नीलिमा – अधूरे सपनों की रोशनी

 

A hardworking Indian woman in a simple saree sits beside a sewing machine with a calm, emotional expression — symbol of strength and sacrifice.


नीलिमा आज सुबह से ही रसोई में लगी थी। गैस पर दूध चढ़ा हुआ था, वहीं दूसरी तरफ आलू उबल रहे थे। पीछे से सासू माँ की आवाज़ आयी —

“नीलिमा, जल्दी करना, पंडित जी आ गए हैं पूजा के लिए!”


“जी मम्मीजी!” — कहते हुए उसने अपने माथे से पसीना पोंछा और दूध उबलकर गिरने से बचा लिया।


घर का हर काम वही देखती थी — सब्ज़ी, झाड़ू, पोछा, बच्चों का स्कूल, ससुर का नाश्ता, पति की टिफिन।

कोई पूछे भी नहीं कि “नीलिमा, तुम थक जाती हो क्या?”


पर उसे आदत थी — जैसे जन्म से ही सबकी देखभाल करना उसका धर्म बन गया हो।



नीलिमा जब सिर्फ़ 10 साल की थी, तभी माँ का देहांत हो गया था।

पिता रिक्शा चलाते थे। घर में दो छोटे भाई-बहन थे।

नीलिमा ने माँ की जगह ले ली — स्कूल से आकर पहले सबको खाना खिलाना, फिर कपड़े धोना, और रात को टॉर्च की रोशनी में पढ़ाई करना।


शिक्षक हमेशा कहते — “नीलिमा, तुममें गजब की समझ है, तुम ज़रूर कुछ बनोगी।”


वो भी सपना देखती थी — शिक्षिका बनने का।

पर जब 12वीं के बाद पिता ने कहा —

“बिटिया, अब आगे पढ़ाई के पैसे नहीं हैं, तू घर संभाल ले,”

तो उसने चुपचाप अपने सपनों की कॉपी बंद कर दी।



बीस साल की होते ही नीलिमा की शादी गाँव के एक स्कूल मास्टर से कर दी गई।

सोचा था — अब जीवन थोड़ा सुकून में बीतेगा,

पर सास-ससुर और दो देवरों के बड़े परिवार में कदम रखते ही वो एक नई परीक्षा में उतर गई।


सुबह चार बजे उठना, चूल्हा जलाना, रसोई और कपड़े — यही उसका संसार था।

पति विनोद अच्छे थे, पर परिवार के दबाव में वो भी नीलिमा से ज़्यादा उम्मीदें रखते।


“तुम तो पढ़ी-लिखी हो नीलिमा, घर संभालना तो और अच्छे से आना चाहिए!”

ये सुनकर नीलिमा बस मुस्कुरा देती।



दो बच्चे हुए — प्रिया और मयंक।

विनोद की नौकरी सीमित थी, खर्च बढ़ते गए।

नीलिमा ने सिलाई मशीन ली और औरतों के कपड़े सीने लगी।

दिन में घर का काम, रात में सिलाई —

पर किसी ने तारीफ़ नहीं की, बस कहा — “नीलिमा को तो काम का शौक है।”


उसकी उंगलियाँ सुई से छिल जातीं, पर वो फिर भी मुस्कुराती।

कभी बच्चे पूछते —

“माँ, आप हमें कहानी सुनाओगी?”

वो कहती — “कहानी सुनाऊँगी, बस ये आखिरी कपड़ा खत्म कर लूँ।”


और फिर थककर थकी हुई आँखों से बच्चों को अपनी गोद में सुला देती।



एक दिन…

एक दिन प्रिया स्कूल से रोती हुई आयी।

“माँ, सब बच्चों के पास कलर पेंसिल हैं, मेरे पास नहीं…”

नीलिमा ने मुस्कुरा कर कहा —

“अरे मेरी बिटिया, तेरी माँ देगी न, कल ही!”


रात को उसने अपने पुराने दुपट्टे का काम करके जो तीस रुपए मिले थे, वही रखे पेंसिल के लिए।

खुद के लिए कुछ नहीं लिया — ये भी तो एक माँ का धर्म था, उसने सोचा।



सालों बाद…

बच्चे बड़े हो गए, सास-ससुर चले गए।

अब नीलिमा की उम्र 48 की हो चली थी।

बालों में सफेदी झाँकने लगी थी, पर चेहरा अब भी शांत था।

एक दिन स्कूल में टीचर्स की कमी थी, तो प्रिया (जो अब अध्यापिका थी) ने कहा —

“माँ, आज स्कूल चलो न! बच्चों को कविता सुनाना!”


पहले तो नीलिमा हँस पड़ी —

“अरे, अब मुझसे कौन सी पढ़ाई करवाएगा!”

पर जब स्कूल पहुँची, और बच्चों ने घेरा —

“नीलिमा आंटी, हमें कहानी सुनाओ!”

तो न जाने क्यों उसकी आँखें भर आईं।


वो वही सपना था — जो बरसों पहले उसने दबा दिया था।

आज भले देर से, पर उसने पूरा किया — बच्चों के बीच, किताबों के साथ, मुस्कुराते हुए।


रात को घर लौटकर उसने आसमान की ओर देखा —

 जैसे अपनी माँ वहीँ से उस पर मुस्कुरा रही हो।


वो सोचने लगी —

"ज़िंदगी ने मुझसे बहुत लिया, पर जो दिया, वो भी कम नहीं था।

मैं नीलिमा हूँ… सबकी रौशनी बनी, अब अपने अधूरे सपनों की भी बन जाऊँगी।"


संदेश:

हर “नीलिमा” को एक मौका चाहिए — 

खुद के लिए जीने का, अपने सपनों को छूने का। 

कभी देर मत करो, क्योंकि सपने उम्र नहीं देखते।


#MaaKiKahani #AdhureSapnoKiRoshni



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