
उन्होंने स्टोर रूम का ताला तुड़वाया।
अंदर रीना पड़ी थी—हाथ बंधे, शरीर पर चोट के निशान, चेहरा सूजा हुआ।
इंस्पेक्टर गुस्से में थीं—
“शर्म नहीं आती आपको? ये बच्ची है… इंसान है!”
रीना रो पड़ी—
“मैडम, मुझे बचा लीजिए… मुझे यहाँ से ले जाइए…”
इंस्पेक्टर ने उसके कंधे पर हाथ रखा—
“अब कोई तुम्हें हाथ भी नहीं लगाएगा। तुम सुरक्षित हो।”
राघव और उसकी पत्नी को गिरफ्तार कर लिया गया।
इंस्पेक्टर कविता ने रीना से कहा—
“तुम्हें नारी निकेतन भेजा जाएगा। वहाँ पढ़ाई भी करोगी, नौकरी भी सीखोगी। तुम्हारी देखभाल होगी।”
रीना की आँखों में पहली बार सुकून था।
उसने धीरे से कहा—
“मैडम… आज पहली बार लगा कि मैं भी इंसान हूँ…”
इंस्पेक्टर मुस्कुराईं—
“तुम सिर्फ एक इंसान नहीं… तुम बेहद मजबूत लड़की हो। अब तुम्हारी जिंदगी सच में नई शुरुआत करने जा रही है।”
रीना ने आसमान की ओर देखा—
उसे लगा उसके माँ-बाप उसे आशीर्वाद दे रहे हैं।
आज रीना को अपनी आज़ादी, अपनी पहचान और अपनी ज़िंदगी वापस मिल गई थी।
संदेश:
“किसी भी लड़की की मजबूरी को उसका पाप नहीं बनाना चाहिए।
जबरदस्ती की शादी, अत्याचार और इंसान को बेच देना—यह सब अपराध है।
डरना नहीं चाहिए, अपनी आवाज़ उठानी चाहिए… क्योंकि अन्याय तभी रुकता है जब कोई उसके खिलाफ खड़ा होता है।”
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