अनकहा रिश्ता
दिल्ली से प्रयागराज जाने वाली रात की ट्रेन थी।
गाड़ी में भीड़ बहुत थी। हर बर्थ पर लोग किसी न किसी तरह समाए हुए थे।
आरव, जो एक निजी कंपनी में इंजीनियर था, किसी तरह अपनी सीट पर बैठा ही था कि उसकी नजर सामने वाले कोने पर गई —
वहाँ बैठी थी नैना।
उसे देख कर आरव के दिल की धड़कन थम सी गई।
वो वही थी — उसकी मंगेतर, जिससे शादी से ठीक दो दिन पहले रिश्ता टूट गया था।
तीन साल बीत चुके थे उस बात को।
नैना सादा सलवार-कमीज़ में थी, बाल बंधे हुए, चेहरे पर थकान, लेकिन आँखों में वही गहराई, वही शांति थी।
आरव ने अनजाने में नजरें हटा लीं, पर मन वहीं अटका रहा।
ट्रेन धीरे-धीरे चली। नैना ने जैसे ही ऊपर की तरफ देखा, उसकी नजर भी आरव पर पड़ी।
दोनों की आँखें मिलीं — एक पल के लिए समय थम गया।
फिर नैना ने धीरे से सिर झुका लिया।
आरव खुद को रोक नहीं सका। वह उठा, और नैना के पास वाली सीट पर जा बैठा।
थोड़ी झिझक के बाद उसने कहा,
“नैना... कैसी हो?”
नैना ने धीरे से कहा,
“ठीक हूं... और आप?”
“मैं भी ठीक हूं,” आरव बोला।
थोड़ी चुप्पी के बाद उसने पूछा, “कहाँ जा रही हो?”
“इलाहाबाद... माँ को देखने। तबियत खराब है।”
आरव ने सिर हिलाया। “मैं भी वहीं जा रहा हूँ, साइट विजिट है।”
दोनों के बीच फिर वही खामोशी छा गई —
वो खामोशी जिसमें कभी बातें होती थीं, अब सिर्फ यादें थीं।
कुछ देर बाद नैना ने खिड़की से बाहर देखा।
रात के अंधेरे में भागते पेड़, जैसे बीते सालों को अपने साथ ले जा रहे हों।
आरव ने हिम्मत जुटाई,
“नैना, एक बात पूछूं?”
नैना ने बिना उसकी तरफ देखे कहा, “पूछो।”
“तुमने शादी क्यों नहीं की?”
नैना मुस्कुराई — हल्की, लेकिन दर्दभरी मुस्कान।
“हर किसी के हिस्से में एक ही रिश्ता लिखा होता है, आरव।
कुछ के लिए वो शुरू होता है, कुछ के लिए बस अधूरा रह जाता है।”
आरव ने गहरी सांस ली,
“शायद गलती मेरी थी... नहीं, पक्की मेरी ही थी।
पापा के दबाव में मैंने रिश्ता तोड़ दिया, पर आज सोचता हूँ —
अगर हिम्मत की होती तो तुम मेरी होती।”
नैना की आँखों में नमी थी।
“अब पछताने से क्या होगा, आरव? ज़िंदगी तो आगे बढ़ गई।”
आरव ने धीमे से कहा,
“ज़िंदगी नहीं बढ़ी... बस दिन बीतते रहे।”
थोड़ी देर बाद एक चायवाला आया।
आरव ने पूछा, “चाय लोगी?”
नैना ने सिर हिलाया, “हाँ।”
दोनों ने एक कप चाय ली — जैसे पुराने दिनों की कोई छोटी सी याद लौट आई हो।
आरव बोला, “अब क्या करती हो?”
“एक एनजीओ में पढ़ाती हूँ, बच्चों के साथ काम करती हूँ,” नैना ने बताया।
“खुश हो?”
“खुशी अब सवाल नहीं, आदत बन गई है,” उसने कहा।
ट्रेन एक छोटे स्टेशन पर रुकी। नैना उतरकर पानी लेने गई।
आरव ने खिड़की से देखा — वो पहले जैसी ही थी,
बस थोड़ी बदलि हुई, थोड़ी और गहरी लगने लगी थी।
नैना लौटी तो आरव बोला,
“कभी सोचा नहीं था यूँ मिलेंगे।”
“हाँ,” नैना ने मुस्कुरा कर कहा, “पर ज़िंदगी को हमसे बेहतर कहानी लिखना जानती है।”
थोड़ी देर बाद ट्रेन के डिब्बे की लाइटें मंद पड़ गईं।
चारों तरफ लोग सो रहे थे।
आरव ने धीरे से कहा,
“नैना... अगर एक बार फिर मौका मिले, तो क्या तुम साथ चलोगी?”
नैना ने चौंककर देखा,
“आरव...”
“मैंने सब कुछ खो दिया, बस तुम्हें खोना सबसे बड़ा दर्द है। अब कोई नहीं रोक सकता मुझे — न पापा, न समाज।”
नैना की आँखों में आँसू छलक आए।
“मैंने भी कभी शादी नहीं की,” उसने धीमे से कहा।
“हर बार लगा, अगर कर ली, तो तुम्हारे साथ बेईमानी होगी।”
ट्रेन प्रयागराज पहुँचने वाली थी।
स्टेशन की रोशनी अंदर आई तो दोनों की आँखें चमक उठीं।
नैना ने बैग उठाया।
आरव ने कहा,
“रुको... कल मिलोगी?”
नैना बोली,
“अगर किस्मत ने चाहा, तो ज़रूर।”
अगले दिन, आरव जब एनजीओ के बाहर पहुँचा,
वहाँ नैना बच्चों को पढ़ा रही थी।
उसे देखकर नैना चुप हो गई।
आरव ने बच्चों से कहा,
“आज छुट्टी है... मैडम का एक पुराना दोस्त आया है।”
नैना हँस पड़ी।
आरव बोला,
“मैं कल जो अधूरा सवाल था, उसका जवाब लेकर आया हूँ —
अब साथ चलोगी?”
नैना ने कुछ नहीं कहा,
बस अपनी हथेली बढ़ा
दी।
ट्रेन वाला सफर खत्म हुआ था,
लेकिन अब ज़िंदगी का सफर शुरू हुआ था —
दोनों के नाम के साथ, एक ही टिकट पर।
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