दूरी में भी अपनापन
रामेश्वर जी शहर के सरकारी स्कूल में अध्यापक थे।
सीधी-सादी ज़िंदगी, सादा खाना और सच्चे संस्कार — यही उनकी पहचान थी।
पत्नी कुसुम देवी घर संभालती थीं, और बेटा राजेश उनकी आँखों का तारा था।
राजेश की शादी नीतू से हुई थी — सुशिक्षित, आधुनिक सोच वाली, पर थोड़ी बातों में तेज़।
शुरू-शुरू में सब ठीक चलता रहा,
पर जैसे-जैसे दिन बीतते गए,
घर में काम को लेकर, बच्चों की परवरिश को लेकर, या किसी छोटी-सी बात पर भी टकराव बढ़ने लगा।
कुसुम देवी को लगता था कि
“नीतू को तो बस मोबाइल और बाहर घूमने की ही पड़ी रहती है, घर-गृहस्थी से क्या लेना देना?”
और उधर नीतू को लगता था —
“सासू मां हर बात में टोक देती हैं, सांस लेने तक की आज़ादी नहीं।”
राजेश बीच में कई बार समझाने की कोशिश करता,
पर जब घर में हर रोज़ तकरार होने लगी,
तो उसने खुद को दुकान और दोस्तों में ज़्यादा व्यस्त कर लिया।
रामेश्वर जी रोज़ यह सब देखते और चुप रहते।
उन्हें समझ नहीं आता था कि कैसे यह प्यार-भरा घर अब झगड़ों का अड्डा बन गया।
एक दिन सुबह-सुबह उन्होंने देखा कि नीतू रो रही थी,
और कुसुम देवी अपने कमरे में बड़बड़ा रही थीं —
“हमारी तो कोई इज़्ज़त ही नहीं बची इस घर में।”
राजेश चुपचाप बाहर चला गया।
रामेश्वर जी ने उस रात बहुत देर तक सोचा।
फिर अगली सुबह, उन्होंने नीतू और राजेश दोनों को बुलाया।
“बेटा, मैंने मोहल्ले में ही शर्मा जी का ऊपर वाला हिस्सा किराए पर लिया है,”
उन्होंने शांत स्वर में कहा।
“तुम दोनों कुछ महीनों के लिए वहाँ रहो। अपना अलग संसार बनाओ।”
नीतू और राजेश दोनों हैरान रह गए।
राजेश बोला, “पर पिताजी! आपको और मां को छोड़कर हम कैसे रहेंगे?”
रामेश्वर जी मुस्कुराए —
“बेटा, कभी-कभी साथ रहकर रिश्ते टूटने लगते हैं,
और दूर रहकर दिलों में अपनापन बढ़ जाता है।”
शुरू में नीतू को बहुत डर लगा।
नई जगह, घर का सारा काम खुद करना,
हर महीने का हिसाब खुद रखना —
उसे महसूस हुआ कि घर चलाना कितना मुश्किल होता है।
कुसुम देवी भी पहले तो खुश थीं —
सोचा, चलो अब घर में शांति रहेगी।
पर कुछ ही दिनों में उन्हें बहू की कमी महसूस होने लगी।
सुबह चाय बनाने के लिए उठतीं तो सोचतीं —
“नीतू तो अब तक बनाकर रख देती थी…”
दोपहर में सब्ज़ी काटते हुए याद आता —
“नीतू मसाले कितने अच्छे डालती थी…”
और रात को खाना खाते हुए बस यही मन में गूंजता —
“कब आएगी वो वापस?”
उधर, नीतू भी धीरे-धीरे सासू मां की अहमियत समझने लगी।
बच्चे को संभालना, घर के काम निपटाना और फिर खुद के लिए समय निकालना —
ये सब आसान नहीं था।
कई बार सोचती —
“मां सही कहती थीं, अनुभव की कीमत देर से समझ आती है।”
राजेश ने भी महसूस किया कि
पापा का फैसला सजा नहीं, सीख थी।
दो महीने बाद रामेश्वर जी ने दोनों को घर बुलाया।
घर का माहौल बदला हुआ था।
कुसुम देवी ने बहू को देखते ही गले लगा लिया,
आंखों में आंसू थे — “बहू, अब जल्दी मत जाना।”
नीतू भी बोली,
“मां, अब गलती नहीं होगी, बस आपके साथ रहना है।”
रामेश्वर जी ने धीरे से कहा —
“देखो बेटा, प्यार कभी सिर्फ पास रहकर नहीं बढ़ता,
कभी-कभी थोड़ी दूरी ही हमें करीब लाती है।”
उस दिन घर में बरसों बाद हंसी-खुशी की आवाज़ गूंजी।
रिश्तों में जो गांठें थीं, वे ढीली होकर खुलने लगीं।
रामेश्वर जी ने आसमान की ओर देखा और सोचा —
“सच कहा था मैंने — प्यार बढ़ाने के लिए
नज़दीकियाँ ही नहीं, दूरियाँ भी ज़रूरी होती हैं।”
#RishtonKiDooriMeinPyar #GharKaSukoon

Post a Comment