बराबरी की दाल

 

A morning family scene where a daughter-in-law serves equal portions of food to all members, while the mother-in-law and sons react emotionally in a peaceful Indian home kitchen.


सुबह के साढ़े छह बजे थे।

आँगन में नीम के पेड़ से छनकर हल्की धूप बस उतर ही रही थी।

घर की बुज़ुर्ग शारदा देवी बरामदे में अपनी लकड़ी की आरामकुर्सी पर बैठी थीं।

बगल में रेडियो धीमी आवाज़ में बज रहा था—पुराने भजन।


रसोई में बहू सविता दाल में तड़का लगा रही थी।

जीरे की खुशबू पूरे घर में फैल चुकी थी।

खिड़की से आती हवा उस महक को और दूर तक ले जा रही थी।


बाहर आँगन में, बड़ा बेटा विवेक अपने दोनों बच्चों को तैयार कर रहा था—

बेटी को रिबन बाँधना, बेटे के शूज पहनाना…

इतना सब घमासान चलते हुए भी घर में एक प्यारी-सी गहमागहमी बनी हुई थी।


सविता ने आवाज लगाई—

“मम्मी जी, नाश्ता तैयार है!”


शारदा देवी ने बिना अख़बार से नज़र हटाए कहा—

“हाँ-हाँ… पहले बच्चों को दो, फिर विवेक को देना।

हमारे लिए रात की रोटी बची है, वही गरम कर देना।

हम बुज़ुर्ग लोगों को इतना ताज़ा-वाज़ा खाने की ज़रूरत नहीं।”


सविता एक पल के लिए ठहर सी गई।


एक पल को वो मुस्कुराई… पर मुस्कान थोड़ी ठहरी हुई थी।


उसने धीरे से कहा—

“मम्मी जी… पर नाश्ता सबका एक जैसा ही है।

आपके लिए भी गरम-गरम पराठा रखा है।”


शारदा देवी ने चश्मा ऊपर करते हुए कहा—

“नहीं बहू, आदत है हमारी।

पराठा बच्चों और जवानों को मिलता है,

हमसे कौन-सा खेत जोतना है।”


विवेक रसोई में आया, और एक थाली उठाकर बैठ गया।

सविता ने उसे बताया कि क्या हुआ।

विवेक ने अपनी माँ की ओर देखा और बोला—

“मम्मी, बहू सही कह रही है।

आपने भी सुबह सबके लिए मेहनत की, पूजा की…

आप भी ताज़ा खाना खाएँगी।”


शारदा देवी भड़क गईं—

“लो सुन लो! बहू का जादू बेटे पर चढ़ गया।

हम तो कहा करते थे—बुज़ुर्गों का खाना अलग होता है।

अब हमारी ही परंपरा गलत हो गई?”


छोटा बेटा अनूप भी कमरे से निकला और बोला—

“माँ, परंपरा गलत नहीं…

पर इंसान को बराबरी तो मिलनी चाहिए ना?”


पूरा माहौल एक सेकंड में भारी हो गया।


सविता ने सोचा—फिर वही बात…

पर आज उसने मन में तय कर लिया था कि चुप नहीं रहेगी।


वह शांत स्वर में बोली—

“मम्मी जी, आप बुरा न मानें…

पर जिस घर में बड़े खुद को कम समझने लगते हैं,

वह घर कमजोर होने लगता है।

आप इस घर की ताक़त हैं।

आपके लिए बचा हुआ खाना क्यों?”


शारदा देवी ने थाली सरका दी—

“बहू होकर हमें सीखाएगी?

हमने बड़े-बड़े घर संभाले हैं।”


तभी आँगन की ओर से पड़ोसन लता मौसी आ पहुँचीं,

जो सुबह-सुबह चाय पीने आ जाती थीं।


उन्होंने बात सुनकर कहा—

“अरी शारदा, बहू सही बोल रही है।

आज के जमाने में बहुएँ सिर्फ हाथ नहीं, दिमाग भी लगाती हैं।

बड़ों को अच्छी चीज़ देना गलत थोड़े है!”


शारदा देवी को ये बिल्कुल पसंद नहीं आया।

उन्होंने कटाक्ष किया—

“लता, तुम्हारी बहुएँ तो तुम्हारे ऊपर चढ़ी हुई हैं,

हमारे घर में ऐसा नहीं चलेगा।”


सविता की आँखों में आँसू भर आए,

पर उसने खुद को संभाला।


दोपहर हुई।

सब खाने के लिए बैठ गए।

सविता ने सबकी थालियों में बराबर-बराबर सब्ज़ी, दाल, पराठे और सलाद रखा।

एक भी चीज न कम, न ज़्यादा।


शारदा देवी ने जैसे ही देखा, गुस्से से बोली—

“ये क्या? सबकी प्लेटें एक जैसी?

ये कौन-सी व्यवस्था है?”


सविता धीरे से बोली—

“घर एक है मम्मी जी, तो खाना भी बराबरी का होना चाहिए।

किसी को ज़्यादा, किसी को कम देने से प्यार नहीं बढ़ता,

बस मन में दूरी आ जाती है।”


इस बार विवेक ने कड़क आवाज़ में कहा—

“मम्मी, परिवार सम्मान से चलता है।

और सविता सालों से सेवा कर रही है।

उसका हक कोई नहीं छीन सकता।”


अनूप भी बोला—

“हाँ माँ, अब बदलाव का वक्त है।”


रीता, जो अक्सर ताना मार दिया करती थी, इस बार धीरे से बोली—

“भाभी… आप सही कह रही हैं।

मैंने भी अपने आस-पास यही होता देखा है।

पर आज पहली बार समझ आया कि गलत तभी तक चलता है,

जब तक कोई उसके ख़िलाफ़ बोलने की हिम्मत नहीं करता।”



शारदा देवी के होंठ काँपे।

उन्होंने थाली छोड़ दी।

आँखें नम हो रही थीं—गुस्से से या पछतावे से, समझ नहीं आता।


खाना शांतिपूर्वक खत्म हुआ।


रात को पूजा घर में सब जमा हुए।

दीया जल रहा था।

माहौल बिलकुल शांत था।


शारदा देवी ने धीरे से कहा—

“बहू… आज तुमने जो कहा,

पहले बुरा लगा।

पर सोच रही हूँ…

सच कहा।

आदतें हम बड़े बनाते हैं,

पर बदलना भी हमें ही चाहिए।”


सविता की आँखें नम थीं,

पर इस बार दुख से नहीं—सुकून से।


ससुरजी ने मुस्कुराते हुए कहा—

“सविता, तुमने घर की नींव मजबूत की है।

बराबरी से एक भी ईंट कमजोर नहीं होती।”


विवेक ने गर्व से अपनी पत्नी का हाथ पकड़ा।

अनूप ने हँसकर कहा—

“अब मम्मी भी बराबरी का पराठा खाएँगी!”


शारदा देवी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—

“हाँ रे… अब रोटी-बोटी सब बराबर।

बहू ने हमें भी सीख दे दी।”


पूरे घर में जैसे पहली बार सुकून फैल गया था।

आँगन में हवा फिर वही खुशबू लिए बह रही थी—

बराबरी की, सम्मान की, और प्यार की।


#GharMeinBarabari #BahukiAwaaz


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