माँ का मोबाइल
“माँ, अब ये बटन वाला फोन छोड़ो, स्मार्टफोन ले लो।”
रवि ने मुस्कुराते हुए माँ के हाथ में एक नया मोबाइल रखते हुए कहा।
“अरे बेटा, मैं क्या करूँगी इस टच-टच वाले फोन का… इसमें बटन भी नहीं हैं,”
माँ ने संकोच से कहा।
“माँ, बस थोड़ी प्रैक्टिस चाहिए… देखो, इसमें वीडियो कॉल भी हो जाती है।”
रवि ने धीरे से समझाया और मोबाइल में अपनी बहन रीमा का चेहरा दिखा दिया।
“अरे रीमा तू! इतनी साफ दिख रही है जैसे यहीं खड़ी हो…”
माँ की आँखें भर आईं।
“देखा माँ, अब तो रोज़-रोज़ बात कर पाओगी।” रवि हँसते हुए बोला।
दिन बीतते गए…
रवि ऑफिस की व्यस्तता में खो गया।
घर देर से आता, और अक्सर माँ से बस एक ही सवाल करता –
“खाना खा लिया ना माँ?”
और बिना जवाब सुने ही मोबाइल में लग जाता।
माँ रोज़ रीमा को वीडियो कॉल करती, बातें करती,
कभी बेटे की तारीफ़, कभी अपने दर्द…
धीरे-धीरे मोबाइल उसका साथी बन गया।
एक दिन माँ की तबियत कुछ खराब रहने लगी।
हल्का बुखार, कमजोरी और खाँसी।
रवि ने दवा दी, पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया।
उसे लगा, “माँ को तो हल्की-फुल्की तकलीफ़ रहती ही है।”
अगले दिन रवि मीटिंग में था, तभी मोबाइल पर रीमा का फोन आया —
“भइया, माँ ने मुझे कहा कि उन्हें बहुत चक्कर आ रहे हैं,
आप ज़रा देख लीजिए…”
रवि भागकर कमरे में पहुँचा —
माँ बिस्तर पर लेटी थीं, मोबाइल उनके पास रखा था,
जिसमें रीमा का वीडियो कॉल अब भी चालू था।
“माँ…” रवि ने घबराकर पुकारा।
माँ ने मुस्कुराने की कोशिश की —
“बेटा… मैं ठीक हूँ… बस थोड़ी थक गई हूँ…”
रवि ने डॉक्टर बुलाया, इलाज शुरू हुआ।
कुछ दिनों में माँ थोड़ा ठीक हुईं, पर अब बोलने में थक जातीं।
एक शाम रवि ऑफिस से लौटा, देखा माँ चुपचाप मोबाइल देख रही हैं।
स्क्रीन पर पुरानी तस्वीरें थीं —
रवि बचपन में माँ के गोद में,
रीमा के स्कूल के दिन,
और एक तस्वीर —
जिसमें रवि ने माँ के हाथ में पहला फोन दिया था।
“माँ, क्या देख रही हैं?”
“बस यादें… और वो दिन जब तुम मुझे ये फोन लाकर दिए थे…”
माँ ने धीमी आवाज़ में कहा।
“इसमें मैं तुम दोनों से जुड़ी रहती हूँ… बस यही मेरा सहारा है बेटा।”
रवि की आँखें भर आईं।
वो वही रवि था जो हर रात मोबाइल में बिज़ी रहता था,
पर आज उसे एहसास हुआ —
माँ के लिए यही मोबाइल जुड़ाव था,
और उसके लिए… दूरी का कारण।
कुछ महीनों बाद माँ की तबियत फिर बिगड़ी।
अस्पताल में भर्ती करनी पड़ी।
रवि दिन-रात वहीं था।
माँ के हाथ में अब भी वही फोन था।
“रवि…” माँ ने धीमे स्वर में कहा,
“अगर मैं ना रहूँ तो… रीमा को कहना कि…
उसके भेजे वीडियो मैं रोज़ देखती थी…
और तू… थोड़ा वक्त निकाल लिया कर…
माँ के लिए भी, खुद के लिए भी…”
रवि रो पड़ा।
“माँ ऐसा मत कहो… मैं अब हमेशा साथ रहूँगा…”
माँ ने मुस्कुराकर बेटे का हाथ थाम लिया —
“माँ का मोबाइल बंद हो जाए…
पर उसका प्यार कभी ऑफ़लाइन नहीं होता बेटा…”
रवि ने माँ की बात रखी।
आज भी उस फोन में कभी-कभी पुराने नोटिफिकेशन आते हैं —
“रीमा की वीडियो कॉल…”
“माँ का जन्मदिन याद रखें…”
रवि हर बार फोन को देखता है,
और मन ही मन कहता है —
“माँ, आप ऑनलाइन ना सही… मेरे दिल में हमेशा एक्टिव हैं।”
सीख:
समय बदलता है, तकनीक बढ़ती है,
पर रिश्तों की गर्मी सिर्फ स्पर्श और ध्यान से रहती है।
माँ-बाप सिर्फ कॉल नहीं चाहते —
वो वक़्त और अपनापन चाहते हैं।
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