सुगंध के सपनों की खुशबू
हमारे स्कूल की सबसे शांत लड़की थी सुगंधा।
ना किसी से झगड़ा, ना किसी से हँसी-मज़ाक, बस अपनी सीट पर चुपचाप बैठी पढ़ाई करती रहती थी।
हर रोज़ वही नीली फ्रॉक, वही दो चोटियाँ और वही पुराना बैग — जिससे कभी-कभी फटी हुई नोटबुक्स झाँकती रहतीं।
कक्षा में जब भी कोई टीचर सवाल पूछता, सुगंधा झट से सही जवाब देती।
लेकिन उसकी आवाज़ इतनी धीमी होती कि सामने वाली बेंच तक सुनाई नहीं देती थी।
टीचर उसे बहुत पसंद करते, पर बच्चे... बच्चे उसे “पढ़ाकू” कहकर चिढ़ाते।
लंच टाइम में जब सब मिलकर मज़े से टिफ़िन खोलते, तो सुगंधा हमेशा स्कूल के कोने में जाकर बैठ जाती।
उसके डिब्बे में बस सूखी रोटी और कभी-कभी प्याज या अचार होता।
कभी हम उसे छेड़ते —
“अरे सुगंधा, ये क्या खाती हो रोज़? कभी समोसा, परांठा, आलू सब्ज़ी भी लाओ।”
वो बस मुस्कुराकर कहती — “सब्ज़ी तो माँ ने रात में बना ली थी, सुबह तक खत्म हो गई।”
और फिर धीरे-धीरे अपनी सूखी रोटी खाने लगती।
सुगंधा के पिता लकड़ी का काम करते थे — छोटे से कारखाने में मजदूरी।
माँ घरों में कपड़े धोने जाती थी।
घर में तीन छोटे भाई-बहन थे, इसलिए सुगंधा के लिए नए कपड़े या अच्छा खाना कभी प्राथमिकता नहीं थी।
एक दिन मैंने उससे पूछा —
“सुगंधा, तुम इतनी मेहनत से पढ़ती क्यों हो? हर वक़्त किताबों में ही डूबी रहती हो।”
वो बोली —
“क्योंकि मैं चाहती हूँ, मेरी माँ के हाथों की झुर्रियाँ मिट जाएँ। मैं चाहती हूँ, मेरे पापा धूल से भरे कपड़ों में न जाएँ काम पर।”
उसकी बात सुनकर पहली बार मेरे मन में उसके लिए इज़्ज़त पैदा हुई।
समय बीतता गया।
हम सब स्कूल से निकलकर अलग-अलग कॉलेजों में चले गए।
सुगंधा के बारे में कोई ख़बर नहीं मिली।
कई साल बाद, शादी के बाद जब मैं अपने मायके गई, तो माँ ने कहा —
“बाज़ार में नई दुकान खुली है — ‘सुगंधा फ्लोरिस्ट’। वहाँ के फूल बहुत सुंदर हैं, जा कर देखना।”
‘सुगंधा फ्लोरिस्ट’ नाम सुनकर मेरा दिल धक से रह गया।
क्या यह वही सुगंधा हो सकती है?
जिज्ञासा में मैं अपने पति और बच्चों के साथ वहाँ पहुँच गई।
दुकान में तरह-तरह के फूलों की खुशबू फैली हुई थी — गुलाब, गेंदा, लिली, रजनीगंधा...
काउंटर पर एक महिला खड़ी थी — सादे सूट में, माथे पर हल्की बिंदी और चेहरें पर आत्मविश्वास की चमक।
वो मुस्कुराकर बोली —
“जी, बताइए क्या चाहिए?”
मैं उसे कुछ देर तक देखती रही...
फिर अचानक बोल पड़ी —
“सुगंधा... तुम?”
वो कुछ पल के लिए मुझे ध्यान से देखने लगी और फिर उसकी आँखें भर आईं।
“अरे... राधा! तुम?”
हम दोनों ने एक-दूसरे को गले लगा लिया।
मैंने पूछा — “सुगंधा, ये सब कैसे?”
वो धीरे-धीरे बताने लगी —
“पापा की तबियत बिगड़ गई थी। घर चलाना मुश्किल हो गया था। मैंने बारहवीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी और पास के मंदिर में फूल बेचने लगी।
लोगों ने कहा – इससे क्या होगा? लेकिन मैं रोज़ सोचती थी कि अगर मेहनत सच्ची हो तो कुछ भी छोटा नहीं होता।
धीरे-धीरे मुझे फूलों की किस्में पहचानने की समझ आने लगी।
एक दिन मंदिर में आए एक बुज़ुर्ग माली जी ने कहा — ‘बेटी, तुम तो फूलों से दोस्ती कर लेती हो।’
उनकी बात मेरे दिल में बस गई।
मैंने सोचा, अगर मैं फूलों से रोज़ी कमा सकती हूँ तो क्यों न अपना छोटा सा फूलों का ठेला लगाऊँ।”
वो ठहरकर मुस्कुराई —
“ठेले से शुरू किया, अब दुकान है। और अब हर रोज़ लोग मेरे फूलों से अपने घर सजाते हैं। शादी-ब्याह, पूजा-पाठ सबके लिए मैं फूल देती हूँ।
माँ अब काम नहीं करती, पापा भी आराम करते हैं। भाई पढ़ाई कर रहे हैं।”
मैंने भावुक होकर पूछा — “और तुम्हारा परिवार... शादी-विवाह?”
वो हँसकर बोली —
“अभी तो ये फूल ही मेरे परिवार हैं। जब समय आएगा, सब हो जाएगा। फिलहाल खुश हूँ — क्योंकि मैंने वो कर दिखाया, जो सब कहते थे ‘नामुमकिन’ है।”
उसी समय उसने अपने स्टाफ को आवाज़ लगाई —
“रवि, राधा दीदी के लिए एक गुलदस्ता तैयार करो — लाल और सफेद गुलाबों वाला।”
फूलों की खुशबू पूरे माहौल में फैल गई।
सुगंधा बोली —
“याद है राधा, स्कूल में तुम कहती थीं — ‘तेरे टिफिन में खुशबू नहीं है।’
अब देखो, मेरी जिंदगी में खुशबू ही खुशबू है।”
हम दोनों हँस पड़ीं, लेकिन मेरी आँखों में नमी थी।
मन ही मन मैंने कहा —
“सुगंधा, तुम्हारे सपनों की खुशबू सचमुच पूरे शहर में फैल गई है।”
संदेश:
> अगर इरादे मजबूत हों तो गरीबी भी हार मान जाती है।
मेहनत की खुशबू हमेशा सबसे दूर तक जाती है।
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