सीधी-साधी बहू और अम्मा जी का झूठा मान

 

Young Indian daughter-in-law examining a new gas stove in her kitchen while her mother-in-law stands behind her angrily, creating a tense domestic scene.


दोपहर का समय था। रेखा बाजार से सब्ज़ी और थोड़े बहुत राशन लेकर जैसे ही घर पहुँची, उसने देखा कि अम्मा जी बैठक में बैठी मुँह फूलाकर ही उसका इंतज़ार कर रही हैं।

रेखा ने घर में पैर रखा ही था कि अम्मा जी का गरजता हुआ स्वर गूंज उठा—


“अरे, बड़ी मनमानी करने लगी है तू! किससे पूछकर गैस का स्टोव बदलवा लिया? हम सब बेकार बैठे हैं क्या? पैसा पेड़ पर थोड़े ही उगता है! पति की मेहनत की कमाई है—थोड़ा सोच-समझकर खर्च किया कर।”


रेखा चुप रही। उसे पता था, आज भी कुछ न कुछ सुनना ही है।

उसने थैले एक तरफ रखे, चुपचाप चप्पल उतारी और सीधे रसोई में चली गई। पानी गर्म करके चाय चढ़ा दी।


चाय बनते-बनते उसकी नजर गैस पर पड़े नए दो-बर्नर स्टोव पर गई।

यही तो वजह थी अम्मा जी के गुस्से की।

पर ये स्टोव उसने शौक में नहीं लिया था—पुराना तीन बार मरम्मत हो चुका था और अब खाना बनाते वक़्त आग भी उल्टी आने लगी थी।


चाय की भाप उठते-उठते रेखा को अपनी शादी का पहला दिन याद आ गया…



शादी का पहला दिन — टूटी उम्मीदें...


रेखा जब इस घर में दुल्हन बनकर आई थी, उसके माता-पिता ने उसे बहुत अच्छा दहेज दिया था—

नया फर्नीचर, बर्तन, मिक्सर, गद्दे, स्टोव, प्रेस, यहाँ तक कि सोने की चेन भी।


उसे लगा था, उसका सारा सामान उसके कमरे में सजा दिया जाएगा।

पर जब ननद उसे सुहागरात में कमरे तक लेकर गई, तो उसने देखा—


एक पुराना पलंग,

एक टेढ़ी-सी मेज,

और कोने में रखी दो जर्जर पेटियाँ।


रेखा ने सोचा—

“कोई बात नहीं, शायद कल तक अरेंज हो जाएगा…”


लेकिन कल कभी आया ही नहीं।

पगफेरे से लौटने पर भी उसका नया सामान खोला नहीं गया था।


तीन दिन बाद रेखा ने हिम्मत कर पति विनय से पूछा—

“सुनिए, मेरे माता-पिता ने जो फर्नीचर और बाकी चीजें दी हैं… वो कमरे में कब आएंगी? सब सामान बिखरा पड़ा है…”


विनय कुछ बोलता इससे पहले ही अम्मा जी कमरे में आ धमकीं—


“बहू! बात ये है कि अगले महीने गुड़िया (ननद) की शादी है।

तेरी शादी में जो इतना दहेज आया है—उसी में से थोड़ा बहुत सामान गुड़िया को दे देंगे।

बेटा दो-दो शादी कर रहा है, खर्चा कहाँ से आएगा?”


रेखा ने विनय की तरफ देखा।

विनय ने धीरे से कहा—

“अम्मा, बहू का सामान उसी के लिए रहने दें। गुड़िया के लिए कम ले लेंगे।”


अम्मा जी भड़क गईं—

“अरे! बेटी को कम दहेज देकर विदा करूँ? समाज क्या कहेगा?

बहू का सामान तो घर का ही है, वही दे देंगे!”


बहस बढ़ती गई।

रेखा को बुरा तो लगा, पर उसने खुद ही बोल दिया—

“कोई बात नहीं अम्मा जी। दे दीजिए। मैं मैनेज कर लूंगी।”


बस…

यही गलती थी।


अगले महीने ननद की शादी में रेखा के हिस्से का लगभग सारा सामान दे दिया गया।

और रेखा के कमरे में ठूंस दी गईं वे दो पुरानी पेटियाँ।



दो साल बाद… वही कहानी दोहराई गई...


