आशा की ज्योति

 

Closeup of an emotional Indian woman gently holding a small girl, both smiling with warmth and affection.


आज मिसेज़ कविता जोशी का 48वां जन्मदिन था। उनका घर सुबह से ही फूलों की ख़ुशबू से महक रहा था। पति मिस्टर देव जोशी, जो कि रेलवे विभाग में इंजीनियर थे, आज की शाम कविता के लिए बेहद खास बनाना चाहते थे।


कविता जी पेशे से नर्स थीं। पिछले 20 साल से शहर के सरकारी अस्पताल में सेवा कर रही थीं।

लोग कहते थे—

“कविता मैम के हाथों में जादू है… जिसे छू लें, उसका दर्द आधा हो जाता है।”


लेकिन इस दयालु, मुस्कुराती स्त्री के दिल में एक ऐसा खालीपन था… जिसे कोई भी मुस्कान भर नहीं पाती थी।



दिल का खालीपन...


कविता सुबह अपने कमरे की खिड़की के पास खड़ी थीं।

बाहर बच्चे खेल रहे थे, हँस रहे थे… और उनके मन में वही एक पीड़ा उठ रही थी—

“काश… मेरी गोद में भी एक बच्चा होता।”


वे डॉक्टरों के पास गई थीं। टेस्ट, दवाइयाँ, इलाज… पांच साल लगातार।

नतीजा एक ही—

“माफ कीजिए, अब प्राकृतिक रूप से गर्भ धारण की संभावना बहुत कम है।”


शुरू-शुरू में उन्होंने खुद को दिलासा दे लिया, लेकिन धीरे-धीरे अंदर का खालीपन गहरा होता गया।


पति देव हमेशा कहते—

“कविता, हम दोनों ही एक-दूसरे के लिए काफी हैं।”

पर कविता जानती थीं—

मां बनने की चाह को तसल्ली देना आसान नहीं होता।


अस्पताल में जब वे किसी नवजात को जन्म देते देखतीं, तो उनकी आंखें भीग जातीं।

कभी-कभी वह किसी बच्चे को गोद में लेकर धीरे से कह देती—

“तुम्हें पता है, मैं तुम्हें कितना प्यार करती हूं?”



एक दिन की घटना जिसने सब बदल दिया...


उनके जन्मदिन की सुबह ही, जब वे वार्ड में राउंड ले रही थीं, अचानक नर्स बोली—


“मैम, बाहर कोई बच्ची मिली है… लगभग तीन साल की होगी।”


कविता ने दौड़कर बाहर देखा।

एक छोटी-सी बच्ची, फटी पोशाक में, सूखे होंठ, डरी हुई आंखें…


कविता ने झुककर कहा—

“क्या नाम है तुम्हारा, बेटा?”


बच्ची ने कांपती आवाज़ में कहा—

“ज्योति…”


और अगले ही पल वह कविता की गोद में समा गई…

जैसे बरसों से उसी गोद में रह रही हो।


कविता का दिल पिघल गया।

उन्होंने बच्ची को खाना खिलाया, पानी दिया, प्यार से बाल सुलझाए।


पूरे दिन ज्योति कविता के पीछे-पीछे घूमती रही—

“मैम… मैम…”


शाम तक वह दो शब्द बोलने लगी—

“कवि… मां…”


कविता का दिल भर आया।

उन्होंने उसे कसकर गले से लगा लिया।



शाम को जब देव घर लौटे, कविता ने रोते हुए कहा—


“देव… मुझे ज्योति चाहिए। वह बच्ची… मेरे दिल में उतर गई है।”


देव ने हैरानी से पूछा—

“क्या तुम सच में उसे अपना बनाना चाहती हो?”


कविता बोलीं—

“मैंने जिंदगी में बहुत लोगों की जान बचाई है…

पर आज पहली बार किसी ने मेरी आत्मा को छुआ है।

देव… मैं मां बनना चाहती हूं। ज्योति मेरी बेटी हो सकती है।”


देव ने उसका हाथ पकड़ा—

“कविता, अगर तुम्हारा दिल यही कहता है, तो मैं तुम्हारे साथ हूं।”



कविता ने कानूनी प्रक्रिया शुरू करवाई।

जांच हुई तो पता चला—


ज्योति को एक झुग्गी में रहने वाली महिला छोड़ गई थी,

जो गरीबी और बीमारी में मर गई थी।


अब बच्ची पूरी तरह अकेली थी।


सरकारी विभाग ने कहा—

“मैम, आप नर्स हैं, स्थायी नौकरी है, स्थायी घर है…

आप उसे गोद ले सकती हैं।”


कविता की आंखों से खुशी के आंसू बह निकले।



छोटी ज्योति का नया घर...


कुछ हफ्तों बाद, ज्योति आधिकारिक रूप से कविता और देव की बेटी बन गई।


वह घर में कदम रखते ही मुस्कुराई—

“मां… मैं आ गई!”


कविता की दुनिया थम गई।


जिस शब्द को सुनने के लिए उनका दिल 15 साल से तरस रहा था,

वह तीन साल की बच्ची ने एक पल में दे दिया।


देव ने कैमरा उठाकर कहा—

“कविता, यही है तुम्हारा जन्मदिन का असली तोहफ़ा।”



नई ज़िंदगी, नई रोशनी...


धीरे-धीरे ज्योति घर में रच-बस गई—

कभी कविता की साड़ी पकड़कर भागती,

कभी देव के कंधों पर चढ़ जाती,

कभी अस्पताल में सबको अपनी “मम्मा” दिखाती।


अस्पताल के स्टाफ कहते—

“मैम, आपको इतनी खुश कभी नहीं देखा!”


कविता हर रात सोने से पहले ज्योति के माथे पर चुम्मा देतीं और सोचतीं—


“भगवान ने देर की, पर दिया सबसे अनमोल तोहफ़ा।”




अंत में…


दो साल बाद भी ज्योति जब कविता को “मम्मा” कहकर गले लगाती,

तो कविता की आंखें भर आतीं।


अब कविता के जीवन का उद्देश्य सिर्फ एक था—

ज्योति की जिंदगी में कभी अंधेरा न आने देना।


कविता मुस्कुराते हुए कहतीं—


“मां बनना खून से नहीं… दिल से होता है।”


और ज्योति सच में उनकी ‘आशा की ज्योति’ बन गई थी।



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