बेटी की चिट्ठी
सुबह के साढ़े छह बजे का समय था।
वर्मा जी हाथ में दूध का बर्तन लिए बाहर खड़े थे और दरवाज़ा खटखटा रहे थे।
“अंजलि! दरवाज़ा खोलो बेटा… दूध गिर जायेगा…”
लेकिन अंदर से कोई आवाज़ नहीं आई।
उन्होंने सोचा—शायद बेटी अभी सो रही है।
धीरे से मुस्कुराते हुए बोले—
“आज फिर देर तक सो रही है… कल भी रात भर पढ़ती रही थी शायद…”
वर्मा जी का मन गुदगुदा उठा।
उन्हें अपनी बेटी अंजलि पर बड़ा गर्व था।
माँ की मृत्यु के बाद उसने घर संभाला, पापा का ख्याल रखा, पढ़ाई भी की, और नौकरी की कोशिश भी।
कुछ देर बाद जब दरवाज़ा नहीं खुला तो वर्मा जी चिंतित हो गए।
उन्होंने पीछे के कमरे में झाँका।
बिस्तर खाली था।
“कहीं वो बिना बताए बाहर तो नहीं गई?”
मन में अनजाना डर उठा।
अचानक उनकी नज़र खाने की मेज पर रखे सफेद लिफाफे पर पड़ी।
लिखा था —
“पापा के लिए”
हाथ काँपते हुए उन्होंने लिफाफा खोला।
चिट्ठी शुरू होती है…
“पापा,
मुझे पता है, यह पढ़ते समय आपका दिल धड़क रहा होगा।
लेकिन घबराइए मत… मैं ठीक हूँ।”
वर्मा जी की आँखें नम हो गईं।
“पापा, आज मैं इंटरव्यू देने शहर से बाहर जा रही हूँ।
आपको इसलिए नहीं बताया—क्योंकि आप मना कर देते।
आप कहते—‘अंजलि, इतनी दूर अकेले कैसे जाएगी?’
पापा, अगर मैं आज डर गई… तो हमेशा डरती रहूँगी।”
लिखावट काँपती हुई थी, जैसे अंजलि खुद भी लिखते हुए रो पड़ी हो।
उसी समय…
दरवाज़े पर किसी ने दस्तक दी।
वर्मा जी हड़बड़ाकर बाहर आए।
देखा—अंजलि की बुआ, सीमा जी खड़ी थीं।
“भाई, अंजलि कहाँ है? मैंने उसे रास्ते में बस स्टैंड के पास देखा था… रो रही थी!”
वर्मा जी का दिल धक से रह गया।
“क्या! वो… अकेली?? बस स्टैंड पर?? क्यों? कहाँ जा रही थी?”
बुआ ने कहा—
“शायद किसी इंटरव्यू के लिए… उसके हाथ में फाइल थी।”
वर्मा जी को लगा पाँव जमीन में धँस गए।
वो कुर्सी पर बैठ गए।
“सीमा… मैंने अपनी बेटी को इस डर में बाँध दिया कि वो उड़ ही नहीं सकी…
मैंने उसे घर सँभालने को कहा… पर उसे खुद को जीने का मौका ही नहीं दिया।”
उनकी आवाज काँप रही थी।
बुआ ने कहा…
“भाई, बेटी को रोकना नहीं…
जिस दिन वो अपनी उड़ान खुद चुनेगी, उसी दिन तुम्हारी मेहनत सफल होगी।”
वर्मा जी चुप।
उधर दूसरी तरफ — बस में बैठी अंजलि
वो खिड़की के बाहर देख रही थी।
बार-बार पापा का चेहरा आँखों में आ रहा था।
उसकी उंगलियाँ काँप रही थीं।
अचानक फोन बजा।
स्क्रीन पर — “पापा Calling…”
दिल जोर से धड़कने लगा।
उसने डरते डरते कॉल उठाया—
“हेलो… पापा…”
कुछ सेकंड तक सिर्फ खामोशी…
फिर पापा बोले—
“बेटा… जा। इंटरव्यू दे।
लेकिन एक बात याद रखना—
डर से भागने के लिए घर मत छोड़ना…
अपने सपने पूरे करने के लिए घर छोड़ना।”
अंजलि की आँखें भर आईं।
पापा आगे बोले—
“मुझे तुझ पर भरोसा है।”
बस की सीट पर बैठे-बैठे अंजलि रो पड़ी।
उसने खिड़की से बाहर हवा को छुआ, मानो पापा का हाथ पकड़ लिया हो।
3 घंटे बाद — इंटरव्यू हॉल...
अंजलि ने आत्मविश्वास के साथ इंटरव्यू दिया।
उसकी आवाज़ पहले की तरह डरपोक नहीं…
मजबूत थी।
उसे खुद पर हैरानी हो रही थी कि वो इतना अच्छा बोल कैसे पाई।
इंटरव्यू खत्म होते ही मोबाइल फिर बजा—
“पापा”
“कैसा हुआ बेटा?”
“बहुत अच्छा हुआ पापा… शायद मुझे जॉब मिल जाए!”
“शाबाश मेरी बच्ची। मैं यहीं हूँ… बस स्टैंड के बाहर।
आते-आते फोन करना।”
अंजलि फूटी आवाज़ में बोली—
“पापा, आप नाराज़ नहीं?”
“नाराज़?
अरे पगली…
“बेटियाँ घर छोड़ती हैं तो बिखरने नहीं…
बल्कि अपने पंख मजबूत करने के लिए।”
अंजलि वहीं रुक गई…
रो पड़ी।
3 दिन बाद...
एक ईमेल आया —
“Congratulations! You are selected!”
अंजलि खुशी से चिल्लाते हुए पापा के गले लग गई।
वर्मा जी ने उसके सिर पर हाथ रखकर कहा—
“तू जहाँ काम करेगी, वहीं मैं भी रह लूँगा।
बेटी जहाँ खड़ी होती है, पिता की दुनिया वहीं बसती है।”
अंजलि ने मुस्कुराकर कहा—
“नहीं पापा…
इस बार मैं आपको साथ नहीं…
अपने मेहनत के दम पर खुद बुलाऊँगी।”
पापा ने गर्व से उसे देखा…
सीख:
हर पिता सिर्फ बेटी का हाथ नहीं थामते,
वो उसके सपनों को भी सहारा देते हैं ताकि वे टूट न जाएँ।
और जब बेटी खुद पर विश्वास कर लेती है,
तो राहें उसके कदमों से पहले ही तैयार हो जाती हैं।
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