समझ की डोरी

 

Indian mother-in-law applying oil in her daughter-in-law’s hair, both smiling lovingly in a cozy living room — symbol of affection and mutual respect, 8k ultra realistic family bond image.


सुबह के सात बजे थे। किचन में से छन-छन की आवाज़ें आ रही थीं।

रसोई में नेहा नाश्ता बना रही थी और सासु माँ, सविता जी, पास बैठी अख़बार पढ़ रही थीं।


“माँजी, चाय में अदरक डाल दूँ?”

“हाँ बेटा, डाल दो… वैसे आज दूध थोड़ा कम है, ज़रा संभालकर डालना।”


नेहा ने मुस्कुराकर “ठीक है” कहा, लेकिन मन ही मन सोच रही थी —

‘इतना तो बचपन से कभी किसी ने नहीं टोका जितना अब हर चीज़ पर सुझाव मिलते हैं।’


अभी शादी को बस चार महीने ही हुए थे।

सविता जी ने नेहा को बेटी की तरह अपनाने की कोशिश की, पर उनकी आदत थी हर चीज़ को अपने तरीके से करने की।

और नेहा, जो कि हमेशा अपनी मर्ज़ी से सब कुछ करती आई थी, अब हर कदम पर रुक-रुककर चलना सीख रही थी।


नाश्ता टेबल पर सज गया।

सविता जी, उनके बेटे आदित्य और नेहा — तीनों साथ बैठे।


आदित्य ने मुस्कुराकर कहा, “माँ, आज आलू पराठे तो बहुत स्वादिष्ट बने हैं।”

नेहा कुछ कहती, उससे पहले ही सविता जी बोलीं — “हाँ, मैंने कल ही कहा था ना कि भरावन में थोड़ा हरा धनिया डालो, तभी स्वाद बढ़ता है।”


नेहा मुस्कुराई, पर अंदर से उसे हल्की-सी चुभन हुई।

वो जानती थी कि उसने खुद ही धनिया डाला था, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।

उसे लगा — ‘अब छोटी बातों पर बोलकर घर का माहौल क्यों खराब करना।’


दिन यूँ ही गुजरते गए।

सास-बहू में कभी खट्टी तो कभी मीठी बातें होतीं।

पर सविता जी को लगता कि नेहा आजकल बहुत फोन में रहती है।

“बहु, ज़रा घर के कामों पर ध्यान दो, सारा दिन मोबाइल में क्या देखती रहती हो?”

“माँजी, मम्मी की तबीयत थोड़ी ठीक नहीं है, उनसे बात कर रही थी।”

“अरे बेटा, मैं मना तो नहीं करती, लेकिन थोड़ा वक्त अपने घर को भी दो। नई-नई शादी हुई है, आदित्य को भी समय दो।”


नेहा फिर भी कुछ नहीं बोली।

उसने महसूस किया कि सासु माँ का लहजा सख्त नहीं, बल्कि चिंता भरा है।

लेकिन उनके बोलने का तरीका कभी-कभी चुभ जाता था।



कुछ दिन बाद की बात है —

आदित्य ऑफिस गया था। सविता जी की तबियत कुछ ढीली लग रही थी।

नेहा ने देखा कि वो बिना कुछ खाए कमरे में जा रही हैं।


“माँजी, चलिए मैं खिचड़ी बना देती हूँ।”

“नहीं-नहीं बेटा, रहने दो। तुम थक जाओगी।”

“अरे माँजी, आप थकान की बात करती हैं और मैं बस मोबाइल चलाती हूँ — ये तो आप ही कहती हैं ना?”

नेहा ने मुस्कराते हुए कहा और सविता जी हँस पड़ीं।


थोड़ी ही देर में नेहा ने हल्की खिचड़ी बनाई, उसमें नींबू निचोड़ा और गरमागरम कटोरी में रख दी।

सविता जी ने एक कौर लिया और बोलीं, “बहु, ये तो बिल्कुल वैसी बनी है जैसी मैं बीमार होने पर अपनी माँ से बनवाती थी।”

नेहा के चेहरे पर संतोष की मुस्कान थी।

“माँजी, अब तो आप भी मेरी माँ जैसी हैं, बस अब आपको ज़िद नहीं करनी।”

सविता जी की आँखें भर आईं।


शाम को जब आदित्य लौटा तो उसने देखा कि नेहा और उसकी माँ दोनों साथ में बैठे बातें कर रही हैं, और सविता जी ने नेहा के बालों में तेल लगाया हुआ है।


“वाह, अब तो आप दोनों ने टीम बना ली है लगता है” आदित्य ने मज़ाक किया।


सविता जी बोलीं —

“अरे बेटा, जब बहु दिल से अपनी हो जाती है, तो सास नहीं, माँ बन जाती है।”


नेहा ने हल्के से कहा, “और जब माँ सास नहीं, माँ बन जाए — तो बहु बेटी की तरह सब सीख जाती है।”



उस दिन के बाद से घर का माहौल पूरी तरह बदल गया।

सविता जी अब नेहा की हर बात पर टोका-टाकी नहीं करती थीं।

बल्कि अक्सर कहा करतीं —

“नेहा, तू जैसा सही समझे वैसा कर ले, मुझे तो तेरी समझ पर पूरा भरोसा है।”


और नेहा अब हर बात सविता जी से पूछे बिना कोई काम नहीं करती थी।

वो जानती थी कि घर की बुनियाद समझदारी और सम्मान से बनती है, ज़िद से नहीं।


कुछ महीनों बाद आदित्य के ट्रांसफर की खबर आई।

उसे दूसरे शहर जाना था।

सविता जी ने कहा —

“बेटा, तुम दोनों वहाँ रहो। मैं गाँव वाले घर चली जाऊँगी।”


नेहा ने हाथ जोड़ते हुए कहा —

“माँजी, अब आप बिना हमारे कैसे रहेंगी? मैं तो अब आपकी सुबह की चाय के बिना दिन शुरू ही नहीं कर सकती।”

सविता जी हँस दीं और बोलीं —

“और मैं तेरे हाथ की खिचड़ी के बिना।”


तीनों गले लग गए।

और उस दिन नेहा को सच में महसूस हुआ कि सास-बहू का रिश्ता खून का नहीं, दिल के अपनापन का होता है।



संदेश:

“रिश्ते 

तो हर घर में होते हैं,

फर्क बस इतना होता है —

कहीं उन्हें ‘फर्ज़’ समझा जाता है,

कहीं ‘अपनापन’।”


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