बारिश में मिली अजनबी
दिल्ली की वो शाम बहुत अजीब थी — न जाने क्यों हवा में नमी भी थी और एक अजीब सी बेचैनी भी।
ऑफिस से लौटते वक्त अचानक झमाझम बारिश शुरू हो गई। मैं भीगने से बचने के लिए मेट्रो स्टेशन के बाहर बने छोटे से शरण स्थान पर खड़ा हो गया।
उसी वक्त मेरी नज़र एक लड़की पर पड़ी। उसके कपड़े बारिश से भीग चुके थे, बाल चेहरे पर चिपक गए थे और हाथ में एक पुराना बैग था — लगता था जैसे बहुत जल्दबाज़ी में निकली हो। चेहरे पर थकान थी, और आँखों में डर।
वो एक कोने में जाकर मोबाइल से बार-बार किसी को कॉल करने की कोशिश कर रही थी, लेकिन शायद नेटवर्क नहीं था। फिर कुछ देर बाद वो रोने लगी — अपने आँसू रोकने की पूरी कोशिश करती रही,
लेकिन आखिरकार रो पड़ी।
बारिश की आवाज़ में शायद उसे लगा, कोई सुन नहीं रहा।
मैंने नज़दीक जाकर पूछा —
“माफ़ कीजिए, आपको मदद चाहिए क्या?”
वो थोड़ा झिझकी, फिर बोली, “भाईसाब… मेरी ट्रेन छूट गई है। घर भोपाल जाना था, पर टिकट और पैसे दोनों बैग में ही थे, जो ऑटो में रह गया।”
उसकी आवाज़ काँप रही थी। मैं बस कुछ सेकंड उसे देखता रह गया। पता नहीं क्यों, उसकी बातों में भरोसा था, या शायद उसकी आँखों में वो सच्चाई थी, जिससे झूठ की गुंजाइश ही नहीं बचती।
मैंने कहा —
“आप चाहें तो स्टेशन तक चलिए, शायद ऑटोवाला अभी वहीं हो।”
वो हल्की सी उम्मीद लेकर मेरे साथ चल दी। भीगी सड़क पर दोनों के जूते हर कदम पर “छप-छप” की आवाज़ कर रहे थे। बारिश अब धीमी पड़ चुकी थी, लेकिन आसमान अब भी रो रहा था।
स्टेशन पहुँचकर काफी देर तक खोजा, पर वो ऑटोवाला नहीं मिला। उसके चेहरे की उम्मीद फिर से टूट गई। उसने धीरे से कहा —
“अब क्या करूँ… मम्मी का इलाज चल रहा है, वो अकेली हैं घर पर… मुझे तो आज ही पहुँचना था।”
उसका ये कहना जैसे मेरे दिल के अंदर तक उतर गया। मैंने अपना बटुआ निकाला और बोले बिना 1000 रुपये उसके सामने रख दिए।
वो चौंक गई — “नहीं, नहीं… मैं ये नहीं ले सकती।”
मैंने मुस्कराते हुए कहा —
“आपको लौटाने का मौका मिलेगा… तब लौटा देना। अभी बस घर पहुँचिए।”
उसकी आँखों में फिर से नमी थी, लेकिन इस बार कृतज्ञता की।
मैंने उसे टिकट दिलाने में मदद की। उसने ट्रेन में बैठते हुए कहा —
“आपका नाम तो पूछना भी भूल गई…”
मैं हँस पड़ा — “नाम से क्या होगा… कोई अजनबी ही समझ लेना।”
उसने मुस्कराकर कहा — “फिर मिलूँगी कभी… मेरे अजनबी भैया।”
ट्रेन चल पड़ी, और मैं उस मुस्कराहट में कुछ पल के लिए खो गया।
एक साल बाद…
जीवन अपनी रफ्तार से चलता रहा। मैं नौकरी, काम और व्यस्तता में उलझा रहा, लेकिन कई बार जब भी बारिश होती,
वही चेहरा आँखों के सामने घूम जाता —
भीगे बाल, काँपती आवाज़ और वो मासूम मुस्कराहट।
फिर एक दिन ऑफिस में डाक वाला एक लिफ़ाफ़ा देकर गया।
लिफ़ाफ़े पर साफ़-साफ़ मेरा नाम और ऑफिस का पता लिखा था।
एक पल के लिए मैं हैरान रह गया —
क्योंकि उस दिन जब मैंने उसे वो 1000 रुपये दिए थे,
तो नोट के नीचे अपना नाम और ऑफिस का पता लिख दिया था,
ताकि अगर कभी वो लौटाना चाहे तो कर सके।
शायद उसने वही नोट संभाल कर रखा था।
धीरे-धीरे मैंने लिफ़ाफ़ा खोला।
अंदर से हल्की सी खुशबू आई,
और एक चिट्ठी —
> “नमस्ते मेरे अजनबी भैया,
शायद आपको याद न हो, लेकिन एक साल पहले बारिश में आपने मुझे स्टेशन तक छोड़ा था और मदद की थी।
उस दिन मैं सच में हताश थी।
आपके दिए पैसों से मैं घर पहुँची, मम्मी का इलाज शुरू हुआ और अब वो बिल्कुल ठीक हैं।
आपके पैसे लौटाने आ रही हूँ —
लेकिन पैसे से ज़्यादा, मैं आपको धन्यवाद कहना चाहती हूँ।
शायद उस दिन अगर आप न मिलते, तो मम्मी को आख़िरी बार भी नहीं देख पाती…
कल शाम 5 बजे वही स्टेशन, वही जगह… मिलिएगा जरूर।”
खत पढ़कर मैं देर तक उसे देखता रहा…
बारिश फिर से शुरू हो चुकी थी।
अगले दिन जब मैं स्टेशन पहुँचा, तो वही मुस्कराहट फिर दिखी —
अब उसके चेहरे पर आत्मविश्वास था, और आँखों में चमक।
उसने हाथ जोड़कर कहा —
“धन्यवाद भैया… आपने उस दिन सिर्फ मेरी मदद नहीं की थी, मेरी ज़िन्दगी बदल दी थी।”
मैंने बस इतना कहा —
“कभी-कभी… अजनबी भी अपने बन जाते हैं।”
बारिश अब भी गिर रही थी, लेकिन इस बार वो भी प्यारी लग रही थी।
सीख:
कभी-कभी छोटी
-सी मदद किसी की पूरी दुनिया बदल सकती है।
और इंसानियत, हमेशा पहचान से बड़ी होती है।
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