दो साल बीत गए।

ना अलमारी आई,

ना फर्नीचर,

ना नया स्टोव,

ना बर्तन।


रेखा ने कई बार विनय से कहा—

“एक अलमारी तो ले लेते। कपड़े तक नहीं समाते।”

विनय भी बेबस—

“अम्मा को मंजूर नहीं।”


आखिर इस बार रेखा ने सारा धैर्य छोड़ दिया।

वह खुद जाकर स्टील का नया स्टोव खरीद लाई।

भले ही पैसे विनय ने ही दिए थे, पर उसे पता था—

अगर घर में बताएगी, तो फिर वही हंगामा होगा।



अब चाय का समय — और शुरू फिर बहस..


जब रेखा चाय लेकर बाहर आई, अम्मा जी तो जैसे गुस्से से कांप रही थीं।


“बहू! किससे पूछकर स्टोव खरीद लिया? जवाब दे!”


रेखा शांत थी—

मानो इस लहर को पहले ही महसूस कर चुकी हो।


चाय थमाई और बोली—

“अम्मा जी, पुराना स्टोव खराब हो गया था। आग उल्टी आ रही थी, खतरा था। इसलिए बदल दिया।”


“हाँ! बहुत खतरा था! और पैसे उड़ाने की भी बहुत जल्दी थी!

दो साल से तो चल रहा था, आज क्या हो गया था?”


रेखा अब मुस्कुराई—

“दो साल से ही तो खतरा था।

हर बार कहती थी, पर आप मना कर देती थीं।

इस बार फैसला कर लिया कि अपनी सुरक्षा खुद करनी होगी।”


अम्मा जी तमतमा गईं।

“बहू! मेरे बेटे की कमाई है ये!

ऐसे ही उड़ा देगी तो घर कैसे चलेगा?”


रेखा अब चुप नहीं रही।




“अम्मा जी,

जब मेरी शादी में मेरा दहेज आपने गुड़िया दीदी को दे दिया,

तब क्यों नहीं सोचा कि वो भी मेरे पिता की कमाई थी?


उन्होंने अपनी बेटी के लिए खरीदा था।

उसे उठाकर आपने अपनी बेटी को दे दिया—

ताकि सामने वालों के सामने शान दिख सके।”


अम्मा जी अवाक् रह गईं।


रेखा ने आगे कहा—

“और आप कहती हैं कि मेरे पति की कमाई है?

तो क्या मैं उसके जीवन का हिस्सा नहीं हूँ?

क्या मुझे अपने ही घर में अपनी जरूरत की चीजें लेने का हक नहीं है?


दिन-भर रसोई में खड़े होकर मैं भी मेहनत करती हूँ।

पुराने स्टोव पर हाथ जलते रहे,

गरम हवा से चेहरा झुलसता रहा—

पर आपने कभी नहीं पूछा कि बहू, नया स्टोव ले आएं?


आज खुद लिया है तो आपको बुरा लग रहा है।”


अम्मा जी का चेहरा उतर गया।

वे कुछ बोलना चाहती थीं, पर शब्द नहीं निकल रहे थे।




रेखा आगे बोली—

“अम्मा जी,

इतने सालों तक मैंने आपकी हर बात मानी।

आपके घर को अपना घर समझकर काम किया।

पर हर बार आपने मेरी जरूरतों को पीछे रखा।


आज मैंने पहली बार अपने लिए कुछ लिया है—

और वो भी सिर्फ सुरक्षा के लिए।

अगर यह गलती है,

तो मैं यह गलती फिर भी करूँगी।”


रेखा के शब्दों में इतनी सच्चाई थी कि अम्मा जी को पहली बार महसूस हुआ

कि बहू चुप रहने वाली नहीं रही।


और रही बात विनय को बताने की—

उसे भी पता है कि पुराना स्टोव कितना खतरनाक था।

वह भी रेखा का ही साथ देगा।


अम्मा जी धीरे से उठीं,

बड़बड़ाती हुई कमरे से बाहर चली गईं।

उन्हें समझ आ चुका था—


जिस बहू ने इतने साल चुप रहकर सब सहा,

आज जब बोली है,

तो सच ही बोला है—

और कड़वा भी।


उस दिन के बाद घर में बहू के फैसलों 

में दखल थोड़ा कम हो गया।

और रेखा ने महसूस किया—

कभी-कभी एक बार अपनी ज़रूरतों के लिए आवाज़ उठानी ही पड़ती है,

वरना लोग समझते हैं कि बहू के मन, दर्द और हक़ की कोई कीमत ही नहीं।


#SilentBahuSpeaks #TruthBehindClosedDoors


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