सूखे पौधे में भी फूल खिलते हैं

 

आँगन में पौधों को पानी देती एक भारतीय बहू, चेहरे पर हल्की मुस्कान और शांत वातावरण।


सुबह के आठ बज रहे थे।

घर के छोटे से आँगन में धूप फैल रही थी। अनामिका चौके में खड़ी नाश्ता तैयार कर रही थी। गैस जलते ही खिचड़ी की खुशबू पूरे घर में फैल गई। तभी पीछे से धीरे-धीरे चलती हुई कावेरी बुआ आ पहुँचीं—


“बहू, आज तो मेरी तबीयत भारी है… ज़रा हल्की-फुल्की चीज़ बना देना।”


अनामिका ने तुरंत कहा—

“जी बुआजी, अभी बनाती हूँ।”


कावेरी बुआ चली गईं, पर उनके जाते ही अनामिका ने गहरी सांस ली—


“इस घर में हर दिन किसी न किसी की अलग ही फरमाइश होती है… मेरी पसंद पूछने वाला कोई नहीं।”


उसी समय ससुरजी श्यामलाल जी अंदर आए।

उन्होंने देखा कि अनामिका दो-दो बर्तन में खिचड़ी बना रही है।


“बहू, परेशान क्यों हो रही हो? सबके लिए एक ही खिचड़ी बना दो।


कावेरी को भी आखिर वही खाना है जो घर में बनेगा।”


अनामिका हल्का सा मुस्कुरा दी।

उसे लगा—कम से कम कोई तो उसके काम की कद्र करता है।




दोपहर...

दो बजे अचानक दरवाज़ा खुला।

अनामिका की ननद मृदुला अपने दो बच्चों के साथ आ गई।


“लो भई, हम आ गए!”


बच्चे अंदर जाते ही घर में हलचल बढ़ गई।

मृदुला ने रसोई में झाँका—


“ओह अनामिका, आज भी वही खिचड़ी? अरे इतने बच्चे हैं, थोड़ा चटपटा बना लिया करो!”


अनामिका धीमे स्वर में बोली—

“जी दीदी… आज सबकी तबीयत थोड़ी ढीली है इसलिए ये बना रही हूँ।”


मृदुला हँसकर बोली—

“तुम्हारी मुसीबतें कभी खत्म ही नहीं होती लगता है। बहू होना मतलब बस किचन में घुल जाना?”


ये सुनकर अनामिका के हाथ रुक गए।

दिल में चुभन हुई, पर चेहरे पर मुस्कान ही रखी।



शाम को...

घर के अंदर सब बातें कर रहे थे।

अनामिका चाय लेकर आयी।

मृदुला ने एक घूँट लेते ही कहा—


“ओह हो! चीनी कम है… तुम कभी परफेक्ट चाय नहीं बना पाती न?”


इस बार कावेरी बुआ बोल पड़ीं—


“अरे खुद बनाकर देखो न, तब पता चलेगा!

बहू तो रोज़ ज़ोर लगाती है।”


मृदुला को थोड़ी शर्म आई, उसने नज़रें फेर लीं।

अनामिका ने कुछ नहीं कहा, पर उसके मन का भार और गहरा होता गया।



रात को..

सब सो चुके थे, बस अनामिका अभी कपड़े तह कर रही थी।

पति आरव आया और बोला—


“तुम बहुत थकी लग रही हो… सब ठीक है?”


अनामिका ने पहली बार बिना छुपाए कहा—


“आरव, मैं दिन भर सबका ध्यान रखती हूँ, पर मेरी भावनाओं का ध्यान रखने वाला कोई नहीं।

मैं थकती नहीं, पर टूटती हूँ… ये किसी को नहीं दिखता।”


आरव ने उसे हल्का-सा गले लगाया—


“सॉरी अनामिका… मुझे ये सब समझ नहीं आता था।

कल से मैं सब संभालूँगा।”


अनामिका की आँखें भर आईं—


“मैं चाहती हूँ कोई मेरे मन को भी समझे… सिर्फ काम को नहीं।”




अगला दिन… 

सुबह सब नाश्ते के लिए बैठे थे।

आज अनामिका ने सिर्फ एक ही तरह का नाश्ता बनाया—जैसा उसे ठीक लगा।


मृदुला बोली—

“अरे अनामिका, आज मेरी पसंद का नहीं बनाया?”


आरव बीच में ही बोल पड़ा—

“दीदी, आज हम सब वही खाएँगे जो अनामिका ने बनाया है।

हमेशा घर की पसंद बदलते-बदलते उसकी पसंद खो जाती है।”


घर में पहली बार अनामिका को किसी ने खुलकर सपोर्ट किया।


कावेरी बुआ ने भी कहा—

“बहू इतना करती है, उससे ज़्यादा क्या चाहिए?

हम बड़े लोग जितना बोलते हैं, वो चुपचाप सहती रहती है।”


मृदुला थोड़ा झेंप गई।

उसने कहा—


“अनामिका, मैंने कल जो भी बोला… वो गलत था।

तुम्हारी मेहनत हम सब तक पहुँचती है, पर हम मानते नहीं।”


अनामिका की आँखें भर आईं।

इतने बरसों में उसने पहली बार खुद को सुना हुआ महसूस किया।



उस शाम अनामिका आँगन में पौधों को पानी दे रही थी।

मृदुला आकर बोली—


“अनामिका, ये पौधा तो बिल्कुल सूख गया था… आज देखो, फिर हरा हो गया।”


अनामिका मुस्कुराई—


“बुआजी रोज़ पानी डालती थीं… थोड़ा ध्यान, थोड़ा प्यार… पौधे में भी जान आ जाती है।”


मृदुला ने धीरे से कहा—


“शायद रिश्ते भी ऐसे ही होते हैं।

अगर समय पर प्यार मिल जाए, तो सूखे रिश्ते भी फिर से खिल जाते हैं।”


अनामिका ने उनकी ओर देखा।

आज उनके चेहरे पर ना ताना था, ना मज़ाक—बस समझ।


घर में पहली बार अनामिका को लगा—

पौधे ही नहीं, लोग भी बदलते हैं…

अगर उन्हें बदलने का मौका दिया जाए।



कहानी का संदेश:


छोटी-छोटी बातों में ताना मारना आसान है,

लेकिन किसी के दिल को समझना मुश्किल।

और यही “समझ”—

रिश्तों को हरा-भरा रखने की असली खाद होती है।


#RishteDilSeNibhaye #ChotiBatonKaBadaAsar



No comments

Note: Only a member of this blog may post a comment.

Powered by Blogger.