जो लौटना था… लौट आया

 

A blind Indian army soldier in uniform reunites emotionally with his wife dressed in a pink lehenga, both holding hands with tears of joy in a beautifully decorated outdoor ceremony.


बारिश की हल्की फुहारें आँगन में रखे नीम के पेड़ पर गिर रही थीं। घर के बरामदे में रखी हवन-धूप की खुशबू पूरे वातावरण में शांति घोल रही थी।


सुबह की हल्की बारिश के बीच सुजाता किचन में उतर आई थी। गैस पर रखी चाय की केतली धीरे-धीरे उबलकर अपनी सुगंध पूरे कमरे में घोलने लगी थी। तभी अन्दर से दादी की तीखी आवाज आई—


“सुजाता! बस चाय-प्रार्थना ही रह गई है… घर-बाहर किसी की फिक्र है भी कि नहीं?”


सुजाता ने रुक कर गहरी सांस ली।

“जी दादी, बस दो मिनट,” उसने धीरे से कहा।


गुलाबी सलवार-कमीज, माथे पर छोटी सी बिंदी और कलाई में रंग-बिरंगी चूड़ियाँ—सुजाता में एक नई दुल्हन-सी सादगी और गरिमा थी।


दादी के कमरे में चाय रखकर जैसे ही वह मुड़ी, दादी बुदबुदाईं—

“पति का कुछ पता नहीं, ज़िंदा है या नहीं… और ये सज-संवर कर घूमती रहती है!”


सुजाता ने सुनकर भी अनसुना कर दिया। हर सुबह वही बातें। वही ताने।



पति की प्रतीक्षा में बीतते 4 साल...


सुजाता की शादी अरुण से हुई थी—एक शांत, गंभीर और बेहद विनम्र लड़का। शादी के सिर्फ 12 दिन बाद ही उसे सेना की एक खुफिया यूनिट में वापस बुला लिया गया था।


उस दिन सुजाता ने उसके बैग में चुपके से एक छोटी-सी तस्वीर रखी थी—दोनों की मुस्कराती हुई।

अरुण ने जाते-जाते कहा था—


“अगर देर हो जाए तो घबराना नहीं, मैं लौटूंगा… ज़रूर लौटूंगा।”


लेकिन वो नहीं लौटा।

4 साल बीत चुके थे।


सेना की ओर से उसे लापता घोषित कर दिया गया था।


यह खबर सुजाता की सास सरोज जी को इतनी गहरी लगी कि वे लगभग बिस्तर पर ही पड़ गईं। डॉक्टरों ने साफ कहा था—

“उन्हें अरुण की खबर ही जिंदा रख सकती है।”


घर की सारी ज़िम्मेदारी सुजाता के कंधों पर आ गई—

सास की देखभाल, दादी की सेवा, घर का काम, और साथ ही अपना छोटा-सा टिफिन-सर्विस का बिज़नेस।


पर दादी को उसका हर काम गलत लगता था।



एक दिन शाम को कर्नल भोला सिंह—सुजाता के ससुर—किसी बात को लेकर बहुत गंभीर दिख रहे थे।


सुजाता ने पूछा भी—

“पापा, कुछ परेशान हैं?”


उन्होंने बस मुस्कुरा कर कहा—

“नहीं बेटा, सब ठीक।”


पर मन में वे एक भारी फैसला कर चुके थे।


अगले दिन वे सुजाता के माता-पिता के घर पहुँचे।

दोनों घबरा गए—

“भाई साहब, सब ठीक है न?”


कर्नल साहब बोले—

“मैं सुजाता के लिए दूसरा रिश्ता सोच रहा हूँ… इतने साल हो गए, अरुण की कोई खबर नहीं। वह पूरी उम्र यूँ इंतजार में क्यों जिए?”


सुजाता की माँ रो पड़ीं, पर कर्नल साहब अडिग थे।

वे बोले—

“मैं चाहता हूँ सुजाता फिर से हँसे, जीए… अपने लिए भी जिए।”



शाम को सुजाता चाय लेकर उनके कमरे में गई।

कर्नल साहब बोले—


“बेटा, तूने हमारा इतने साल साथ निभाया। पर अब तुम्हें बाँध कर नहीं रख सकता। अरुण की कुछ खबर नहीं आएगी…”


सुजाता के हाथ काँप गए।

“पापा… ऐसा न कहिए। वो जरूर आएंगे… उन्होंने वादा किया था कि वो लौटकर आएंगे।”

कर्नल साहब ने उसका हाथ पकड़ा—

“उसने तुझे जीना सिखाया था, इंतज़ार में जलना नहीं।”


सुजाता फूट-फूटकर रो पड़ी और कमरे से निकल गई।




नया रिश्ता—राजी… या मजबूरी?...


