माँ की सेवा
रमेश और रीता की शादी को पाँच साल हो चुके थे। दोनों एक छोटे शहर में रहते थे और अच्छी ज़िंदगी गुज़ार रहे थे। रमेश बैंक में अधिकारी था, और रीता एक निजी स्कूल में शिक्षिका।
रमेश की माँ, सावित्री देवी, अब उम्रदराज़ हो चली थीं। घुटनों का दर्द, कमज़ोर आँखें, और धीरे-धीरे चलना — यही उनकी दिनचर्या बन चुकी थी।
रमेश रोज़ सुबह जल्दी दफ्तर चला जाता और रीता स्कूल। ऐसे में माँ ज़्यादातर समय घर में अकेली रहतीं। कभी अख़बार के पुराने पन्ने पलटतीं, कभी घर में पूजा करतीं, कभी खिड़की से बाहर झाँकती रहतीं — शायद बेटा-बहू के लौटने का इंतज़ार करतीं।
एक दिन शाम को ऑफिस से लौटकर रमेश ने धीरे से कहा,
“रीता, सोच रहा हूँ कि माँ को किसी ‘ओल्ड एज होम’ में रख दें।”
रीता ने चौंककर उसकी ओर देखा —
“क्या मतलब?”
रमेश बोला, “देखो, माँ अकेली रहती हैं, दिनभर बोर होती हैं। वहाँ उनके उम्र के लोग होंगे, बातें करेंगी, घूमेंगी-फिरेंगी। यहाँ तो हम दोनों दिनभर बाहर रहते हैं। हमें चैन भी रहेगा और माँ को साथ भी मिल जाएगा।”
रीता कुछ पल तक चुप रही। फिर बोली,
“और क्या तुमने माँ से पूछा है कि वो जाना चाहती हैं?”
“नहीं, लेकिन मैं जानता हूँ — वहाँ उनकी देखभाल अच्छे से होगी,” रमेश ने सहजता से कहा।
रीता ने धीरे से मुस्कराकर कहा,
“देखभाल तो मिलेगी, पर प्यार नहीं। दवा मिलेगी, पर दुलार नहीं।”
रमेश कुछ समझ नहीं पाया।
रीता ने बात आगे बढ़ाई —
“तुम्हें याद है न, जब तुम्हारे पिता नहीं रहे थे तब माँ ने एक दिन भी चैन से नहीं बैठीं। दिन-रात मेहनत की, ताकि तुम्हें किसी चीज़ की कमी न हो। उन्होंने कभी किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया, सिर्फ़ इसलिए कि तुम्हारी पढ़ाई पूरी हो जाए, तुम्हारा भविष्य बन जाए। और आज तुम वही माँ को घर से अलग करने की सोच रहे हो?”
रमेश के होंठ कांप गए। वह चुप रहा।
रीता ने उसकी ओर देखकर कहा,
“सुनो रमेश, पैसे कमाने के लिए तो ज़िंदगी भर पड़ी है, पर माँ का आशीर्वाद दोबारा नहीं मिलेगा। मैं नौकरी छोड़ दूँगी। स्कूल की नौकरी छोड़कर घर से ही बच्चों को ट्यूशन पढ़ाऊँगी। माँ का साथ दूँगी। उनका वक्त हँसी में गुज़रे, यही कोशिश रहेगी।”
उसकी बातों में सच्चाई थी, अपनापन था। रमेश की आँखें नम हो गईं।
वह बोला, “रीता, शायद मैं माँ के क़रीब रहकर भी उनसे दूर हो गया था। तुमने मुझे आईना दिखाया। अब माँ कहीं नहीं जाएँगी। हम सब साथ रहेंगे — हमेशा।”
उसी वक्त माँ रसोई से यह सारी बातें सुन रही थीं। उनके हाथों से लोटा गिर गया और आँसू झर-झर बह निकले।
धीरे-धीरे वे पूजा के कमरे में गईं, हाथ जोड़कर भगवान के सामने खड़ी हो गईं और बोलीं —
“हे प्रभु, मैंने हमेशा यही दुख मनाया कि मेरी कोई बेटी नहीं है...
लेकिन आज समझ आई — बहू ही बेटी बनकर आई है।
तू सच में दयालु है भगवान, तूने मुझे बेटी नहीं दी, पर बेटी जैसी रीता दे दी। अब मेरा जीवन सफल हो गया।”
रीता पीछे से आई, माँ के आँसू पोंछे और उनके पैरों में सिर रख दिया।
माँ ने उसका सिर सहलाते हुए कहा,
“बेटी, जब तक तुम हो, मुझे किसी वृद्धाश्रम की ज़रूरत नहीं।”
पूरे घर में उस दिन पहली बार सच्चे अपनापन की ख़ुशबू फैल गई।
संदेश:
> “माँ-बाप सिर्फ़ देखभाल नहीं, साथ चाहते हैं।
उनके लिए सबसे बड़ा सुख है — अपने बच्चों के बीच रहना।”
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