कर्नल साहब ने अपनी पुरानी रेजिमेंट के साथी मेजर सुधीर के बेटे अमन का रिश्ता सुजाता के लिए तय कर दिया—


अमन आईटी इंजीनियर था, पढ़ा-लिखा, समझदार।

उसकी पहली पत्नी का कुछ साल पहले निधन हो गया था।


अमन ने सुजाता की तस्वीर देखी तो बोला—

“अगर वह तैयार हो तो मुझे कोई आपत्ति नहीं।”


सुजाता ने विरोध नहीं किया…

पर सहमति भी नहीं दी।

बस चुप रही।


कर्नल साहब ने इस चुप्पी को “हाँ” समझ लिया।



शादी का दिन… 


घर को हल्दी, गेंदे और रोशनी से सजाया गया था।

मेहमान आने लगे।

मंडप तैयार था।


सुजाता की माँ उसे लेने कमरे में आईं।

सफेद दुपट्टे पर हल्का गुलाबी लहंगा… बेहद सुंदर लग रही थी वह।


पर उसके कदम भारी थे।


अचानक सुजाता अपनी माँ के गले लगकर रो पड़ी—

“माँ… मेरा मन नहीं मान रहा… मुझे लग रहा है अरुण कहीं पास है… सांस नहीं ले पा रही… मैं किसी और की हो ही नहीं सकती…”


और वह बेहोश होकर गिर पड़ी।


माँ पानी लेकर बाहर निकलीं, वही समय था जब—



फौज की जीप घर के बाहर रुकी...


दो फौजी उतरे।

फिर उन्होंने सहारा देकर एक जवान को नीचे उतारा—

चेहरे पर काला चश्मा…

कदम धीमे…

कंधे ज़रा झुके हुए…


कर्नल भोला सिंह के हाथ कांपने लगे।

आँखें नम हो गईं।


वे चिल्लाए—


“अरुण! मेरा बच्चा… तू लौट आया!”


मेहमानों की सांसे रुक गईं।

पूरा माहौल रोने और खुशी के शोर से भर गया।



सुजाता को होश आया...


माँ ने उसे हिलाया—

“उठ बेटी… बाहर देख! …तेरा अरुण आ गया!”


सुजाता भागती हुई बाहर आई।

दुपट्टा गिरता गया, पैर लड़खड़ाते रहे…

पर वो दौड़ी—


और जाकर अरुण से लिपट गई।


“मैं जानती थी… आप आएंगे… आप ज़रूर आएंगे…”


अरुण के चश्मे के पीछे छिपी आँखें नम थीं।



अरुण का दर्द..


वह बोला—

“सुजाता… मैं लौट तो आया… पर पूरा नहीं। युद्ध में मेरी आँखें चली गईं। मैं अंधा हो चुका हूँ। अब मैं तुम्हारा सहारा कैसे बनूँ?”


सुजाता ने उसकी हथेलियाँ पकड़ लीं—


“हमें सहारे की नहीं, साथ की जरूरत है। आप हैं… बस यही मेरे जीवन की सबसे बड़ी रोशनी है।”



अमन का महान निर्णय...


काफ़ी देर से दूर खड़ा अमन यह दृश्य देख रहा था।

वह आगे बढ़ा, और चुपचाप अरुण का हाथ उठाकर सुजाता के हाथ में दे दिया।


“सच्चे प्यार की जगह कोई नहीं ले सकता। आप दोनों का रिश्ता ऊपर से लिखा गया है।”


कर्नल भोला सिंह की आँखें भर आईं।


अमन मुस्कुराकर बोला—

“अगर दो लोग एक-दूसरे की प्रतीक्षा में टूटते नहीं, टिके रहते हैं… तो उन्हें अलग नहीं होना चाहिए।”




सुजाता ने अरुण को गले लगाते हुए कहा—

“अब आप कहीं नहीं जाएंगे। मैं आपकी आँखें भी बनूँगी… और आपका साथ भी।”


दादी ने भी रोते हुए दोनों को आशीर्वाद दिया।

सास सरोज जी के कमरे में जैसे नई रोशनी फैल गई।

उनकी उंगलियाँ हल्के से हिलीं—

अरुण की आवाज पहचानते हुए।


घर फिर से हँसी, रोशनी और जीवन से भर गया।




सीख:

सच्चा प्यार रास्ता भटक सकता है, देर हो सकती है…

पर लौटता ज़रूर है—

अगर दोनों तरफ विश्वास जिंदा हो।

#SoldierReturns #TrueLoveStory


No comments

Note: Only a member of this blog may post a comment.

Powered by Blogger.